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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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११४ | शुक्रनीतिः

आयमादौ लिखेत्सम्यग् व्ययं पश्चात्तथागतम् ॥ ३७२ ॥
वामे चायं व्ययं दक्षे पत्रभागे च लेखयेत् ।

पत्र में आय-व्यय लेखन का स्थान-विचार— बही खाते पर पहले सम्पूर्ण आय ( आमदनी ) लिखे पीछे जो व्यय हुआ हो उसे लिखे । और बही के बाईं ही ओर आय और दाहिनी ओर व्यय लिखे ।

यत्रोभौ व्यापकव्याप्यौ वामोर्ध्वभागगौ क्रमात् ॥ ३७३ ॥
आधाराधेयरूपौ वा कालार्थं गणितं हि तत् ।

जहां पर आय तथा व्यय ये दोनों अधिक या अल्प अथवा आश्रय तथा आश्रयी रूप से हों वहां पर उन दोनों को बही के वाम भाग में यथाक्रम ऊपर की ओर रखना चाहिये । ऐसी व्यवस्था नियम के लिये है ।

अधोधश्च क्रमात्तत्र व्यापकं वामतो लिखेत् ॥ ३७४ ॥
व्याप्यानां मूल्यमानादि तत्पंक्त्यां विनिवेशयेत् ।

उसमें व्यापक को वामभाग में क्रम से नीचे-नीचे लिखे । और व्याप्यों का मूल्य और मानादि उन्हीं की पंक्ति में लिखे ।

ऊर्ध्वगानां तु गणितमधः पंक्त्यां प्रजायते ॥ ३७५ ॥
यत्रोभौ व्यापकव्याप्यौ व्यापकत्वेन संस्थितौ ।

जहां पर वे दोनों व्यापक और व्याप्य बहुसंख्यक हों वहाँ पर ऊपरवालों की गणना नीचे की पंक्ति में होती है ।

व्यापकं बहुवृत्तित्वं व्याप्यं स्यान्न्यूनवृत्तिकम् ॥ ३७६ ॥
व्याप्याश्चावयवाः प्रोक्ता व्यापकोऽवयवी स्मृतः ।

व्यापक-व्याप्य के लक्षण— बहुत स्थलों पर रहनेवालों को 'व्यापक' कम स्थलों पर रहनेवालों को 'व्याप्य' कहते हैं । और व्याप्य अवयव ( अङ्ग ) एवं व्यापक ( अवयवी ) कहलाते हैं ।

सजातीनां च लिखनं कुर्याच्च समुदायतः ॥ ३७७ ॥
यथाप्राप्तं तु लिखनमाद्यन्तसमुदायतः ।

समान जातिवाले विषयों का समुदाय रूप से एक स्थान पर ही लिखना उचित होता है । और नाना प्रकार के विषयों का जहां जैसा मौका हो वहीं उसके अनुसार आदि, अन्त और सर्वत्र लिखना उचित है ।

व्यापकाश्च पदार्था वा यत्र संति स्थलानि हि ॥ ३७८ ॥
व्याप्यमायव्ययं तत्र कुर्यात्कालेन सर्वदा ।

जहां पर पदार्थ व्यापक ( बहुत) हों एवं स्थल भी बहुत हों वहां सर्वदा आय-व्यय को काल से व्याप्य कर लेना चाहिये ।

स्थानटिप्पनिका चैषा ततोऽन्यत् संघटिप्पनम् ॥ ३७९ ॥