भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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द्वितीयोऽध्यायः ११५

विशिष्टसंज्ञितं तत्र व्यापकं लेख्यभाषितम् ।
स्थान-टिप्पणादि के भेद— यह स्थान-संबन्धी विवरण अन्य है और वस्तु-समूहसंबन्धी विवरण इससे अन्य है, उसमें लेखोक्त व्यापक की संज्ञा विशिष्ट है ।

आयाः कति व्ययाः कस्य शेषं द्रव्यस्य चास्ति वै ॥ ३८० ॥
विशिष्टसंज्ञकैरेषां संविज्ञानं प्रजायते ।
आय कितने हैं और व्यय कितने हैं और किस द्रव्य का कितना शेष है ? इन सबों का भली-भांति ज्ञान विशिष्टसंज्ञक पूर्वोक्त व्यापक लेख विशेष से होता है ।

आदौ लेख्यं यथा प्राप्तं पश्चात्तद्गणितं लिखेत् ॥ ३८१ ॥
यथा द्रव्यं च स्थानं चाधिकसंज्ञं च टिप्पणैः ।
पहले जो वस्तु जिस तरह से प्राप्त हो उसे लिखे उसके पश्चात् उसकी संख्या लिखनी चाहिये । उसके बाद विवरण के साथ जैसा द्रव्य, स्थान तथा अधिकसंज्ञक हो उसे लिखे ।

शेषायाव्ययविज्ञानं क्रमाल्लेख्यैः प्रजायते ॥ ३८२ ॥
स्थलायव्ययविज्ञानं व्यापकं स्थलतो भवेत् ।
शेषायाव्यय-स्थलायव्ययज्ञान— अवशिष्ट आय तथा व्यय का पूर्ण ज्ञान बहियों से होता है । और बहुत स्थानों के आय-व्यय का पूर्ण ज्ञान स्थानों के ज्ञान से ही हो जाता है ।

पदार्थस्य स्थलानि स्युः पदार्थाश्च स्थलस्य तु ॥ ३८३ ॥
व्याप्यास्तिष्ठन्त्यथैतेषां यथेष्टं लेखने नृणाम् ।
टिप्प्यादि लिखने का निर्देश— स्थल पदार्थके एवं पदार्थ स्थल के व्याप्य होते हैं। मनुष्यों को अपनी इच्छानुसार लिखने में टिप्प्यादि रखनी चाहिये ।

निश्चितान्यस्वामिकाद्या आया ये इतरान्तगाः ॥ ३८४ ॥
विशिष्टसंज्ञका ये च पुनरावर्तकादयः ।
व्ययाश्च परलेखान्ता अन्तिमव्यापकाश्च ते ॥ ३८५ ॥
पूर्वोक्त निश्चितान्यस्वामिक (निश्चित है अन्य स्वामी जिसका) से लेकर इतर (पार्थिव से भिन्न-जङ्गम-शुल्कादि) तक जितने आय हैं और विशिष्टसंज्ञक जो पुनरावर्तकादि व्यय हैं वे सब दूसरों के लेख हैं अन्त में जिसके ऐसे एवं अन्तिम व्यापकवाले (बहुत शेषवाले) हैं।

इच्छया ताडितं कृत्वादौ प्रमाणफलं ततः ।
प्रमाणभक्तं तल्लब्धं भवेदिच्छाफलं नृणाम् ॥ ३८६ ॥
पहले प्रमाण फल (सिद्धवस्तु) को इच्छा (साध्यवस्तु) से गुणित