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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 526 में से

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तृतीयोऽध्यायः १२७

उपकार ही करना चाहिये। और संपत्ति ( अभ्युदय ) तथा विपत्ति पड़ने पर दोनों में एकसी मन की दशा रखनी चाहिये एवं किसी उन्नतिविषयक कारणों के विषय में ही करने की ईर्ष्या रखनी चाहिये। उन्नति रूप फल के विषय में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये अर्थात् यदि कोई धनी हुआ तो इसकी ईर्ष्या करनी चाहिये कि 'मैं भी वैसा क्यों न उद्योग करूं कि धनी बन जाऊं' किन्तु धन के साथ ईर्ष्या करना अनुचित है।

काले हितं मितं ब्रूयादविसंवादि पेशलम् ॥ १२ ॥
पूर्वाभिभाषी सुमुखः सुशीलः करुणामृदुः ।

समय पर हित और मित वचन कहने का निर्देश— अहङ्कार-शून्य होकर पहले स्वयं वार्तालाप करना चाहिये। मुख की मुद्रा अच्छी रखनी चाहिये। सुशील तथा करुणा से कोमल चित्त होना चाहिये। और योग्यकाल उपस्थित होने पर थोडे शब्दों में, सुसङ्गत ( अटपटाङ्ग नहीं ) और मधुर वचन बोलना चाहिये।

नैकः सुखी न सर्वत्र विश्रब्धो न च शङ्कितः ॥ १३ ॥

अकेले सुखों का उपभोगादि करने का निषेध— अकेले सुखों का उपभोग नहीं करना चाहिये। सर्वत्र विश्वास या शङ्का रखना उचित नहीं है अर्थात् जो उसके योग्य हों उन पर विश्वास या शंका रखना उचित है।

न कञ्चिदात्मनः शत्रुं नात्मानं कस्यचिद्रिपुम् ।
प्रकाशयेन्नापमानं न च निःस्नेहतां प्रभोः ॥ १४ ॥

अपने अपमान को प्रकाशित न करने का निषेध— किसी को अपना शत्रु होकर भी दूसरे को नहीं बताना चाहिये तथा अपने स्वामी का अपने ऊपर किया हुआ अपमान तथा स्नेह का अभाव यदि हो तो उसे भी किसी से प्रकाशित नहीं करना चाहिये।

जनस्याशयमालक्ष्य यो यथा परितुष्यति ।
तं तथैवानुवर्तेत पराराधनपण्डितः ॥ १५ ॥

पराराधन-पण्डितों के व्यवहार का निर्देश— दूसरे को खुश रखने में निपुण व्यक्ति को चाहिये कि वह लोगों के भावों को समझकर तदनुसार जो जैसे खुश हो उसके साथ वैसा व्यवहार करे।

न पीडयेदिन्द्रियाणि न चैतान्यतिलालयेत् ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ १६ ॥

इन्द्रियों को वश में रखने का निर्देश— चक्षु आदि इन्द्रियों को उनके विषयों से बलपूर्वक अलग रख कर अधिक पीडित नहीं एवं विषयों में अधिक आसक्ति रख कर लालित भी नहीं करना चाहिये अर्थात् नियमपूर्वक रहकर समभाव

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