शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२० : शुक्रनीति:
षाण्मासिकीं तु दीर्घार्त्ते तदूर्ध्वं न च कल्पयेत् ॥ ४१० ॥
नैव पक्षार्द्धमार्त्तस्य हातव्याऽल्पापि वै भृतिः ।
और दीर्घ काल तक ( १ वर्ष के ऊपर ) यदि पीड़ित हो तो उसे ६ मास का वेतन दे । इसके ऊपर न दे । और १ सप्ताह तक पीड़ित भृत्यों का वेतन भी कुछ नहीं काटना चाहिये ।
संवत्सरोषितस्यापि प्राज्ञः प्रतिनिधिस्ततः ॥ ४११ ॥
सुमहद्गुणिनं त्वार्त्तं भृत्यर्थं कल्पयेत्सदा ।
बार-बार रोगग्रस्त के स्थान पर प्रतिनिधि रखने का निर्देश—१ वर्ष तक छुट्टी लिये हुये भृत्य का प्रतिनिधि उसी के द्वारा निर्णीत रखना चाहिये । और अत्यन्त योग्य भृत्यों को बीमार पड़ने पर सदा उसको आधा वेतन देना चाहिये ।
सेवा विना नृपः पक्षं दद्याद् भृत्याय वत्सरे ॥ ४१२ ॥
सेवा के बिना ही भृति देने का निर्देश—राजा बिना सेवा कराये ही प्रतिवर्ष १ पक्ष का वेतन भृत्यों को देवे ।
चत्वारिंशत्समा नीताः सेवया येन वै नृपः ।
ततः सेवां विना तस्मै भृत्यर्थं कल्पयेत्सदा ॥ ४१३ ॥
यावज्जीवं तु तत्पुत्रेऽक्षमे बाले तदर्धकम् ।
भार्यायां वा सुशीलायां कन्यायां वा स्वश्रेयसे ॥ ४१४ ॥
जिस भृत्य ने सेवा करते हुये ४० वर्ष बितादिये राजा उसे विना सेवा लिये ( घर पर ) आजीवन पेंशन के रूप में आधा वेतन सदा देता रहे और उसके बच्चे जब तक कार्य करने योग्य न हों जाँय तब तक उन्हें अपने कल्याणार्थ भृत्य के आधे वेतन से आधा वेतन दे इसी भांति उस की सुशीला स्त्री तथा अविवाहिता कन्या को भी पेंशन का आधा वेतन देवे ।
अष्टमांशं पारितोष्यं दद्याद् भृत्याय वत्सरे ।
कार्याष्टमांशं वा दद्यात् कार्यं द्रागधिकं कृतम् ॥ ४१५ ॥
और भृत्य के लिये प्रतिवर्ष वेतन का अष्टमांश पारितोषिक-रूप में देवे । अथवा यदि शीघ्रता के साथ अधिक कार्य किया हो तो कार्य के अष्टमांश को पारितोषिक रूप में देवे अर्थात् उस कार्य के करने में जो वेतन हो उसका अष्टमांश देवे ।
स्वामिकार्ये विनष्टो यस्तत्पुत्रे तद् भृतिं वहेत् ।
यावद्वालोऽन्यथा पुत्रगुणान्दृष्ट्वा भृतिं वहेत् ॥ ४१६ ॥
स्वामी के कार्य करने में यदि भृत्य मरजाय तो उसका पुत्र उसके वेतन को प्राप्त करे, जब तक कि वह बड़ा कार्य करने योग्य न हो जाय, अन्यथा अर्थात्