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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
११०शुक्रनीतिः

सुवर्णरत्नरजतनिष्क्शालास्तथैव च ।
रथाश्वगोगजोष्ट्राजावीनशालाः पृथक् पृथक् ॥ ३४६ ॥
वाद्यशास्त्रास्त्रवस्त्राणां धान्यसम्भारयोस्तथा ।
मन्त्रिशिल्पनाट्यवैद्यमृगाणां पाकपक्षिणाम् ॥ ३४७ ॥
शाला भोग्ये निविष्टास्तु तद्व्ययो भोग्य उच्यते ।

**भोग्य व्यय के लक्षण—**सोना, रत्न, चांदी, निष्क (मोहर-स्वर्ण मुद्रा) रखने के जो स्थान हैं एवं रथ, घोड़े, गौ, गज, ऊंट, बकरे, मेडे आदि के तथा इनके अध्यक्षों के लिये पृथक्-पृथक् बने हुये जो स्थान (गृह) हैं। और वाद्य (बाजे), शस्त्र, अस्त्र, धान्य, संभार (नाना प्रकार की सामग्री) रखने के लिये जो स्थान हैं तथा मन्त्री, शिल्प, नाट्य (नाटक-संबन्धी), वैद्य, मृग, पाक, पक्षी इनके लिये जो स्थान हैं, उन सबों की गणना भोग्य के अन्दर है अतः इन सबों के संबन्ध में होनेवाले व्यय को भी 'भोग्य' कहते हैं।

जपहोमार्चनैर्दानैश्चतुर्धा पारलौकिकः ॥ ३४८ ॥
पुनर्यातो निवृत्तश्च विशेषायायव्ययौ च तौ।
आवर्तको निवर्ती च व्ययायौ तु पृथग्विधा ॥ ३४९ ॥

**पारलौकिक व्यय के चार भेद और उनके लक्षण—**जप, होम, पूजन तथा दान भेद से पारलौकिक व्यय के मुख्य चार भेद होते हैं। और जो आय आकर पुनः जानेवाला हो उसे विशेष आय एवं जो व्यय जाकर पुनः आनेवाला हो उसे विशेष व्यय कहते हैं। अतः व्यय तथा आय ये दोनों पृथक् २ आवर्त्तक (वापस आनेवाले) निवर्ती (नहीं वापस आनेवाले) भेदों से दो २ प्रकार के होते हैं ।।

आवर्तकविहीनौ तु व्ययायौ लेखको लिखेत् ।

**आय-व्यय-लेखक के कर्तव्य—**लेखक वापस आनेवाले और वापस न आनेवाले व्यय तथा आयको लिखे।

क्रयाधमर्णघटनान्यस्थलाप्तो विवर्तकः ॥ ३५० ॥
द्रव्यं लिखित्वा दद्यात्तु गृहीत्वा विलिखेत्स्वयम् ।

क्रय (खरीदना), अधमर्ण की घटनाओं (ऋणादि व्यवहारों) एवं अन्य विषयों में विश्वासपात्र लेखक स्वयं द्रव्य लिखकर तब देवे या लेवे।

हीयते वर्धते नैवमायव्ययविलेखकः ॥ ३५१ ॥

इस प्रकार से आय-व्यय के लिखनेवाले का लिखा आय तथा व्यय न कम होता है और न बढ़ता है।

हेतुप्रमाणसम्बन्धकार्याङ्गव्याप्यव्यापकैः ।
आयाश्च बहुधा भिन्ना व्ययाः शेषं पृथक् पृथक् ॥ ३५२ ॥

द्वितीयोऽध्यायः१११

मानेन संख्यया चैवोन्मानेन परिमाणकैः । अवशिष्ट आय के विविध भेद— अवशिष्ट आय और पृथक् २ कारण, प्रमाण, संबन्ध (संयोग), कार्याङ्ग (कार्यों के अवान्तर व्यापार), व्याप्य (थोड़े विषय), व्यापक (बहुत विषय), मान, संख्या, उन्मान और परिमाण इन सबों के द्वारा बहुत प्रकार से भिन्न २ होते हैं।

क्वचित्संख्या क्वचिन्मानमुन्मानं परिमाणकम् ॥ ३५३ ॥
समाहारः क्वचिच्चेष्टो व्यवहारार्य तद्विदाम् ।
किसी प्रदेश में मानादि का ज्ञान रखनेवाले लोगों को व्यवहार के लिये संख्या, कहीं पर मान, कहीं पर उन्मान, कहीं पर परिमाण और कहीं पर समाहार (संख्यादियों का समुदाय) अभीष्ट होता है।

अङ्गुलाद्यं स्मृतं मानमुन्मानं तु तुला स्मृता ॥ ३५४ ॥
परिमाणं पात्रमानं संख्यैकद्व्यादिसंज्ञिका ।
मान-उन्मान-परिमाण संख्या के लक्षण— अंगुलि या हाथ आदि से जो नापा जाता है उसे 'उन्मान' और काठ आदि के बने पात्रों से जो नापा जाता है उसे 'परिमाण' एवं एक, दो, तीन आदि गिनती को 'संख्या' कहते हैं।

यत्र यादृग् व्यवहारस्तत्र तादृक्प्रकल्पयेत् ॥ ३५५ ॥
जहाँ पर जैसा व्यवहार हो वहाँ पर वैसा व्यवहार राजा को कराना चाहिये।

रजतस्वर्णताम्रादि व्यवहारार्थमुद्रितम् ।
व्यवहार्य वराटाद्यं रत्नान्तं द्रव्यमीरितम् ॥ ३५६ ॥
सपशुधान्यवस्त्रादि-तृणान्तं धनसंज्ञकम् ।
लोकव्यवहारार्थं द्रव्य तथा धन के लक्षण— लोकव्यवहार के लिये ढाले गये चांदी, सोना एवं तांबे के सिक्कों का व्यवहार प्रजाओं को करना चाहिये। कौड़ी से लेकर रत्न-पर्यन्त की संज्ञा 'द्रव्य' है। पशु, धान्य, वस्त्र से लेकर तृण पर्यन्त की संज्ञा 'धन' है।

व्यवहारे चाधिकृतं स्वर्णाद्यं मूल्य तामियात् ॥ ३५७ ॥
व्यवहार के लिये राजा द्वारा निश्चित स्वर्णादि मुद्रायें प्रत्येक वस्तु की मूल्य समझी जाती हैं।

कारणादिसमायोगात्पदार्थस्तु भवेद् भुवि ।
येन व्ययेन संसिद्धस्तद्व्ययस्तस्य मूल्यकम् ॥ ३५८ ॥
मूल्य की परिभाषा— संसार में कारण आदि के संयोग होने से जो पदार्थ जितने व्यय में सिद्ध होता है उतना व्यय उसका मूल्य होता है।

सुलभासुलभत्वाच्चागुणत्वगुणसंश्रयैः ।

११२ | शुक्रनीतिः

यथाकामात्पदार्थानामर्घं हीनाधिकं भवेत् ॥ ३५९ ॥

मूल्य के न्यूनाधिक्य का कारण-निर्देश— पदार्थों की सुलभता या दुर्लभता से किंवा अच्छा या बुरा होने से (तारतम्यानुसार) उनका मूल्य विक्रेता के इच्छानुसार अधिक या कम होता है।

न हीनं मणिधातूनां क्वचिन्मूल्यं प्रकल्पयेत् ।
मूल्यहानिस्तु चैतेषां राजदौष्ट्येन जायते ॥ ३६० ॥

किसी प्रदेश में भी राजा मणियों तथा सोना, चांदी आदि धातुओं का मूल्य थोड़ा न रखे । इन सबों के मूल्य में कमी जब होती है तब राजा की दुष्टता से न कि प्रजा की ।

दीर्घे चतुर्भागभूतपत्रे तिर्यग्गतावलिः ।
त्र्यंशगाभ्यन्तरगता चार्धगा पादगापि वा ॥ ३६१ ॥
कार्या व्यापकव्याप्यानां लेखने पदसंज्ञिका ।

पत्रलेखन प्रकार— थोड़ा या ज्यादा विषयों के अनुसार लेख लिखने के लिये प्रशस्त पत्र (कागज) के ऊपर चार भाग करने पर उसमें से ३ भाग के अन्दर या आधे भाग किंवा चौथाई भाग के अन्दर आड़ी लकीरों की पंक्ति बनाकर पदों (अक्षरों) को लिखना चाहिये ।

श्रेष्ठाभ्यन्तरगा तासु वामतस्त्र्यंशगाऽप्यनु ॥ ३६२ ॥
दक्षत्र्यंशगता चानु ह्यर्धगा पादगा ततः ।

उक्त ३ प्रकार की पदावलियों में जो पत्र के अन्दर वामभाग से शुरू होकर तीन भाग में लिखी होती है वह श्रेष्ठ है। और दक्षिण से वामभाग की ओर तीन भाग तक लिखी होती है वह उसकी अपेक्षा हीन है। अर्द्धांश में लिखी हुई उससे भी हीन, इसके बाद चतुर्थांश में लिखी हुई सबसे हीन है ।

स्वभ्यन्तरे स्वभेदाः स्युः सदृशाः सदृशे पदे ॥ ३६३ ॥
स्वारम्भपूर्तिसदृशे पत्रे स्तः सदैव हि ।

लाइनों की दूरी परस्पर समान भाव से होने से सब एक सी हों और उनमें अक्षर भी समान हों । अर्थात् जो समान पद हों उनमें सर्वत्र अक्षर समान लिखे जांय । और आरम्भ किये गये विषयों की पूर्ति के अनुरूप पत्र हों एवं उनमें अक्षर और लाइनें उसी के अनुसार अंकित हों ।

राजा स्वलेख्यचिह्नं तु यथाभिलषितं तथा ॥ ३६४ ॥
लेखानुपूर्वं कुर्याद्धि दृष्ट्वा लेख्यं विचार्य च ।

राजा लेख को देखकर उसके बाद विचार कर लेखानुसार जो उचित प्रतीत हो उसे इच्छानुकूल अपने लेख से अङ्कित कर देवे अर्थात् लिख देवे ।

द्वितीयोऽध्यायः [११९]

मंत्री च प्राड्विवाकश्च पण्डितो दूतसंज्ञकः ॥ ३६५ ॥
स्वाविरुद्धं लेख्यमिदं लिखेयुः प्रथमं त्विमे ।
मन्त्री, विचारपति, पण्डित और दूत आदि ये सब प्रथम राजा को दिखाने के लिये 'यह लेख मुझे अभिमत है' ऐसा लिखें ।

अमात्यः साधु लिखनमस्त्येतत्प्राग् लिखेदयम् ॥ ३६६ ॥
सम्यग्विचारितमिति सुमन्त्रो विलिखेत्ततः ।
इनमें से जो अमात्य है वह 'यह लेख अच्छा है' ऐसा पत्र में प्रथम लिखे । उसके बाद सुमन्त्र 'मैंने इस पर भली-भांति विचार किया है' ऐसा लिखे ।

सत्यं यथार्थमिति च प्रधानश्च लिखेत्स्वयम् ॥ ३६७ ॥
अङ्गीकर्तुं योग्यमिति ततः प्रतिनिधिर्लिखेत् ।
और 'प्रधान' 'यह वस्तुतः यथार्थ है' यह स्वयं लिखे उसके बाद प्रतिनिधि 'यह अङ्गीकार करने योग्य है' ऐसा लिखे ।

अङ्गीकर्तव्यमिति च युवराजो लिखेत्स्वयम् ॥ ३६८ ॥
लेख्यं स्वाभिमतं चैतद्विलिखेच्च पुरोहितः ।
उसके बाद युवराज 'इसे अङ्गीकार करना चाहिये' ऐसा स्वयं लिखे । और 'पुरोहित' 'यह लेख मुझे अभिमत है' ऐसा लिखे ।

स्वस्वमुद्राचिह्नितं च लेख्यान्ते कुर्युुरेव हि ॥ ३६९ ॥
अङ्गीकृतमिति लिखेन्मुद्रयेच्च ततो नृपः ।
**सब लेखों पर स्व-स्वमुद्राङ्कित करने का निर्देश—**और मन्त्री आदियों को लेख के अन्त में अपनी २ मुहर लगा देनी चाहिये । और अन्त में राजा भी 'यह अङ्गीकृत है' ऐसा लिखे और उस पर अपनी मुहर कर दे ।

कार्यान्तरस्याकुलत्वात्सम्यग्द्रष्टुं न शक्यते ॥ ३७० ॥
युवराजादिभिर्लेख्यं तदनेन च दर्शितम् ।
युवराज आदि को कार्यान्तर में (दूसरे २ कार्यों में) व्यस्तचित्त होने से अच्छी तरह से लेख के संपूर्ण विषयों को न देख सकने से 'इस आदमी ने जो दिखाया उस पर मैंने अच्छी तरह से विचार किया' यह भी मन्त्री आदि को लिखना चाहिये ।

समुद्द्रं विलिखेयुर्वै सर्वे मन्त्रिगणास्ततः ॥ ३७१ ॥
राजा दृष्टमिति लिखेद् द्राक् सम्यग्दर्शनाक्षमः ।
सभी मन्त्री लोगों को सभी लेखों पर मुहर से अङ्कित करके अपना २ हस्ताक्षर करना चाहिये और भली-भांति से देखने में असमर्थ राजा शीघ्र उन सब लेखों पर 'मैंने देखा' यह लिख दे क्योंकि उसका मन्त्री आदि के लेखों पर पूर्ण विश्वास रहता है ।

८ शु०

११४ | शुक्रनीतिः

आयमादौ लिखेत्सम्यग् व्ययं पश्चात्तथागतम् ॥ ३७२ ॥
वामे चायं व्ययं दक्षे पत्रभागे च लेखयेत् ।

पत्र में आय-व्यय लेखन का स्थान-विचार— बही खाते पर पहले सम्पूर्ण आय ( आमदनी ) लिखे पीछे जो व्यय हुआ हो उसे लिखे । और बही के बाईं ही ओर आय और दाहिनी ओर व्यय लिखे ।

यत्रोभौ व्यापकव्याप्यौ वामोर्ध्वभागगौ क्रमात् ॥ ३७३ ॥
आधाराधेयरूपौ वा कालार्थं गणितं हि तत् ।

जहां पर आय तथा व्यय ये दोनों अधिक या अल्प अथवा आश्रय तथा आश्रयी रूप से हों वहां पर उन दोनों को बही के वाम भाग में यथाक्रम ऊपर की ओर रखना चाहिये । ऐसी व्यवस्था नियम के लिये है ।

अधोधश्च क्रमात्तत्र व्यापकं वामतो लिखेत् ॥ ३७४ ॥
व्याप्यानां मूल्यमानादि तत्पंक्त्यां विनिवेशयेत् ।

उसमें व्यापक को वामभाग में क्रम से नीचे-नीचे लिखे । और व्याप्यों का मूल्य और मानादि उन्हीं की पंक्ति में लिखे ।

ऊर्ध्वगानां तु गणितमधः पंक्त्यां प्रजायते ॥ ३७५ ॥
यत्रोभौ व्यापकव्याप्यौ व्यापकत्वेन संस्थितौ ।

जहां पर वे दोनों व्यापक और व्याप्य बहुसंख्यक हों वहाँ पर ऊपरवालों की गणना नीचे की पंक्ति में होती है ।

व्यापकं बहुवृत्तित्वं व्याप्यं स्यान्न्यूनवृत्तिकम् ॥ ३७६ ॥
व्याप्याश्चावयवाः प्रोक्ता व्यापकोऽवयवी स्मृतः ।

व्यापक-व्याप्य के लक्षण— बहुत स्थलों पर रहनेवालों को 'व्यापक' कम स्थलों पर रहनेवालों को 'व्याप्य' कहते हैं । और व्याप्य अवयव ( अङ्ग ) एवं व्यापक ( अवयवी ) कहलाते हैं ।

सजातीनां च लिखनं कुर्याच्च समुदायतः ॥ ३७७ ॥
यथाप्राप्तं तु लिखनमाद्यन्तसमुदायतः ।

समान जातिवाले विषयों का समुदाय रूप से एक स्थान पर ही लिखना उचित होता है । और नाना प्रकार के विषयों का जहां जैसा मौका हो वहीं उसके अनुसार आदि, अन्त और सर्वत्र लिखना उचित है ।

व्यापकाश्च पदार्था वा यत्र संति स्थलानि हि ॥ ३७८ ॥
व्याप्यमायव्ययं तत्र कुर्यात्कालेन सर्वदा ।

जहां पर पदार्थ व्यापक ( बहुत) हों एवं स्थल भी बहुत हों वहां सर्वदा आय-व्यय को काल से व्याप्य कर लेना चाहिये ।

स्थानटिप्पनिका चैषा ततोऽन्यत् संघटिप्पनम् ॥ ३७९ ॥

द्वितीयोऽध्यायः ११५

विशिष्टसंज्ञितं तत्र व्यापकं लेख्यभाषितम् ।
स्थान-टिप्पणादि के भेद— यह स्थान-संबन्धी विवरण अन्य है और वस्तु-समूहसंबन्धी विवरण इससे अन्य है, उसमें लेखोक्त व्यापक की संज्ञा विशिष्ट है ।

आयाः कति व्ययाः कस्य शेषं द्रव्यस्य चास्ति वै ॥ ३८० ॥
विशिष्टसंज्ञकैरेषां संविज्ञानं प्रजायते ।
आय कितने हैं और व्यय कितने हैं और किस द्रव्य का कितना शेष है ? इन सबों का भली-भांति ज्ञान विशिष्टसंज्ञक पूर्वोक्त व्यापक लेख विशेष से होता है ।

आदौ लेख्यं यथा प्राप्तं पश्चात्तद्गणितं लिखेत् ॥ ३८१ ॥
यथा द्रव्यं च स्थानं चाधिकसंज्ञं च टिप्पणैः ।
पहले जो वस्तु जिस तरह से प्राप्त हो उसे लिखे उसके पश्चात् उसकी संख्या लिखनी चाहिये । उसके बाद विवरण के साथ जैसा द्रव्य, स्थान तथा अधिकसंज्ञक हो उसे लिखे ।

शेषायाव्ययविज्ञानं क्रमाल्लेख्यैः प्रजायते ॥ ३८२ ॥
स्थलायव्ययविज्ञानं व्यापकं स्थलतो भवेत् ।
शेषायाव्यय-स्थलायव्ययज्ञान— अवशिष्ट आय तथा व्यय का पूर्ण ज्ञान बहियों से होता है । और बहुत स्थानों के आय-व्यय का पूर्ण ज्ञान स्थानों के ज्ञान से ही हो जाता है ।

पदार्थस्य स्थलानि स्युः पदार्थाश्च स्थलस्य तु ॥ ३८३ ॥
व्याप्यास्तिष्ठन्त्यथैतेषां यथेष्टं लेखने नृणाम् ।
टिप्प्यादि लिखने का निर्देश— स्थल पदार्थके एवं पदार्थ स्थल के व्याप्य होते हैं। मनुष्यों को अपनी इच्छानुसार लिखने में टिप्प्यादि रखनी चाहिये ।

निश्चितान्यस्वामिकाद्या आया ये इतरान्तगाः ॥ ३८४ ॥
विशिष्टसंज्ञका ये च पुनरावर्तकादयः ।
व्ययाश्च परलेखान्ता अन्तिमव्यापकाश्च ते ॥ ३८५ ॥
पूर्वोक्त निश्चितान्यस्वामिक (निश्चित है अन्य स्वामी जिसका) से लेकर इतर (पार्थिव से भिन्न-जङ्गम-शुल्कादि) तक जितने आय हैं और विशिष्टसंज्ञक जो पुनरावर्तकादि व्यय हैं वे सब दूसरों के लेख हैं अन्त में जिसके ऐसे एवं अन्तिम व्यापकवाले (बहुत शेषवाले) हैं।

इच्छया ताडितं कृत्वादौ प्रमाणफलं ततः ।
प्रमाणभक्तं तल्लब्धं भवेदिच्छाफलं नृणाम् ॥ ३८६ ॥
पहले प्रमाण फल (सिद्धवस्तु) को इच्छा (साध्यवस्तु) से गुणित

११६ | शुक्रनीतिः

करके प्रमाण से भाग करने पर जो लब्धि हो उसे मनुष्यों का इच्छा-फल कहते हैं ।

समासतो लेख्यमुक्तं सर्वेषां स्मृतिसाधनम् ।

इस प्रकार से संक्षेप से सभी विषयों की स्मृति का साधन (कारण) लेख्य (बही या पत्र) का वर्णन किया गया ।

गुञ्जा माषस्तथा कर्षः पदार्धः प्रस्थ एव हि ॥ ३८७ ॥
यथोत्तरा दशगुणाः पञ्च प्रस्थस्य चाढकः ।
ततश्चाष्टाढकः प्रोक्तो ह्यर्मणस्ते तु विंशतिः ॥ ३८८ ॥
खारिका स्याद्विद्यते तद् देशे देशे प्रमाणकम् ।

**गुञ्जादिकों का लक्षण—**गुञ्जा (रत्ती), माष (माशा), कर्ष (एक रुपया भर), पदार्द्ध, प्रस्थ ये सब उत्तरोत्तर क्रम से दशगुने होते हैं अर्थात् १० गुञ्जाओं का १ माष, १० माषों का १ कर्ष, १० कर्षों का १ पदार्द्ध, १० पदार्द्धों का १ प्रस्थ होता है । ५ प्रस्थों का १ आढक, १० आढकों का १ अर्मण, २० अर्मणों का १ खारिका (खारी) होती है । देश-भेद से ये परिमाणों में भिन्नतायें होती हैं ।

पञ्चाङ्गुलाबटं पात्रं चतुरङ्गुलविस्तृतम् ॥ ३८९ ॥
प्रस्थपादं तु तज्ज्ञेयं परिमाणे सदा बुधैः ।

**प्रस्थपाद का लक्षण—**५ अङ्गुल गहरा, ४ अङ्गुल चौड़ा जो पात्र होता है, उसे पण्डित लोग सदा नापने में 'प्रस्थपाद' कहते हैं। इसी को लोक में 'माना' भी कहते हैं ।

ऊर्ध्वांकश्च यथासंज्ञस्त्वधस्थाश्च वामगाः ॥ ३९० ॥
क्रमात्स्वदशगुणिताः परार्द्धान्ताः प्रकीर्त्तिताः ।

**संख्या का प्रमाण—**संज्ञानुसार ऊपर लिखे हुये अङ्क के नीचे बाईं ओर एक २ इकाई क्रम से बढ़ाने पर अपने से दशगुणी अधिक परार्द्ध पर्यन्त अङ्कों की गिनती होती है ।

न कर्तुं शक्यते संख्यासंज्ञा कालस्य दुर्गमात् ॥ ३९१ ॥
ब्रह्मणो द्विपरार्धं तु आयुरुक्तं मनीषिभिः ।

**संख्या की अनन्तता—**काल की समाप्ति होना असंभव है अतः संख्या की संज्ञा परार्द्ध से अधिक नहीं हो सकती है। और विद्वानों ने ब्रह्मा की आयु का प्रमाण दो परार्द्ध तक कहा है क्योंकि परार्द्ध से अतिरिक्त संख्या की संज्ञा नहीं है ।

एको दश शतं चैव सहस्रं चायुतं क्रमात् ॥ ३९२ ॥
नियुतं प्रयुतं कोटिरर्बुदं चाब्जखर्वकौ ।

द्वितीयोऽध्यायः ११८

द्वितीयोऽध्यायः ११८

निखर्वपद्मशङ्खाब्धि-मध्यमान्तपरार्धकाः ॥ ३६३ ॥ एकादि-परार्ध तक संख्याओं के नाम—एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, नियुत, प्रयुत, कोटि, अर्बुद, अब्ज, खर्व, निखर्व, पद्म, शङ्ख, अब्धि, मध्य, अन्त, परार्द्ध ये सब संख्याओं की संज्ञायें हैं।

कालमानं त्रिधा ज्ञेयं चान्द्रं सौरं च सावनम्। भृतिदाने सदा सौरं चान्द्रं कौसीदवृद्विषु ॥ ३६४ ॥ कल्पयेत्सावनं नित्यं दिनभृत्येष्ववधौ सदा। कालमान का त्रैविध्य एवं चान्द्रादिकों की व्यवस्था—चान्द्र (चन्द्र की वृद्धि-क्रम से शुक्ल १ प्रतिपदा से अमावस्या ३० पर्यन्त) मास, सौर (एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति पर्यन्त), सावन (जिस दिन से कोई कार्य आरम्भ किया जाता है और जिस दिन समाप्त होता है वहाँ तक दिन की संख्या के अनुसार गणना करना—इसमें पूरे ३० दिन का १ मास होता है) इन भेदों से काल मान ३ प्रकार का होता है। वेतन देने में सदा सौर मान का, ऋण-व्यवहार में नित्य चान्द्रमान का एवं दैनिक मजदूरों को मजदूरी देने और अवधि (इतने दिन तक कार्य करो ऐसी अवधि) में सदा सावन मान का व्यवहार करना चाहिये।

कार्यमाना कालमाना कार्यकालामित्रिधा ॥ ३९५ ॥ भृतिरुक्ता तु तद्विज्ञैः सा देया भाषिता यथा। भृति के ३ प्रकारों का निर्देश—कार्यमाना (कार्य के परिमाण के अनुसार दी जानेवाली), कालमाना (काल के परिमाण के अनुसार दी जानेवाली), कार्यकालमिति (कार्य तथा काल के प्रमाणानुसार दी जानेवाली) इन भेदों से भृति (मजदूरी या वेतन) ३ प्रकार की पण्डितों ने कही है। जैसी कही है वैसी हिसाब करके भृति देनी चाहिये।

अयं भारस्त्वया तत्र स्थाप्यस्त्वेतावतीं भृतिम् ॥ ३६६ ॥ दास्यामि कार्यमाना सा कीर्तिता तद्विदेशकैः। कार्यमानादिकों के लक्षण—'यह भार यहां से उठाकर वहां पर रख दो, तुम्हें इतनी मजदूरी दी जायगी' यह 'कार्यमाना' भृति पण्डितों ने कही है।

वत्सरे वत्सरे वापि मासि मासि दिने दिने ॥ ३६७ ॥ एतवतीं भृतिं तेऽहं दास्यामीति च कालिका। 'प्रतिवर्ष प्रतिमास एवं प्रतिदिन इतनी भृति तुम्हे मैं दूंगा' इसे 'कालिका' (कालमाना) भृति कहते हैं।

एतावता कार्यमिदं कालेनापि त्वया कृतम् ॥ ३६८ ॥ भृतिमेतावतीं दास्ये कार्यकालमिता च सा।

११८शुक्रनीतिः

'इतने काल के अन्दर इस कार्य के करने पर मैं तुम्हें इतनी भृति दूंगा' इसे 'कार्यकालमिता' (कार्यकालमिति) भृति कहते हैं ।

न कुर्याद् भृतिलोपं तु तथा भृतिविलम्बनम् ॥ ३९९ ॥
अवश्यपोष्यभरणा भृतिर्मध्या प्रकीर्तिता ।
परिपोष्या भृतिः श्रेष्ठा समानाच्छादनार्थिका ॥ ४०० ॥
भवेदेकस्य भरणं यया सा हीनसंज्ञिका ।

मध्यमादि भृति के लक्षण— मध्य में भृति का लोप तथा भृति देने में विलम्ब नहीं करना चाहिये । अवश्यपोष्य (पोषण करने योग्य) माता-पिता आदि का भरण-पोषण जितने से हो जाय उतनी भृति को 'मध्या' और अवश्य पोष्य लोगों के अतिरिक्त अन्य लोगों का भी पोषण जिससे हो उस भृति को 'श्रेष्ठा' अन्न-वस्त्र मात्र के लिये केवल पर्याप्त होनेवाली भृति को 'समा' एवं जिससे केवल अपना ही भरण-पोषण हो सके उसे 'हीना' भृति कहते हैं ।

यथा यथा तु गुणवान्भृतकस्तद्भृतिस्तथा ॥ ४०१ ॥
संयोज्या तु प्रयत्नेन नृपेणात्महिताय वै ।

पोषण-योग्य भृति नियत करने का निर्देश— भृतक (भृत्य) जैसे २ गुणवान् (योग्य) होता जाय वैसे २ उसकी भृति (वेतन) अपने हित के लिये राजा को यत्नपूर्वक बढ़ा देनी चाहिये अथवा योग्यतानुसार वेतन देना चाहिये ।

अवश्यपोष्यवर्गस्य भरणं भृतकाद्भवेत् ॥ ४०२ ॥
तथा भृतिस्तु संयोज्या यथोग्या भृतकाय वै ।

वेतनभोगी के माता-पिता आदि अवश्य-पोषण करने योग्य लोगों का उसके द्वारा जितने वेतन से पालन-पोषण हो सके उतना वेतन योग्यतानुसार भृत्य के लिये नियुक्त करना चाहिये ।

ये भृत्या हीनभृतिकाः शत्रवस्ते स्वयंकृताः ॥ ४०३ ॥
परस्य साधकास्ते तु छिद्रकोशप्रजाहराः ।

हीन भृति देने से अनर्थ का निर्देश— जो अत्यल्प वेतन पानेवाले भृत्य हैं उन्हें राजा अत्यल्प वेतन देकर अपना शत्रु स्वयं बना लेता है क्योंकि वे पेट न भर सकने के कारण राजा का कार्य छोड़कर दूसरे का भी कार्य करके पेट भरते हैं और सदा राजा के छिद्र खोजते-फिरते हैं एवं उसके धन हरते हैं तथा प्रजा को लूटते हैं ।

अन्नाच्छादनमात्रा हि भृतिः शूद्रादिषु स्मृता ॥ ४०४ ॥
तत्पापभागन्यथा स्यात्पोषको मांसभोजिषु ।

शूद्रादिकों को आच्छादन मात्र देने का निर्देश— केवल शूद्रादि लोगों के

द्वितीयोऽध्यायः११६

लिये अन्न-वस्त्र मात्र के लिये पर्याप्त वेतन देना उचित कहा है अन्य के लिये नहीं। अन्यथा अर्थात् अन्न-वस्त्र से अतिरिक्त भी कार्यों का निर्वाह करनेवाला वेतन देने से मांसभोजी उन शूद्रादि लोगों का पोषण करनेवाला राजा उसके पाप कर्मों का स्वयं भी भागी (भोग करनेवाला) होता है।

यद्ब्राह्मणायोनापहृतं धनं तत्परलोकदम् ॥ ४०५ ॥
शूद्राय दत्तमपि यन्नरकायैव केवलम् ।

और ब्राह्मण यदि धन चुरा भी ले तो उससे जिसका धन चुराता है उस पुरुष को परलोक में शुभ फल मिलता है किन्तु यदि शूद्र को स्वयं धन दिया जाय तो उससे केवल दाता को नरक ही मिलता है।

मन्दो मध्यस्तथा शीघ्रस्त्रिविधं भृत्य उच्यते ॥ ४०६ ॥
समा मध्या च श्रेष्ठा च भृतिस्तेषां क्रमात्स्मृता ।

भृत्य के तीन भेद— मन्द (धीरे २ कार्य करनेवाला सुस्त), मध्य (न धीरे और न जल्दी कार्य करनेवाला) और शीघ्र (शीघ्र कार्य पूर्ण करनेवाला) इन भेदों से भृत्य ३ प्रकार का होता है। अतः इन सबों की क्रम से समा, मध्या तथा श्रेष्ठा नामक ३ प्रकार की भृतियों का देना उचित कहा है।

भृत्यानां गृहकृत्यार्थं दिवा यामं समुत्सृजेत् ॥ ४०७ ॥
निशि यामत्रयं नित्यं दिनभृत्येऽर्धयामकम् ।

भृत्यों को छुट्टी देने का नियम— भृत्यों को प्रतिदिन अपना गृहकृत्य करने के लिये दिन में १ प्रहर (३ घण्टे) की और रात्रि में तीन प्रहर की छुट्टी देनी चाहिये। और दिन-भृत्यों (रोजाना मजदूरी पर कार्य करनेवालों) को दिन में आधा प्रहर (डेढ़ घण्टे) की छुट्टी देना चाहिये।

तेभ्यः कार्यं कारयीत ह्युत्सवाद्यैर्विना नृपः ॥ ४०८ ॥
अत्यावश्यकं तूत्सवेऽपि हित्वा श्राद्धदिनं सदा ।

राजा उत्सवादि-दिनों को छोड़कर अन्य दिनों में उन भृत्यों से कार्य कराये और श्राद्धवाले दिन को छोड़कर अन्य उत्सवदिनों में भी अत्यावश्यक कार्यों को तो सदा कराये।

पादहीनां भृतिं त्वार्ते दद्यात्त्रैमासिकीं ततः ॥ ४०९ ॥
पञ्चवत्सरभृत्ये तु न्यूनाधिक्यं यथा तथा।

रोग के समय भृति देने का प्रकार— ५ वर्ष तक कार्य करनेवाले भृत्यों को पीड़ित अवस्था (बीमारी आदि) में चतुर्थांश कम वेतन दे और यदि १ वर्ष तक पीड़ित हों तो उन्हें ३ मास का वेतन (चतुर्थांश) दे। और पीड़ा आदि की जैसी न्यूनाधिकता हो उसके अनुसार वेतन देने में भी न्यूनाधिकता करनी चाहिये।

१२० : शुक्रनीति:

षाण्मासिकीं तु दीर्घार्त्ते तदूर्ध्वं न च कल्पयेत् ॥ ४१० ॥
नैव पक्षार्द्धमार्त्तस्य हातव्याऽल्पापि वै भृतिः ।
और दीर्घ काल तक ( १ वर्ष के ऊपर ) यदि पीड़ित हो तो उसे ६ मास का वेतन दे । इसके ऊपर न दे । और १ सप्ताह तक पीड़ित भृत्यों का वेतन भी कुछ नहीं काटना चाहिये ।

संवत्सरोषितस्यापि प्राज्ञः प्रतिनिधिस्ततः ॥ ४११ ॥
सुमहद्गुणिनं त्वार्त्तं भृत्यर्थं कल्पयेत्सदा ।
बार-बार रोगग्रस्त के स्थान पर प्रतिनिधि रखने का निर्देश—१ वर्ष तक छुट्टी लिये हुये भृत्य का प्रतिनिधि उसी के द्वारा निर्णीत रखना चाहिये । और अत्यन्त योग्य भृत्यों को बीमार पड़ने पर सदा उसको आधा वेतन देना चाहिये ।

सेवा विना नृपः पक्षं दद्याद् भृत्याय वत्सरे ॥ ४१२ ॥
सेवा के बिना ही भृति देने का निर्देश—राजा बिना सेवा कराये ही प्रतिवर्ष १ पक्ष का वेतन भृत्यों को देवे ।

चत्वारिंशत्समा नीताः सेवया येन वै नृपः ।
ततः सेवां विना तस्मै भृत्यर्थं कल्पयेत्सदा ॥ ४१३ ॥
यावज्जीवं तु तत्पुत्रेऽक्षमे बाले तदर्धकम् ।
भार्यायां वा सुशीलायां कन्यायां वा स्वश्रेयसे ॥ ४१४ ॥
जिस भृत्य ने सेवा करते हुये ४० वर्ष बितादिये राजा उसे विना सेवा लिये ( घर पर ) आजीवन पेंशन के रूप में आधा वेतन सदा देता रहे और उसके बच्चे जब तक कार्य करने योग्य न हों जाँय तब तक उन्हें अपने कल्याणार्थ भृत्य के आधे वेतन से आधा वेतन दे इसी भांति उस की सुशीला स्त्री तथा अविवाहिता कन्या को भी पेंशन का आधा वेतन देवे ।

अष्टमांशं पारितोष्यं दद्याद् भृत्याय वत्सरे ।
कार्याष्टमांशं वा दद्यात् कार्यं द्रागधिकं कृतम् ॥ ४१५ ॥
और भृत्य के लिये प्रतिवर्ष वेतन का अष्टमांश पारितोषिक-रूप में देवे । अथवा यदि शीघ्रता के साथ अधिक कार्य किया हो तो कार्य के अष्टमांश को पारितोषिक रूप में देवे अर्थात् उस कार्य के करने में जो वेतन हो उसका अष्टमांश देवे ।

स्वामिकार्ये विनष्टो यस्तत्पुत्रे तद् भृतिं वहेत् ।
यावद्वालोऽन्यथा पुत्रगुणान्दृष्ट्वा भृतिं वहेत् ॥ ४१६ ॥
स्वामी के कार्य करने में यदि भृत्य मरजाय तो उसका पुत्र उसके वेतन को प्राप्त करे, जब तक कि वह बड़ा कार्य करने योग्य न हो जाय, अन्यथा अर्थात्

षष्ठांशं वा चतुर्थांशं भृतेर्भृत्यस्य पालयेत्।

द्वितीयोऽध्यायः [१२१]

जब बड़ा हो जाय तो उसके गुणों को देखकर तदनुसार वेतन प्राप्त करे।

षष्ठांशं वा चतुर्थांशं भृतेर्भृत्यस्य पालयेत्।
दद्यात्तदधं भृत्याय द्वित्रिवर्षेऽखिलं तु वा ॥ ४१७ ॥

भृत्य के वेतन का षष्ठांश या चतुर्थांश काटकर राजा अपने यहां जमा करता रहे और जब दो-तीन वर्ष हो जाय तब आधी या पूरी रकम उसे दे देवे।

वाक्यपारुष्यान्न्यूनभृत्या स्वामी प्रबलदण्डतः।
भृत्यं प्रशिक्षयेन्नित्यं शत्रुत्वं त्वपमानतः ॥ ४१८ ॥

कटुभाषी भृत्य का भृति-दान-प्रकार—यदि स्वामी या राजा भृत्यों से कठोर बातें करता है या वेतन पूरा नहीं देता है या प्रबल दण्ड देता है किंवा अपमान करता है तो इन सब व्यवहारों से वह अपने भृत्यों को शत्रुता करना सिखाता है।

भृतिदानेन संतुष्टा मानेन परिवर्धिताः।
सान्त्विता मृदुवाचा ये न त्यजन्त्यधिपं हि ते ॥ ४१९ ॥

और समय पर वेतन देने से संतुष्ट किये हुये, संमान से गौरव पद पर पहुँचाये हुये, मृदु वचनों से समझाये हुये जो भृत्य हैं वे अपने स्वामी को नहीं छोड़ते हैं।

अधमा धनमिच्छन्ति धनमानौ तु मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम् ॥ ४२० ॥

जो केवल धन चाहते हैं वे 'अधम' जो धन तथा मान दोनों चाहते हैं वे 'मध्यम' एवं जो केवल मान चाहते हैं वे 'उत्तम' जन कहलाते हैं। क्योंकि बड़े लोगों का धन मान (आदर) ही है।

यथागुणान्स्वभृत्यांश्च प्रजाः संरक्षयेन्नृपः।
शाखाप्रदानतः कांश्चिदपरान् फलदानतः ॥ ४२१ ॥
अन्यान् सुचक्षुषा हास्यैस्तथा कोमलया गिरा।
सुभोजनैः सुवसनैस्ताम्बूलैश्च धनैरपि ॥ ४२२ ॥
कांश्चित् सुकुशलप्रश्नैरधिकारप्रदानतः।
वाहनानां प्रदानेन योग्याभरणदानतः ॥ ४२३ ॥
छत्रातपत्रचमरदीपिकानां प्रदानतः।
क्षमया प्रणिपातेन मानेनाभिगमेन च ॥ ४२४ ॥
सत्कारेण च ज्ञानेन ह्यादरेण शमेन च।
प्रेम्णा समीपवासेन स्वार्धासनप्रदानतः ॥ ४२५ ॥
सम्पूर्णासनदानेन स्तुत्योपकारकीर्तनात्।

१२२ | शुक्रनीतिः

राजा का भृत्य के संग वर्त्तन का वर्णन—राजा योग्यतानुसार भृत्यों एवं प्रजाजनों का मनोरञ्जन निम्नरीति से करे जैसे—किसी को शाखा-प्रदान ( यत्किंचित् देने ) से, किसी को फलदान ( यत्किंचित् से कुछ अधिक देने ) से, किसी को अच्छी दृष्टि से देखने से, किसी को हँसकर बात-चीत करने से, किसी को कोमल वचनों से, किसी को सुन्दर भोजन, सुन्दर वस्त्र, ताम्बूल ( पान का बीड़ा ) या धन देने से, किसी को अच्छी तरह से कुशल-प्रश्न करने से, किसी को किसी विभाग का अधिकार-प्रदान करने से, किसी को वाहन ( सवारी ) या योग्य आभूषण-प्रदान करने से, किसी को छात्र ( पक्षों का बना छाता ), आतपत्र ( वस्त्र का बना छाता ), चामर या दीपक-प्रदान करने से, किसी को क्षमा-प्रदान करने से, किसी को प्रणाम करने से, किसी को संमान के साथ उसके साथ गमन करने से, किसी को सत्कार करने से, किसी को शास्त्रीय प्रसङ्ग चलाने से, किसी को आदर, शान्ति या प्रेम-प्रदर्शन करने से, किसी को समीप में रहने से, किसी को अपने अर्द्धासन पर बैठाने से, किसी को संपूर्ण आसन-प्रदान करने से और किसी को स्तुति या उपकार का वर्णन करने से प्रसन्न करे ।

यत्कार्ये विनियुक्ता ये कार्याङ्कैरङ्कयेच्च तान् ॥ ४२६ ॥
लोहजैस्ताम्रजै रीतिभवै रजतसंभवैः ।
सौवर्णै रत्नजैर्वापि यथायोग्यैः स्वलाञ्छनैः ॥ ४२७ ॥
प्रविज्ञानाय दूरात्तु वस्त्रैश्च मुकुटैरपि ।

भृत्य को कार्य-मुद्रा से अंकित करने का निर्देश—राजा जो भृत्य जिस कार्य में नियुक्त किये गये हों, उन्हें दूर से यह अमुक कार्य में नियुक्त है, इसको फौरन जानने के लिये लोहा, तामा, पीतल, चांदी, सोना या रत्न के बने हुये, योग्यतानुसार अपने-अपने चिह्नों, वस्त्रों और मुकुटों के द्वारा कार्यों ( विभागों ) के चिह्नों से युक्त करे ।

वाद्यवाहनभेदैश्च भृत्यान्कुर्यात् पृथक्पृथक् ॥ ४२८ ॥
स्वविशिष्टं च यच्चिह्नं न दद्यात् कस्यचिन्नृपः ।

भृत्यों को विशिष्ट राजचिह्न न देने का निषेध—और राजा विशिष्ट अधिकारियों को बाजे और सवारियों की भिन्नता से अर्थात् इस अधिकारी के यातायात के समय ऐसे बाजे होने चाहिये । और इस अधिकारी के यातायात में ऐसी सवारी होना चाहिये—इस भांति की विशेषताओं से पृथक्-पृथक् करे और राजा अपने विशिष्ट राजचिह्न छत्र-मुकुटादि को किसी के लिये न देवे ।

दश प्रोक्ताः पुरोधाद्या ब्राह्मणाः सर्व एव ते ॥ ४२६ ॥

द्वितीयोऽध्यायः १२३

द्वितीयोऽध्यायः १२३

अभावे क्षत्रिया योज्यास्तदभावे तयोरुजाः ।
नैव शूद्रास्तु संयोज्या गुणवन्तोपि पार्थिवैः ॥ ४३० ॥

१० प्रकृति पुरोहितादियों का जाति-नियम— पुरोहित आदि जो पूर्वोक्त १० प्रकृतियां ( प्रधान ) हैं उनके पद पर रहनेवाले सभी ब्राह्मण ही नियुक्त करने चाहिये । ब्राह्मण के अभाव में क्षत्रिय, क्षत्रिय के अभाव में वैश्यों की नियुक्ति करनी चाहिये । और राजा को गुणवान ( योग्य ) शूद्रों की नियुक्ति उक्तपदों पर नहीं ही करनी चाहिये ।

भागग्राही क्षत्रियस्तु साहसाधिपतिश्च सः ।
ग्रामपो ब्राह्मणो योज्यः कायस्थो लेखकस्तथा ॥ ४३१ ॥
शुल्कग्राही तु वैश्यो हि प्रतिहारश्च पादजः ।
सेनाधिपः क्षत्रियस्तु ब्राह्मणस्तदभावतः ॥ ४३२ ॥

भागग्राही और साहसाधिपति आदि पद के लिये क्षत्रियादि रखने का निर्देश— और कर ( मालगुजारी ) वसूल करनेवाले तथा शासन कार्य करने-वाले लोगों के पद पर क्षत्रिय, ग्रामाध्यक्ष पद पर ब्राह्मण नियुक्त करना चाहिये । और लेखक पद पर कायस्थ,, शुल्क ( चुंगी आदि ) वसूल करने के लिये वैश्य, द्वारपाल पद पर शूद्र और सेनापति पद पर क्षत्रिय उसके अभाव में ब्राह्मण नियुक्त करना चाहिये ।

न वैश्यो न च वै शूद्रः कातरश्च कदाचन ।
सेनापतिः शूर एव योज्यः सर्वासु जातिषु ॥ ४३३ ॥

सेनापति पद पर शूरमात्र को रखने का निर्देश— और कभी वैश्य, शूद्र या कायर पुरुष सेनापति नहीं बनाना चाहिये क्योंकि सभी जातियों में जो शूर होता है वही सेनापति पद पर नियुक्त होता है ।

ससङ्करचतुर्वर्णधर्मोऽयं नैव पावनः ।
यस्य वर्णस्य यो राजा स वर्णः सुखमेधते ॥ ४३४ ॥

संकीर्ण जातियों के सहित चारो ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ) वर्णों का यह धर्म है । किन्तु यवनों का नहीं है । अर्थात् उक्तरीति से अधिकारी गणों की नियुक्ति में जाति का विचार यवनों में नहीं है और जिस जाति का राजा है उस जाति के लोग उसके राज्य में सुखी होते हैं ।

नोपकृतं मन्यते स्म न तुष्यति सुसेवनैः ।
कथान्तरे न स्मरति शङ्कते प्रलपत्यपि ॥ ३३५ ॥
क्षुब्धस्तनोति मर्माणि तं नृपं भृत्यकस्त्यजेत् ।

भृत्य के लिये त्यागने योग्य राजा के लक्षण— जो किसी के उपकार को

१२४शुक्रनीतिः

नहीं मानता है और जो अच्छी से अच्छी सेवा करने पर भी नहीं संतुष्ट होता है। एवं बात-चीत के प्रसङ्ग में भृत्य का कभी स्मरण नहीं करता है प्रत्युत उस पर शङ्का करता है एवं वृथा बात-चीत करता है और कुपित होकर मर्मवेधी वाक्य बोलता है, ऐसे राजा को भृत्य छोड़ दे (उसकी नोकरी न करे)।

लक्षणं युवराजादेः कृत्यमुक्तं समासतः ॥ ४३६ ॥ इति शुक्रनीतौ युवराजादिलक्षणं नाम द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः।

इस प्रकार से युवराजादि का लक्षण तथा कृत्य संक्षेप से कहा गया।

इति शुक्रनीति-भाषानुवाद में युवराजादि-लक्षण नामक द्वितीय अध्याय समाप्त।


तृतीयोऽध्यायः

अथ साधारणं नीतिशास्त्रं सर्वेषु चोच्यते ।
सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः ॥ १ ॥

सर्वों के सुख के अर्थ प्रवृत्ति का निर्देश— अब युवराजादि के लक्षणादि का निरूपण करने के बाद राजा-प्रजा सभी लोगों के लिये नीति शास्त्र का वर्णन करते हैं। सभी प्राणियों को किसी भी कार्य करने की जितनी प्रवृत्तियां हैं वे सभी आत्मसुख के लिये होती हैं।

सुखं च न विना धर्मात्तस्माद्धर्मपरो भवेत् ।
त्रिवर्गशून्यं नारम्भं भजेत्तं चाविरोधयन् ॥ २ ॥
अनुयायात्प्रतिपदं सर्वधर्मेषु मध्यमः ।

धर्म के बिना सुख न मिलने का निर्देश— धर्म के बिना सुख नहीं होता है अतः धर्म में तत्पर होना चाहिये। धर्म, अर्थ, काम इनके वर्ग को 'त्रिवर्ग' कहते हैं। इससे शून्य किसी कार्य को न करे। उक्त त्रिवर्ग के विरोध को बचाते हुये मध्यवर्ती होकर सभी कार्यों में प्रतिपद् पर त्रिवर्ग का अनुसरण करे अर्थात् त्रिवर्ग का पालन न छोड़े।

नीचरोमनखश्मश्रुर्निर्मलांघ्रिमलायनः ॥ ३ ॥
स्नानशीलः सुसुरभिः सुवेशोऽनुल्बणोज्ज्वलः ।
धारयेत्सततं रत्नसिद्धमन्त्रमहौषधीः ॥ ४ ॥

सर्व-साधारण के लिये विहिताचरण का निर्देश— रोम (बाल)-दाढ़ी-मूंछ तथा नखों को नीच (छोटे २ अर्थात् बड़े हुये नहीं) एवं पैर तथा कान, नाक, आंख, मुख आदि को स्वच्छ किये हुये, स्नान किये हुये, सुगन्धित इत्र आदि लगाये हुये, अनुद्धत तथा उज्ज्वल सुन्दर वेश बनाये हुये, रत्न, सिद्ध मन्त्र एवं महौषधियों को नित्य धारण करना चाहिये।

सातपत्रपदत्राणो विचरेद्युगमात्रदृक् ।
निशि चात्ययिके कार्ये दण्डी मौली सहायवान् ॥ ५ ॥

छाता तथा जूता धारण किये हुये, युग (बैल आदि को रथ में जोतने के समय उनके कन्धों पर रखनेवाला काष्ठ) के बराबर दूरी पर दृष्टि रख कर मार्ग चलना चाहिये। रात्रि में किसी दुर्घटनाबश यदि घर से निकलना पड़े तो हाथ में दण्ड लेकर तथा सिर पर पगड़ी बांध कर एवं साथ में किसी सहायक का लेना उचित है।

न वेगितोऽन्यकार्यः स्यान्न वेगानीरयेद् बलात् ।

१२६ | शुक्रनीतिः

भक्त्या कल्याणमित्राणि संवेतेतरदूरगः ॥ ६ ॥
**निषिद्धाचरणों का निर्देश—**मल-मूत्रादि का वेग रोके हुये, किसी कार्य के करने में तत्पर न हो, और उक्त वेगों को बलपूर्वक न रोके तथा इतर (दुर्जनादि) से दूर रहकर कल्याणकारी कार्य और मित्रों का भक्तिपूर्वक सेवन करे।

हिंसास्तेयान्यथाकाम—पैशुन्यं परुषानृतम् ।
सम्भिन्नालापव्यापादमभिध्यादृग्विपर्ययम् ॥ ७ ॥
पापकर्मेति दशधा कायवाङ्मानसैस्त्यजेत् ।
**दशविध पापों का निर्देश—**हिंसा (किसी की हत्या या कष्ट पहुँचाना), स्तेय (चोरी), अन्यथाकाम (अवैध रीति से मैथुन), पैशुन्य (चुगलखोरी), निष्ठुर भाषण, झूठा व्यवहार, भेदयुक्त बातों से दिल को तोड़ना, अविनाश (अशिष्टता), नास्तिकता, अवैध आचरण ये १० प्रकार के पाप कर्म हैं। इन्हें शरीर, वाणी तथा मन से छोड़ देना उचित है।

धर्मकार्यं यतन् शक्त्या नो चेत् प्राप्नोति मानवः ॥ ८ ॥
प्राप्तो भवति तत्पुण्यमत्र वै नास्ति संशयः ।
यदि मनुष्य यथाशक्ति प्रयत्न करने पर भी धर्मकार्य का फल (बीच में विघ्न होने से) नहीं प्राप्त करता है तो वह इस संसार में दूसरे किसी समय में अवश्य उस पुण्यकार्य के फल को प्राप्त करता है—इसमें कोई सन्देह नहीं है।

मनसा चिन्तयन् पापं कर्मणा नाभिरोचयेत् ॥ ९ ॥
तत् प्राप्नोति फलं तस्येत्येव धर्मविदो विदुः ।
'मनसे पाप-कर्म की चिन्ता करता हुआ भी मनुष्य कभी उसे कार्य रूप में परिणत करने की इच्छा न करे। क्योंकि पापकर्म करने पर उसके फल को वह अवश्य पाता है' ऐसा धर्म के जाननेवाले पण्डितजन कहते हैं।

अवृत्तिव्याधि-शोकार्त्ताननुवर्तेत शक्तितः ॥ १० ॥
आत्मवत् सततं पश्येदपि कीटपिपीलिकम् ।
**दरिद्री आदिकों का रक्षण करने का निर्देश—**जीविका से रहित तथा व्याधि या शोक से आत्तंलोगों की यथाशक्ति सहायता पहुँचाकर उपकार करना चाहिये एवं कीड़े तथा चींटियों तक के भी सुख-दुःखादि को अपनी ही भाँति समझना चाहिये।

उपकारप्रधानः स्यादपकारपरेऽप्यरौ ॥ ११ ॥
संपद्विपत्स्वेकमना हेतावीर्षेत् फले न तु ।
अपने साथ अपकार करने में तत्पर शत्रु के साथ भी प्रधान रूप से

तृतीयोऽध्यायः १२७

उपकार ही करना चाहिये। और संपत्ति ( अभ्युदय ) तथा विपत्ति पड़ने पर दोनों में एकसी मन की दशा रखनी चाहिये एवं किसी उन्नतिविषयक कारणों के विषय में ही करने की ईर्ष्या रखनी चाहिये। उन्नति रूप फल के विषय में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये अर्थात् यदि कोई धनी हुआ तो इसकी ईर्ष्या करनी चाहिये कि 'मैं भी वैसा क्यों न उद्योग करूं कि धनी बन जाऊं' किन्तु धन के साथ ईर्ष्या करना अनुचित है।

काले हितं मितं ब्रूयादविसंवादि पेशलम् ॥ १२ ॥
पूर्वाभिभाषी सुमुखः सुशीलः करुणामृदुः ।

समय पर हित और मित वचन कहने का निर्देश— अहङ्कार-शून्य होकर पहले स्वयं वार्तालाप करना चाहिये। मुख की मुद्रा अच्छी रखनी चाहिये। सुशील तथा करुणा से कोमल चित्त होना चाहिये। और योग्यकाल उपस्थित होने पर थोडे शब्दों में, सुसङ्गत ( अटपटाङ्ग नहीं ) और मधुर वचन बोलना चाहिये।

नैकः सुखी न सर्वत्र विश्रब्धो न च शङ्कितः ॥ १३ ॥

अकेले सुखों का उपभोगादि करने का निषेध— अकेले सुखों का उपभोग नहीं करना चाहिये। सर्वत्र विश्वास या शङ्का रखना उचित नहीं है अर्थात् जो उसके योग्य हों उन पर विश्वास या शंका रखना उचित है।

न कञ्चिदात्मनः शत्रुं नात्मानं कस्यचिद्रिपुम् ।
प्रकाशयेन्नापमानं न च निःस्नेहतां प्रभोः ॥ १४ ॥

अपने अपमान को प्रकाशित न करने का निषेध— किसी को अपना शत्रु होकर भी दूसरे को नहीं बताना चाहिये तथा अपने स्वामी का अपने ऊपर किया हुआ अपमान तथा स्नेह का अभाव यदि हो तो उसे भी किसी से प्रकाशित नहीं करना चाहिये।

जनस्याशयमालक्ष्य यो यथा परितुष्यति ।
तं तथैवानुवर्तेत पराराधनपण्डितः ॥ १५ ॥

पराराधन-पण्डितों के व्यवहार का निर्देश— दूसरे को खुश रखने में निपुण व्यक्ति को चाहिये कि वह लोगों के भावों को समझकर तदनुसार जो जैसे खुश हो उसके साथ वैसा व्यवहार करे।

न पीडयेदिन्द्रियाणि न चैतान्यतिलालयेत् ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ १६ ॥

इन्द्रियों को वश में रखने का निर्देश— चक्षु आदि इन्द्रियों को उनके विषयों से बलपूर्वक अलग रख कर अधिक पीडित नहीं एवं विषयों में अधिक आसक्ति रख कर लालित भी नहीं करना चाहिये अर्थात् नियमपूर्वक रहकर समभाव

१२८शुक्रनीतिः

से विषय भोग करना चाहिये । और इन्द्रियां यदि अधिक प्रबल हो जावें तो वे जबरदस्ती मन को अपनी ओर आकृष्ट कर लेती हैं अत एव इनका सदा दमन करते रहना उचित है ।

एणो गजः पतङ्गश्च भृङ्गो मीनस्तु पञ्चमः ।
शब्दस्पर्शरूपगन्धरसैरेते हताः खलु ॥ १७ ॥

**इन्द्रियों को वश में न रखने से अनर्थ का निर्देश—**हरिण, हस्ती, फतरिङ्गे (पांखी), भौंरे, मछलियां ये पांचों क्रम से शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध तथा रस इन पांचों विषयों का उपभोग करने से निश्चय मारे जाते हैं, जैसे हरिण-स्वर युक्त सुन्दर गान सुनने में फंसकर नहीं भागता हुआ व्याध से मारा जाता है । हस्ती—हस्तिनी के स्पर्श करने में आसक्त होने से नहीं भागता हुआ बहकानेवाले से पकड़ा जाता है । पतङ्ग (फतरिङ्गा)—दीपक की शिखा का सुन्दर रूप देखने से उन्मत्त होकर उसी पर गिर जाने से मर जाता है । भृङ्ग—गन्ध के लोभ से कमल के संकुचित होने पर उसी के पत्तों के अन्दर बन्द हो जाता है । मत्स्य—मांस के रस का आस्वाद लेने में फंस कर कांटा चुभ जाने से तड़फड़ा कर मर जाता है ।

एषु स्पर्शो वरस्त्रीणां स्वान्तहारी मुनेरपि ।
अतोऽप्रमत्तः सेवेत विषयांस्तु यथोचितान् ॥ १८ ॥
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नात्यन्तैकान्तिकं वसेत् ।

**स्त्रियों के स्पर्श की भी अनर्थकारिता का निर्देश—**इन शब्दादि विषयों में से उत्तम सुन्दिरयों का स्पर्श सद्-असत् का विचार करनेवाले मुनियों के भी मन को हरण करनेवाला होता है । अतः असावधानी न रखते हुये यथोचित रीति से उक्त विषयों का सेवन करना चाहिये क्योंकि अधिक सेवन से विनाश होता है । और माता, बहन या लड़की के साथ भी अधिकतर एकान्त स्थान में नहीं रहना चाहिये ।

यथासम्बन्धमाहूयादाभाष्याश्वास्य वै स्त्रियम् ॥ १९ ॥
स्वीयां तु परकीयां वा सुभगे भगिनीति च ।

**स्त्रियों के प्रति सम्बोधन-प्रकार—**और अपने या दूसरे के संपर्क की स्त्री को सम्बन्धानुसार हे सुभगे ! वा हे भगिनि ! इत्यादि रूप से पुकारकर आश्वासन देते हुये बुलाना चाहिये ।

सहवासोऽन्यपुरुषैः प्रकाशमपि भाषणम् ॥ २० ॥
स्वातन्त्र्यं न क्षणमपि ह्यावासोऽन्यगृहे तथा ।

**एक क्षण भी स्त्रियों के स्वातन्त्र्य का निषेध—**अन्य पुरुषों के साथ अधिक सहवास रखना या प्रकाश रूप से (सामने होकर) भी बात चीत करना,

तृतीयोऽध्यायः १२५

क्षण भर के लिये भी स्वतन्त्रता देना या दूसरे के घर में निवास करने देना, ये सब स्त्रियों के लिये दोष हैं अतः इन से दूर रखना उचित है।

भर्त्रा पिताऽथवा राज्ञा पुत्रश्वशुरबान्धवैः ॥ २१ ॥
स्त्रीणां नैव तु देयः स्याद् गृहकृत्यैर्विना क्षणः ।

पति, पिता, राजा, पुत्र, श्वशुर, बान्धव इन सबों के लिये उचित है कि वे गृहकृत्यों के अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिये थोड़ा भी समय फुर्सत का स्त्रियों को नहीं ही देवें।

चण्डं षण्ढं दण्डशीलमकामं सुप्रवासिनम् ॥ २२ ॥
सुदरिद्रं रोगिणं च ह्यन्यस्त्रीनिरतं सदा ।
पतिं दृष्ट्वा विरक्ता स्यान्नारी वाऽन्यं समाश्रयेत् ॥ २३ ॥
त्यक्त्वैतान् दुर्गुणान् यत्नात्ततो रक्ष्याः स्त्रियो नरैः ।

यत्नपूर्वक स्त्रियों की रक्षा करने का निर्देश— चण्ड (अत्यन्त क्रोधी), षण्ढ (नपुंसक), सदा दण्ड देनेवाले, अनुराग-रहित, अधिक प्रवास में रहनेवाले (पत्नी से अलग विदेश में रहनेवाले), अत्यन्त दरिद्र, रोगी, सदा पर-स्त्री में आसक्त रहनेवाले अपने पति को देखकर स्त्री विरक्त हो जाती है अथवा अन्य पुरुष का आश्रय पकड़ लेती है अतः इन दुर्गुणों को यत्नपूर्वक छोड़कर मनुष्यों को सदा स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिये।

वस्त्रान्नभूषणं प्रेममृदुवाग्भिश्च शक्तितः ॥ २४ ॥
स्वात्यन्तसन्निकर्षेण स्त्रियं पुत्रं च रक्षयेत् ।

वस्त्र, अन्न, आभूषण, प्रेम तथा मृदु वचनों से यथाशक्ति व्यवहार करते हुये अपने अत्यन्त समीप में रखकर स्त्री तथा पुत्र की रक्षा करे।

चैत्यपूज्यध्वजाशस्तच्छायाभस्मतुषाशुचीन् ॥ २५ ॥
नाक्रामेच्छर्करालोष्टबलिस्नानभुवोऽपि च ।

चैत्यादिकों के लंघन का निषेध— चैत्य (रास्ते के देवाधिष्ठित वृक्ष विशेष), गुरुजन, पताका, अप्रशस्त वस्तुओं की छाया, भस्म, भूसी, अपवित्र-वस्तु, बालू (कंकरीली भूमि), ढेला, बलि (पूजा द्रव्य) तथा स्नानभूमि इनका उल्लङ्घन करना उचित नहीं है।

नदीं तरेन्न बाहुभ्यां नाग्निं स्कन्नमभिव्रजेत् ॥ २६ ॥
सन्दिग्धनावं वृक्षं च नारोहेद् दुष्टयानवत् ।

तैर कर नदी को पार आदि करने का निषेध— बाहुओं से तैर कर नदी को नहीं पार करना चाहिये। ढकी हुई अग्नि को पैर से नहीं मसलना चाहिये पाठान्तर में अग्नि की राशि की तरफ नहीं जाना चाहिये। पार ले जाने में समर्थ है या नहीं ऐसी सन्देहयुक्त नौका पर और चढ़ने पर भार

६ शु०