शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ११८ | शुक्रनीतिः |
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'इतने काल के अन्दर इस कार्य के करने पर मैं तुम्हें इतनी भृति दूंगा' इसे 'कार्यकालमिता' (कार्यकालमिति) भृति कहते हैं ।
न कुर्याद् भृतिलोपं तु तथा भृतिविलम्बनम् ॥ ३९९ ॥
अवश्यपोष्यभरणा भृतिर्मध्या प्रकीर्तिता ।
परिपोष्या भृतिः श्रेष्ठा समानाच्छादनार्थिका ॥ ४०० ॥
भवेदेकस्य भरणं यया सा हीनसंज्ञिका ।
मध्यमादि भृति के लक्षण— मध्य में भृति का लोप तथा भृति देने में विलम्ब नहीं करना चाहिये । अवश्यपोष्य (पोषण करने योग्य) माता-पिता आदि का भरण-पोषण जितने से हो जाय उतनी भृति को 'मध्या' और अवश्य पोष्य लोगों के अतिरिक्त अन्य लोगों का भी पोषण जिससे हो उस भृति को 'श्रेष्ठा' अन्न-वस्त्र मात्र के लिये केवल पर्याप्त होनेवाली भृति को 'समा' एवं जिससे केवल अपना ही भरण-पोषण हो सके उसे 'हीना' भृति कहते हैं ।
यथा यथा तु गुणवान्भृतकस्तद्भृतिस्तथा ॥ ४०१ ॥
संयोज्या तु प्रयत्नेन नृपेणात्महिताय वै ।
पोषण-योग्य भृति नियत करने का निर्देश— भृतक (भृत्य) जैसे २ गुणवान् (योग्य) होता जाय वैसे २ उसकी भृति (वेतन) अपने हित के लिये राजा को यत्नपूर्वक बढ़ा देनी चाहिये अथवा योग्यतानुसार वेतन देना चाहिये ।
अवश्यपोष्यवर्गस्य भरणं भृतकाद्भवेत् ॥ ४०२ ॥
तथा भृतिस्तु संयोज्या यथोग्या भृतकाय वै ।
वेतनभोगी के माता-पिता आदि अवश्य-पोषण करने योग्य लोगों का उसके द्वारा जितने वेतन से पालन-पोषण हो सके उतना वेतन योग्यतानुसार भृत्य के लिये नियुक्त करना चाहिये ।
ये भृत्या हीनभृतिकाः शत्रवस्ते स्वयंकृताः ॥ ४०३ ॥
परस्य साधकास्ते तु छिद्रकोशप्रजाहराः ।
हीन भृति देने से अनर्थ का निर्देश— जो अत्यल्प वेतन पानेवाले भृत्य हैं उन्हें राजा अत्यल्प वेतन देकर अपना शत्रु स्वयं बना लेता है क्योंकि वे पेट न भर सकने के कारण राजा का कार्य छोड़कर दूसरे का भी कार्य करके पेट भरते हैं और सदा राजा के छिद्र खोजते-फिरते हैं एवं उसके धन हरते हैं तथा प्रजा को लूटते हैं ।
अन्नाच्छादनमात्रा हि भृतिः शूद्रादिषु स्मृता ॥ ४०४ ॥
तत्पापभागन्यथा स्यात्पोषको मांसभोजिषु ।
शूद्रादिकों को आच्छादन मात्र देने का निर्देश— केवल शूद्रादि लोगों के