भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 205

द्वितीयोऽध्यायः११६

लिये अन्न-वस्त्र मात्र के लिये पर्याप्त वेतन देना उचित कहा है अन्य के लिये नहीं। अन्यथा अर्थात् अन्न-वस्त्र से अतिरिक्त भी कार्यों का निर्वाह करनेवाला वेतन देने से मांसभोजी उन शूद्रादि लोगों का पोषण करनेवाला राजा उसके पाप कर्मों का स्वयं भी भागी (भोग करनेवाला) होता है।

यद्ब्राह्मणायोनापहृतं धनं तत्परलोकदम् ॥ ४०५ ॥
शूद्राय दत्तमपि यन्नरकायैव केवलम् ।

और ब्राह्मण यदि धन चुरा भी ले तो उससे जिसका धन चुराता है उस पुरुष को परलोक में शुभ फल मिलता है किन्तु यदि शूद्र को स्वयं धन दिया जाय तो उससे केवल दाता को नरक ही मिलता है।

मन्दो मध्यस्तथा शीघ्रस्त्रिविधं भृत्य उच्यते ॥ ४०६ ॥
समा मध्या च श्रेष्ठा च भृतिस्तेषां क्रमात्स्मृता ।

भृत्य के तीन भेद— मन्द (धीरे २ कार्य करनेवाला सुस्त), मध्य (न धीरे और न जल्दी कार्य करनेवाला) और शीघ्र (शीघ्र कार्य पूर्ण करनेवाला) इन भेदों से भृत्य ३ प्रकार का होता है। अतः इन सबों की क्रम से समा, मध्या तथा श्रेष्ठा नामक ३ प्रकार की भृतियों का देना उचित कहा है।

भृत्यानां गृहकृत्यार्थं दिवा यामं समुत्सृजेत् ॥ ४०७ ॥
निशि यामत्रयं नित्यं दिनभृत्येऽर्धयामकम् ।

भृत्यों को छुट्टी देने का नियम— भृत्यों को प्रतिदिन अपना गृहकृत्य करने के लिये दिन में १ प्रहर (३ घण्टे) की और रात्रि में तीन प्रहर की छुट्टी देनी चाहिये। और दिन-भृत्यों (रोजाना मजदूरी पर कार्य करनेवालों) को दिन में आधा प्रहर (डेढ़ घण्टे) की छुट्टी देना चाहिये।

तेभ्यः कार्यं कारयीत ह्युत्सवाद्यैर्विना नृपः ॥ ४०८ ॥
अत्यावश्यकं तूत्सवेऽपि हित्वा श्राद्धदिनं सदा ।

राजा उत्सवादि-दिनों को छोड़कर अन्य दिनों में उन भृत्यों से कार्य कराये और श्राद्धवाले दिन को छोड़कर अन्य उत्सवदिनों में भी अत्यावश्यक कार्यों को तो सदा कराये।

पादहीनां भृतिं त्वार्ते दद्यात्त्रैमासिकीं ततः ॥ ४०९ ॥
पञ्चवत्सरभृत्ये तु न्यूनाधिक्यं यथा तथा।

रोग के समय भृति देने का प्रकार— ५ वर्ष तक कार्य करनेवाले भृत्यों को पीड़ित अवस्था (बीमारी आदि) में चतुर्थांश कम वेतन दे और यदि १ वर्ष तक पीड़ित हों तो उन्हें ३ मास का वेतन (चतुर्थांश) दे। और पीड़ा आदि की जैसी न्यूनाधिकता हो उसके अनुसार वेतन देने में भी न्यूनाधिकता करनी चाहिये।

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित) · पृष्ठ 205, कुल 526 में से · BharatKosha