शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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दण्ड का अत्यधिक माहात्म्य बतलाया गया है। अतः सभी उपायों में दण्ड श्रेष्ठ है।
उपर्युक्त दण्ड-प्राधान्य की दृष्टि से ही इस 'नीति' को 'दण्ड-नीति' (दण्डेन नीतिः) कहा जाता है।
नीति को दण्ड-नीति कहने का दूसरा आधार यह है कि दण्ड-शब्द उपाय-विशेष-वाचक होने के साथ-साथ उपाय-सामान्य का¹ भी वाचक है। अतः 'नीति' के साधन सामादि को दण्ड कहा जा सकता है और उससे साध्य, नीति, को 'दण्ड-नीति' (दण्डेन नीतिः) कहा जा सकता है।
अथवा उपाय तथा उपेय-नीति में अभेदोपचार के आधार पर भी 'नीति' को दण्ड-नीति (दण्ड एव नीतिः) कहा जा सकता है।
चतुर्थ दृष्टि यह है कि दण्ड-प्रयोजक राजा भी² औपचारिक रूप में दण्ड-पद-वाच्य हो सकता है इस लिए राजा की नीति को दण्ड-नीति (दण्डस्य = राज्ञः नीतिः) कहा जा सकता है।
इस प्रसंग में यह ज्ञातव्य है कि कुछ आचार्यों की दृष्टि में 'नीति' शब्द का अर्थ सन्मार्ग-प्रापण नहीं है अपितु दण्ड-प्रापण। अतः नीति शब्द दण्ड-नीति का ही लुप्त-पूर्वपद रूप है। इस मत में दण्ड-नीति शब्द में षष्ठी-तत्पुरुष समास है। सम्भवतः आचार्य कौटिल्य³ का समर्थन इसी पक्ष को मिलता है। यह दण्ड-नीति हमारे दण्ड के स्थान में ही आता है।⁴ परन्तु दण्ड एक
१. येन सन्दम्यते जन्तुः उपायो दण्ड एव सः ॥ शु० नी० सा० ४।४० ॥
अथवा दण्ड-शब्दोऽत्र दमन-मात्र-वृत्तिः स्व-पर-पक्षदमनोपायाऽशेष-सामाद्युपग्राही द्रष्टव्यः । का० नी० सा० जय-मङ्गला—पृ० ५२ (पूना)
२. दमो दण्ड इति ख्यातः तात्स्थ्याद्दण्डो महीपतिः ।
तस्य नीतिर्दण्ड-नीतिः—का० नी० सा० २।१२ ॥
दमो दण्ड इति ख्यातस्तस्माद्दण्डो महीपतिः ।
तस्य नीतिर्दण्ड-नीतिर्नयनान्नीतिरुच्यते ॥ शु० नी० सा० १।५६ ॥
स राजा पुरुषो दण्डः—म० स्मृ० ७।१७ ॥
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः—म० भा० (शान्ति-पर्व) १५।२ ॥
३. आन्वीक्षिकी-त्रयी-वार्तानां योग-क्षेम-साधनो दण्डः, तस्य नीतिः ।
अ० शा०, पृ० १५ ॥
४. दण्ड-नीतिः स्वधर्मेभ्यश्चातुर्वर्ण्यं नियच्छति ।
म० भा० (शा० प०) ६९।७६ ॥
यहाँ दण्ड-नीति शब्द शास्त्र का वाचक नहीं है।