शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १२८ | शुक्रनीतिः |
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से विषय भोग करना चाहिये । और इन्द्रियां यदि अधिक प्रबल हो जावें तो वे जबरदस्ती मन को अपनी ओर आकृष्ट कर लेती हैं अत एव इनका सदा दमन करते रहना उचित है ।
एणो गजः पतङ्गश्च भृङ्गो मीनस्तु पञ्चमः ।
शब्दस्पर्शरूपगन्धरसैरेते हताः खलु ॥ १७ ॥
**इन्द्रियों को वश में न रखने से अनर्थ का निर्देश—**हरिण, हस्ती, फतरिङ्गे (पांखी), भौंरे, मछलियां ये पांचों क्रम से शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध तथा रस इन पांचों विषयों का उपभोग करने से निश्चय मारे जाते हैं, जैसे हरिण-स्वर युक्त सुन्दर गान सुनने में फंसकर नहीं भागता हुआ व्याध से मारा जाता है । हस्ती—हस्तिनी के स्पर्श करने में आसक्त होने से नहीं भागता हुआ बहकानेवाले से पकड़ा जाता है । पतङ्ग (फतरिङ्गा)—दीपक की शिखा का सुन्दर रूप देखने से उन्मत्त होकर उसी पर गिर जाने से मर जाता है । भृङ्ग—गन्ध के लोभ से कमल के संकुचित होने पर उसी के पत्तों के अन्दर बन्द हो जाता है । मत्स्य—मांस के रस का आस्वाद लेने में फंस कर कांटा चुभ जाने से तड़फड़ा कर मर जाता है ।
एषु स्पर्शो वरस्त्रीणां स्वान्तहारी मुनेरपि ।
अतोऽप्रमत्तः सेवेत विषयांस्तु यथोचितान् ॥ १८ ॥
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नात्यन्तैकान्तिकं वसेत् ।
**स्त्रियों के स्पर्श की भी अनर्थकारिता का निर्देश—**इन शब्दादि विषयों में से उत्तम सुन्दिरयों का स्पर्श सद्-असत् का विचार करनेवाले मुनियों के भी मन को हरण करनेवाला होता है । अतः असावधानी न रखते हुये यथोचित रीति से उक्त विषयों का सेवन करना चाहिये क्योंकि अधिक सेवन से विनाश होता है । और माता, बहन या लड़की के साथ भी अधिकतर एकान्त स्थान में नहीं रहना चाहिये ।
यथासम्बन्धमाहूयादाभाष्याश्वास्य वै स्त्रियम् ॥ १९ ॥
स्वीयां तु परकीयां वा सुभगे भगिनीति च ।
**स्त्रियों के प्रति सम्बोधन-प्रकार—**और अपने या दूसरे के संपर्क की स्त्री को सम्बन्धानुसार हे सुभगे ! वा हे भगिनि ! इत्यादि रूप से पुकारकर आश्वासन देते हुये बुलाना चाहिये ।
सहवासोऽन्यपुरुषैः प्रकाशमपि भाषणम् ॥ २० ॥
स्वातन्त्र्यं न क्षणमपि ह्यावासोऽन्यगृहे तथा ।
**एक क्षण भी स्त्रियों के स्वातन्त्र्य का निषेध—**अन्य पुरुषों के साथ अधिक सहवास रखना या प्रकाश रूप से (सामने होकर) भी बात चीत करना,