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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

( १६ )

दण्ड का अत्यधिक माहात्म्य बतलाया गया है। अतः सभी उपायों में दण्ड श्रेष्ठ है।

उपर्युक्त दण्ड-प्राधान्य की दृष्टि से ही इस 'नीति' को 'दण्ड-नीति' (दण्डेन नीतिः) कहा जाता है।

नीति को दण्ड-नीति कहने का दूसरा आधार यह है कि दण्ड-शब्द उपाय-विशेष-वाचक होने के साथ-साथ उपाय-सामान्य का¹ भी वाचक है। अतः 'नीति' के साधन सामादि को दण्ड कहा जा सकता है और उससे साध्य, नीति, को 'दण्ड-नीति' (दण्डेन नीतिः) कहा जा सकता है।

अथवा उपाय तथा उपेय-नीति में अभेदोपचार के आधार पर भी 'नीति' को दण्ड-नीति (दण्ड एव नीतिः) कहा जा सकता है।

चतुर्थ दृष्टि यह है कि दण्ड-प्रयोजक राजा भी² औपचारिक रूप में दण्ड-पद-वाच्य हो सकता है इस लिए राजा की नीति को दण्ड-नीति (दण्डस्य = राज्ञः नीतिः) कहा जा सकता है।

इस प्रसंग में यह ज्ञातव्य है कि कुछ आचार्यों की दृष्टि में 'नीति' शब्द का अर्थ सन्मार्ग-प्रापण नहीं है अपितु दण्ड-प्रापण। अतः नीति शब्द दण्ड-नीति का ही लुप्त-पूर्वपद रूप है। इस मत में दण्ड-नीति शब्द में षष्ठी-तत्पुरुष समास है। सम्भवतः आचार्य कौटिल्य³ का समर्थन इसी पक्ष को मिलता है। यह दण्ड-नीति हमारे दण्ड के स्थान में ही आता है।⁴ परन्तु दण्ड एक


१. येन सन्दम्यते जन्तुः उपायो दण्ड एव सः ॥ शु० नी० सा० ४।४० ॥
अथवा दण्ड-शब्दोऽत्र दमन-मात्र-वृत्तिः स्व-पर-पक्षदमनोपायाऽशेष-सामाद्युपग्राही द्रष्टव्यः । का० नी० सा० जय-मङ्गला—पृ० ५२ (पूना)

२. दमो दण्ड इति ख्यातः तात्स्थ्याद्दण्डो महीपतिः ।
तस्य नीतिर्दण्ड-नीतिः—का० नी० सा० २।१२ ॥
दमो दण्ड इति ख्यातस्तस्माद्दण्डो महीपतिः ।
तस्य नीतिर्दण्ड-नीतिर्नयनान्नीतिरुच्यते ॥ शु० नी० सा० १।५६ ॥
स राजा पुरुषो दण्डः—म० स्मृ० ७।१७ ॥
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः—म० भा० (शान्ति-पर्व) १५।२ ॥

३. आन्वीक्षिकी-त्रयी-वार्तानां योग-क्षेम-साधनो दण्डः, तस्य नीतिः ।
अ० शा०, पृ० १५ ॥

४. दण्ड-नीतिः स्वधर्मेभ्यश्चातुर्वर्ण्यं नियच्छति ।
म० भा० (शा० प०) ६९।७६ ॥
यहाँ दण्ड-नीति शब्द शास्त्र का वाचक नहीं है।

( २० )

उपाय है, अतः उसे या उसके प्रापण को राजा का साक्षात् कर्त्तव्य नहीं माना जा सकता। राजा का कर्त्तव्य तो है 'स्व-स्व-'धर्म-प्रापण' ( सन्मार्ग-प्रापण ) ही, उसके उपाय के रूप में दण्ड का प्रापण भले ही आता हो। अतः इस अर्थ को अभिव्यक्त करने वाले 'दण्ड-नीति' शब्द को 'नीति' ( सन्मार्ग-प्रापण ) का पर्याय नहीं माना जा सकता। साध्य-साधन में अभेदोपचार के आधार पर कहना तो प्रकारान्तर है।

अस्तु, प्रकृत 'नीति' ( सन्मार्ग-प्रापण ) का उद्देश्य है 'अभ्युदय'। किन्तु आत्माभ्युदय तब तक सर्वाङ्गीण नहीं हो पाता है जब तक पर का अवसाद न हो जाय। इसलिए पर-विनाश-पूर्वक आत्माभ्युदय को 'नीति' का लक्ष्य माना जा सकता है।

इस सन्दर्भ में महाकवि माघ का निम्न-लिखित कथन द्रष्टव्य है— आत्मोदयः परग्लानिः द्वयं नीतिरितीयती।$^१$ तदूरीकृत्य कृतिभिः वाचस्पत्यं प्रतायते ॥

अतः यह सिद्ध होता है कि दण्ड अथवा दण्डनीति ( दण्ड-प्रापण ) से 'नीति' ( सन्मार्ग-प्रापण ) और 'नीति' से 'अभ्युदय' होता है। अतः अभ्युदय को दण्ड या दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) का भी फल कहा जा सकता है। अत एव सन्मार्गावलम्बन के द्वारा आत्माभ्युदय के प्रसाधक किसी भी तत्त्व को औपचारिक रूप में दण्ड या दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) माना जा सकता है।

उपर्युक्त आत्माभ्युदय के भी दो रूप हैं—ऐहलौकिक तथा पारलौकिक। ऐहलौकिक अभ्युदय पारलौकिक अभ्युदय की भूमिका है। अत एव उचित रीति के द्वारा ऐहलौकिक अभ्युदय—अर्थागम—के प्रयोजक 'वार्ता' को भी उपचारतः दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) और संक्षेप में 'नीति' कहा जा सकता


१. कुलानि जातीः श्रेणीश्च गणान् जानपदानपि। स्व-धर्मात् प्रच्युतान् राजा विनीय स्थापयेत् पथि॥ या० स्मृ० १।३६१॥

स्वेषु धर्मेष्ववस्थाप्य प्रजाः सर्वा महीपतिः। म० भा० ( शा०प० ) ६०।१०॥ इसके स्पष्टी-करण के लिए उद्धरण सं० १७ भी द्रष्टव्य है।

२. शिशुपाल-वध—२।३०॥

तुलना कीजिए— नृपस्य परमो धर्मः प्रजानां परिपालनम्। दुष्ट-निग्रहणं नित्यं न नीत्या ते विना ह्युभे ॥ शु० नी० सा० १।१४॥

( २१ )

है । इसी लिए याज्ञवल्क्य ने वार्त्ता¹—पशुपाल्य, वाणिज्य आदि—के लिए 'नीति' शब्द का प्रयोग किया है। इसी से यह भी सिद्ध है कि वार्त्ता के फल को हम दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) का भी फल कह सकते हैं। इस स्थिति के ध्यान से हमें कौटिल्य के द्वारा 'रक्षित-सम्वर्धन' के दण्ड-नीति-फल-प्रसङ्ग में सन्निवेश का अर्थ लग जाता है।

अर्थ-शास्त्र में दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) के चार प्रयोजन बतलाए गए हैं—'अलब्ध-लाभ, लब्ध-परिरक्षण, रक्षित-सम्वर्धन तथा सम्वर्धित सम्पत्ति का पात्र में समर्पण। उचित दण्ड-प्रयोग से मूर्त्त धन-धान्यादि तथा अमूर्त्त यश की सम्प्राप्ति होती है। अतः प्रथम फल तो दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) का ही है। द्वितीय फल—लब्ध-परिरक्षण—भी दण्ड-प्रापण का ही फल है—यह भी सत्य है। अत एव महाकवि कालिदास का भी कथन है :—

यस्मिन् महीं शासति वाणिनीनां निद्रां विहारार्ध-पथे गतानाम् ।
वातोऽपि नास्रंसयदंशुकानि को लम्भयेदाहरणाय हस्तम्³ ॥

अतः प्रथम दो को तो हम असन्दिग्ध रूप में दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) का फल⁴ मान सकते हैं। यद्यपि ये दोनों फल भी 'नीति' (सन्मार्ग-प्रापण) के ही हैं तथापि औपचारिक रूप में इन्हें दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) के फल कहे गए हैं। ये दोनों ही तत्त्व—अलब्ध-लाभ तथा लब्ध-परिरक्षण—ऐहलौकिक अभ्युदय तो हैं ही, यदि इन्हें पारलौकिक अभ्युदय भी मान लिया जाय तो कोई अनुचित न होगा। अत एव गीता में भगवान् श्रीकृष्ण की उक्ति है—

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योग-क्षेमं वहाम्यहम् ॥⁵

तृतीय फल है तो 'वार्त्ता' का परन्तु पूर्व-निर्देशानुसार इसका भी दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) के फल के अन्तर्गत निर्देश किया गया है। चतुर्थ-फल का


१. पालितं वर्धयेन्नीत्या—या० स्मृ० १।३१७ ॥
नीत्या = वणिज्यादिकया—मिताक्षरा ।
तुलना कीजिए—
रक्षितं वर्धयेद्वृद्ध्या—म० स्मृ० ७।१०१ ॥
२. अलब्ध-लाभार्था लब्ध-परिरक्षणी रक्षित-विवर्धनी वृद्धस्य तीर्थेषु प्रतिपादनी च ॥ अर्थ-शास्त्र, पृ० १५ ।
३. रघुवंश—६।७५ ॥
४. दण्ड-नीत्याम् = अर्थ-योग-क्षेमोपयोगिन्याम् । मिता० या० स्मृ० १।३११ ।
५. गीता—९।२२ ।

( २२ )

सम्बन्ध इस दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) से जोड़ना कुछ अधिक अस्पष्ट है। अतः कौटिल्य का फलनिर्देश बहुत उचित नहीं प्रतीत होता है। प्रायः इसी लिए महाभारत¹ मनुस्मृति² तथा याज्ञवल्क्य³ स्मृति आदि में दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) के दो ही फल—अलब्ध-लाभ तथा लब्ध-संरक्षण—बतलाए गए हैं। दण्ड में प्रयास⁴ का भी समावेश है, अतएव मनुस्मृति तथा याज्ञवल्क्य स्मृति में द्वितीय फल के प्रसंग में क्रमशः 'अवेक्षया' तथा 'यत्नेन' जोड़ दिया गया है। परन्तु है तो यह दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) का ही फल।

इस 'नीति' (सन्मार्ग-प्रापण) का एक और नामान्तर है 'अर्थ⁵-विद्या'। इसकी पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि इस दण्ड-नीति-शास्त्र को अर्थ-शास्त्र⁶ भी कहा गया है, जिसकी चर्चा आगे की जाएगी। इसके अतिरिक्त 'नय'⁷ शब्द का भी प्रयोग 'नीति-विद्या' के अर्थ में होता है।

उपर्युक्त कथन के आधार पर यह सिद्ध है कि इस नीति-विद्या के नामान्तर हैं :—राज-नीति, राज-धर्म, राज-विद्या, दण्ड-नीति (दण्डेन-नीतिः अथवा दण्डस्य=राज्ञः नीतिः), अर्थ-विद्या तथा नय। इसी आधार पर इस विद्या के प्रतिपादक ग्रन्थों के नाम हैं :—नीति-शास्त्र, राज-नीति-शास्त्र, राज-धर्म-शास्त्र (राज-धर्मानुशासन), राज-शास्त्र, दण्ड-नीति, दण्ड-नीति-शास्त्र, अर्थ-शास्त्र एवम् नय-शास्त्र। इनमें से हम दण्ड-नीति अर्थ-शास्त्र तथा राज-शास्त्र इन नामकरणों का संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत कर रहे हैं :—


१. दण्ड-नीतिं पुरस्कृत्य विजानन् क्षत्रियः सदा । अनवाप्तं च लिप्सेत लब्धं च परिपालयेत् ॥ म० भा० (शा० प०) ६९।१०३ ॥

२. अलब्धमीहेद्दण्डेन लब्धं रक्षेद्बवेक्षया । रक्षितं वर्धयेद्वृद्ध्या वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ म० स्मृ० ७।१०१ ॥

३. अलब्धमीहेद्धर्मेण लब्धं यत्नेन पालयेत् । पालितं वर्धयेन्नीत्या वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ या० स्मृ० १।३१७ ॥

४. साम्नि प्रयास-धन-व्यय-सैन्य-प्रक्षयादि-दोषाभावात् दण्डे तु तत्सद्भावेऽपि कार्य-सिद्धयतिशयात् ॥ कुल्लूक भट्ट, म० स्मृ० ७।१०९ ॥

५. महाभारत (द्रोण-पर्व) ६।१ ॥

६. आन्वीक्षिकी दण्ड-नीतिः तर्क-विद्यार्थशास्त्रयोः ॥ अमर-कोश (शब्दादि वर्ग)

७. रघुवंश-४।१०, किरातार्जुनीय-१।७, ९ आदि।

( २३ )

(क) दण्ड-नीति—इस प्रसंग में नीति शब्द का अर्थ सन्मार्ग-प्रापण या दण्ड-प्रापण नहीं है अपितु प्रख्यापन अथवा¹ उपदेश। जिनकी दृष्टि से दण्ड-नीति में प्रयुक्त नीति शब्द प्रापण (दण्ड-प्रापण) अर्थ का अभिधायक है उनके मत में इस शास्त्र का नाम होना चाहिए—दण्ड-नीति-शास्त्र।

(ख) अर्थशास्त्र—हम पहले देख चुके हैं कि दण्ड या दण्ड-नीति के दो फल हैं—अलब्ध-लाभ तथा लब्ध-संरक्षण। अर्थ-शास्त्र के भी ये ही दो फल बतलाए² गए हैं। अतएव दण्ड-नीति (नीति-शास्त्र) को अर्थ-शास्त्र कहा जाता है। यद्यपि नीति-शास्त्र तथा अर्थ-शास्त्र के पर्यायत्व का स्पष्ट संकेत शुक्र-नीति-सार में नहीं है तथापि इसमें किए गए विद्या-परिगणन³ में नीति-शास्त्र के पृथक् अनुल्लेख तथा अर्थ-शास्त्र के⁴ लक्षण पर ध्यान देने से इनका पर्यायत्व प्रतीत हो जाता है। यतः दण्ड-प्रयोग में धर्म का अनुसन्धान⁵ परमावश्यक बतलाया गया है अतएव महाभारत⁶ में धर्म-शास्त्र से अननुमोदित अर्थ-शास्त्र की निन्दा भी की गई है। परन्तु इसका तात्पर्य उपर्युक्त ही है। परन्तु 'बार्हस्पत्य-अर्थ-शास्त्र' में प्रयुक्त अर्थ-शब्द का अर्थ व्यापक है और इस दृष्टि से उस अर्थ-शास्त्र का यह अर्थ-शास्त्र या नीति-शास्त्र एक अंश है न कि पर्याय। अतएव कामन्दक⁷ ने कौटिल्य के अर्थ-शास्त्रापरपर्याय नीति-शास्त्र को बार्हस्पत्य अर्थ-शास्त्र का एक अंश माना है।


१. दण्डनीत्याम् = अर्थ-शास्त्रे—विज्ञानेश्वर—या० स्मृ० २।२१ ॥
राजनीतिलक्षणमर्थ-शास्त्रमिह विवक्षितम्—
विज्ञानेश्वर—या० स्मृ० १।३१३ ॥
दण्डेन नीयते चेदं दण्डं नयति वा पुनः।
दण्ड-नीतिरिति ख्याता त्रींल्लोकानभिवर्तते ॥
म० भा० (शा० प०) ५९।७८ ॥
२. पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थ-शास्त्राणि पूर्वाचार्यैः प्रस्थापितानि ......। कौ० शा०, पृ० १।
३. शु० नी० सा० ४।२६७–२७१ ॥
४. श्रुति-स्मृत्यनुरोधेन राज-वृत्तं हि शासनम् ।
सुयुक्त्यार्थार्जनं यत्र ह्यर्थ-शास्त्रं तदुच्यते ॥ शु० नी० सा० २९६–९७ ॥
५. इस प्रसङ्ग में या० स्मृ० २।२१ की मिताक्षरा द्रष्टव्य है।
६. अर्थ-शास्त्र-परो राजा धर्मार्थान्नाधिगच्छति ।
अस्थाने चास्य तद्वित्तं सर्वमेव विनश्यति ॥
म० भा० (शा० प०) ७१।१४ ॥
७. का० नी० सा० १।६ ॥

( २४ )

(ग) राज-शास्त्र—म० म० काणे¹ महाशय का कथन है कि इस शास्त्र का सबसे उचित नाम है 'राज-शास्त्र'। इसका तात्पर्य यही है कि दण्ड अपने प्राधान्य के कारण 'राजा' या 'शासक' शब्द से अभिहित होने लगा है। अतएव दण्ड-प्रख्यापक शास्त्र को राज-शास्त्र कहना उचित ही है। इस दृष्टि के समर्थन में अन्यान्य युक्तियाँ भी स्पष्ट हैं।

राजा

ऊपर यह बतलाया जा चुका है कि 'नीति' का अधिकारी है 'राजा'। अब हमें राजा शब्द के अर्थ का अनुसन्धान करना चाहिए। राजा शब्द की निष्पत्ति बतलाते हुए यास्क² ने कहा है कि 'राजू दीप्तौ' धातु से राजा की निष्पत्ति हुई है। इसकी उपपत्ति में निरुक्त के अद्वितीय व्याख्याकार³ दुर्गाचार्य का कहना है कि यह राजा आठ लोक-पालों की मात्रा से निर्मित शरीर से प्रदीप्त होते रहता है। पाणिनि-व्याकरण की दृष्टि से भी 'राजू' धातु से ही 'कनिन्' प्रत्यय करने से 'राजन्' शब्द की निष्पत्ति होती है। महाभारत⁴ में 'रञ्ज्' धातु से राजा की निष्पत्ति मानी गई है। महाकवि कालिदास⁵ ने भी इसीका अनुसरण किया है। इसकी व्याख्या में मल्लिनाथ⁶ का कथन है कि यद्यपि राजन् शब्द की निष्पत्ति 'राजू' धातु से ही होती है तथापि धातुओं की नानार्थकता की दृष्टि से 'रञ्ज्' धातु से इस शब्द की निष्पत्ति मानी गई है। म० म० काणे के द्वारा राज-धर्म-काण्ड से⁷ उद्धृत एक वचन के अनुसार


१. हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, पृ० ४, (भाग-३)
२. राजा राजतेः—या० निरुक्त २।३।
३. दीप्यते ह्यसौ पञ्चानां (अष्टानाम्) लोकपालानाम् वपुषा। दुर्गाचार्य।
४. रञ्जिताश्च प्रजाः सर्वास्तेन राजेति शब्द्यते।
म० भा० (शा० प०) ५९।१२५।
लोक-रञ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः।
म० भा० (शा० प०) ५७।११॥
५. राजा प्रकृति-रञ्जनात्। रघुवंश ४।१२॥
६. यद्यपि राज-शब्दो राजतेः दीप्यर्थात् कनिन्-प्रत्ययान्तः न तु रञ्जेः तथापि धातूनाम् अनेकार्थत्वाद् रञ्जनात् राजा इत्युक्तम्। मल्लिनाथ रघु० ४।१२॥
७. बलेन चतुरङ्गेन यतो रञ्जयति प्रजाः।
दीप्यमानः स वपुषा तेन राजारभिधीयते॥
हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, भाग-३, पृ० २८॥

( २५ )

'राज्' तथा 'रञ्ज्' इन दोनों ही धातुओं से राजा की निष्पत्ति होती है। यह तो राजन् शब्द की व्युत्पत्ति की स्थिति हुई। इस व्युत्पत्ति के आधार पर राजन् शब्द का प्रयोग किसी भी लोकरञ्जक या दीप्तिमान् पुरुष के लिए किया जा सकता है। अब हमें इसके प्रवृत्ति-निमित्त की ओर ध्यान देना चाहिए।

शास्त्र में शब्द के तीन—यौगिक, रूढ तथा योग-रूढ़—अथवा चार—यौगिक, रूढ़, योग-रूढ़ तथा यौगिक-रूढ़—प्रकार माने गए हैं। यौगिक शब्द पूर्णतः व्युत्पत्ति-निमित्त तथा प्रवृत्ति-निमित्त में सामञ्जस्य रखता है। अन्य प्रकार के शब्दों में न्यूनाधिक-भाव से व्युत्पत्ति-निमित्त के साथ प्रवृत्ति-निमित्त का सम्बन्ध¹ रहता भी है और नहीं भी। साधारणतः राजन् शब्द का प्रयोग चार अर्थों में प्रसिद्ध है। ये चार अर्थ हैं—प्रजा-पालक मनुष्य-मात्र, क्षत्रिय-जातीय, अभिषिक्त क्षत्रिय तथा प्रशस्त व्यक्ति।

मीमांसा दर्शन के अवेष्ट्यधिकरण² में 'राजा राज-सूयेन स्वाराज्य-कामो यजेत' इस वैदिक विधि में प्रयुक्त 'राजा' शब्द के अर्थ के विवेचन-प्रसङ्ग में कुमारिल भट्ट³ ने प्रथम अर्थ में राजन् शब्द की लौकिक प्रसिद्धि का उल्लेख किया है। मनु की व्याख्या में कुल्लूक भट्ट आदि ने भी राजन् शब्द का यही अर्थ बतलाया है।

अवेष्ट्यधिकरण में ही शबरस्वामी⁴ ने क्षत्रिय-जाति के प्रसङ्ग में राजन् शब्द-प्रयोग की आन्ध्र-प्रसिद्धि का उल्लेख किया है। मीमांसा के सिद्धान्त के अनुसार भी 'राजा राजसूयेन यजेत' इस विधि-वाक्य में प्रयुक्त राजन् शब्द क्षत्रिय-जाति का ही वाचक प्रतीत होता है। अत एव महाकवि माघ ने इसी सिद्धान्त के आधार पर युधिष्ठिर के द्वारा, राज-सूय यज्ञ के अनुष्ठान⁵ का समर्थन किया


१. अन्यद्धि शब्दानां व्युत्पत्तिनिमित्तम् अन्यच्च प्रवृत्ति-निमित्तम्—विश्वनाथ।
२. अवेष्टौ यज्ञ-संयोगात् क्रतु-प्रधानमुच्यते। पू० मी० द० २।३।३ ॥
३. राज्यस्य कर्त्ता राजेति त्रिषु लोकेषु गीयते।
महा-विषयता चैवं शास्त्रस्यापि भविष्यति। तन्त्र-वार्त्तिक ॥
४. जन-पद-पुर-परिरक्षणवृत्तिमनुपजीवत्यपि क्षत्रिये राज-शब्दमान्ध्राः प्रयुञ्जते—शाबर-भाष्य २।३।३।
५. तत्सुराज्ञि भवति स्थिते पुनः कः क्रतुं यजतु राज-लक्षणम् ।
उद्धृतौ भवति कस्य वा भुवः श्रीवराहमपहाय योग्यता ?
शि० व० १४।१४ ।
सुराज्ञि = विजय-प्रजा-रक्षणादि-गुण-योगात् शुद्धक्षत्रिये, .......राज-लक्षणम् = राज्ञः क्षत्रियस्य, चिह्नम् असाधारणं लक्षणम्—मल्लिनाथ।

( २६ )

है। महाभारत में सहस्रशः राजन् शब्द¹ को क्षत्रिय का पर्याय बतलाया गया है। पाणिनीय² अष्टाध्यायी के व्याख्यान के प्रसंग में भी राजन् शब्द का प्रयोग क्षत्रिय जाति के लिए किया गया है। इसका समर्थन वार्त्तिककार³ के कथन से भी होता है।

तृतीय मत के अनुसार राज्याभिषिक्त क्षत्रिय ही राजा है। अत एव मनुस्मृति में क्षत्रियों⁴ का ही यह कर्त्तव्य बतलाया गया है। विज्ञानेश्वर भी इसी मत के समर्थक⁵ हैं। मत्स्य-पुराण⁶ की भी यही सम्मति है।

चतुर्थ अर्थ में राजन् शब्द के प्रयोग का निर्देश हमें पाणिनि-सूत्र⁷ में तथा आधुनिक व्यवहार में भी मिलता है।

उपर्युक्त चार पक्षों में प्रथम पक्ष तो अत्यन्त स्थूल है। राज्य शब्द की व्युत्पत्ति जातिवाची राजन् शब्द से होती है। एवञ्च क्षत्रिय के कर्म से अतिरिक्त जाति के कर्म को राज्य कहना ही जब गौण है तब उस राज्य के अधिकारी क्षत्रियेतर जाति के लिए 'राजा' शब्द का प्रयोग मुख्य कैसे हो सकता है? प्रजा-पालनादि-स्वरूप राज्य क्षत्रिय का ही कर्म है—यह तो निर्विवाद है। अत एव मनु,⁸ याज्ञवल्क्य⁹, महाभारत¹⁰ आदि ग्रन्थों में अप्रजा- पालन को क्षत्रिय का कृत्य बतलाया गया है। महाभारत में तो एक जगह यह भी बतलाया गया है कि अपने राज्य-काल की समाप्ति के बाद भी क्षत्रिय को


१. शान्ति-पर्व—६०।२४; ६४।१९; ६३, ६४ तथा ६५ अध्यायों में तो क्षात्र-धर्म तथा राज-धर्म को बारम्बार पर्याय के रूप में निर्दिष्ट किया गया है।
२. पा० सू० ५।१।१२४, ४।१।१३७ ।
३. पा० सू० ४।१।१३७ पर वार्त्तिक—"राज्ञो जातावेवेति वक्तव्यम्" ।
४. ब्राह्मं प्राप्तेन संस्कारं क्षत्रियेण यथाविधि ।
सर्वस्यास्य यथा-न्यायं कर्त्तव्यं परिरक्षणम् ॥ म० स्मृ०.७।२ ॥
५. अभिषेकादि-गुण-युक्तस्य राज्ञः प्रजापालनं परमो धर्मः—मिताक्षरा-या० स्मृ० २।१ ॥
६. राज्ञोऽभिषिक्त-मात्रस्य किं नु कृत्यतमं भवेत् । म० पु० २१४।१
७. राजा च प्रशंसायाम्—पा० सू० ६।२।६३ ॥
८. प्रजानां रक्षणं दानमिज्याऽध्ययनमेव च ।
विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः । म० स्मृ० १।८९ ॥
९. प्रधानं क्षत्रिये कर्म प्रजानां परिपालनम् । या० स्मृ० १।११९ ॥
१० प्रजाश्च परिपालयेत् । म० भा० (शान्ति-पर्व) ६०।१४ ॥

( २७ )

ही राज्य-पद पर प्रतिष्ठित¹ करना चाहिए। अतः यह निश्चित है कि यह राज्याधिकार क्षत्रिय का स्वाभाविक है और और अन्य का गौण।

अब यहाँ एक प्रश्न उपस्थित होता है कि यदि क्षत्रिय का ही स्वाभाविक अधिकार है राज्य-कृत्य तब महाभारत में जो² कहा गया है कि ब्राह्मण तथा क्षत्रिय को प्रजापति ने प्रजा का समर्पण कर दिया इसका क्या तात्पर्य है ? शान्ति-पर्वान्तर्गत राज-धर्मानुशासन पर्व के बहत्तरवें अध्याय में निर्दिष्ट ऐलवायु-सम्वाद से यह प्रतीत होता है कि अग्रजन्मा होने के कारण इस पृथिवी पर ब्राह्मण का प्रथम अधिकार³ है, परन्तु यतः प्रशस्त ब्राह्मण के लिए पृथिवीपालनाथं अत्यावश्यक शस्त्रादि-ग्रहण⁴ अनुचित है अतः ब्राह्मण-प्रमुख के द्वारा उपेक्षित पृथिवी का अधिकार अनन्तरागत क्षत्रिय पर⁵ आता है। यही बात ऐलकाश्यप-सम्वाद⁶ से भी स्पष्ट होती है। अतः यह प्रतीत होता है कि राज्य-कृत्य का व्यावहारिक अधिकार क्षत्रिय पर ही है। अतएव भीष्म ने उपर्युक्त सम्वाद-द्वय के अन्त में युधिष्ठिर से कहा है कि राष्ट्र का योग-क्षेम राजन्य के ऊपर और राजन्य का योग-क्षेम पुरोहित के ऊपर है⁷। इतना


१. स्थापयित्वा प्रजा-पालं पुत्रं राज्ये च पाण्डव।
अन्य-गोत्रं प्रशस्तं वा क्षत्रियं क्षत्रियर्षभः। म०भा० (शा०प०) ६४।१९॥
और भी देखिए —
राजा भोजो विराट् सम्राट् क्षत्रियो भूपतिर्नृपः।
य एभिः स्तूयते शब्दैः कस्तं नार्चितुमर्हति। वही ६८।५४॥
प्रजापतिर्हि भगवान् सर्वं चैवासृजज्जगत्।
स प्रवृत्ति-निवृत्यर्थं धर्माणां क्षत्रमिच्छति। वही ६५।३०॥
इस प्रसङ्ग में शु० नी० सा० १।३०,४१ आदि भी द्रष्टव्य हैं।

२. प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददौ पशून्।
ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः। शान्ति पर्व ६०।३३-३४॥

३. विप्रस्य सर्वमेवैतत् यत्कञ्चिज्जगती-गतम्।
ज्यैष्ठेनाभिजनेनेह तद्धर्म-कुशला विदुः। म० भा० (शा० प०) ७२।१०॥

४. ज्या-कर्षणं शत्रु-निबर्हणं च कृषिर्वणिज्या पशु-पालनं च।
शुश्रूषणं चापि तथार्थ-हेतोः अकार्यमेतत् परमं द्विजस्य। वही ६३।१॥

५. पत्यभावे यथैव स्त्री देवरं वृणुते पतिम्।
एष ते प्रथमः कल्पः आपद्यन्यो भवेदतः। वही ७२।१२॥

६. वही ७३।२९-३२॥

७. योग-क्षेमो हि राष्ट्रस्य राजन्यायत्त उच्यते।
योग-क्षेमो हि राज्ञो हि समायत्तः पुरोहिते॥ वही ७४।१॥

( २८ )

होने पर भी राज-धर्म का सम्बन्ध जो अन्यान्य जातीय लोगों से जोड़ा¹ जाता है उसका कारण इतना ही है कि मध्यम ब्राह्मण आदि अपने कृत्य के सम्पादन में असफल होकर जब क्षत्रिय आदि के कृत्य से² अपनी जीविका चलाने लगते हैं तो उनके लिए क्षत्रिय आदि के धर्म का अवलम्बन आवश्यक ही है³।

वस्तुतः प्रजा-पालन का भार ब्राह्मण तथा क्षत्रिय इन दोनों पर है, अत एव दोनों ही राज्य-कृत्य के अधिकारी हैं। परन्तु दोनों का क्षेत्र व्यवस्थित है— ब्राह्मण को मन्त्र-बल से⁴ तथा राजन्य को बाहु-बल एवम् अस्त्र-बल से प्रजा


१. यद्यपि राजानमधिकृत्य अयं धर्म-कलाप उक्तः तथापि वर्णान्तरस्यापि विषय-मण्डलादि-परिपालनाधिकृतस्यायं धर्मो वेदितव्यः। विज्ञानेश्वर—या० स्मृ० १।३६८ ॥
नृप इति न क्षत्रिय-मात्रस्यायं धर्मः किन्तु प्रजा-पालनाधिकृतस्यान्यस्यपीति दर्शयति। वही २।१ ॥
राज-शब्दोऽपि नात्र क्षत्रिय-जाति-वचनः किन्तु अभिषिक्त-जनपद-पुर-पालयितृ-वचनः। कुल्लूक भट्ट—म० स्मृ० ७। १ ॥
इस श्लोक पर मेधातिथि-भाष्य भी द्रष्टव्य है।

२. युधिष्ठिर उवाच—
व्याख्याता राज-धर्मेण वृत्तिरापत्सु भारत ?
कथंस्विद्वैश्य-धर्मेण सञ्जीवेद् ब्राह्मणो न वा ?
भीष्म उवाच—
अशक्तः क्षत्र-धर्मेण वैश्य-धर्मेण वर्त्तयेत्।
म० भा० (शा० प०) ७८।१,२ ॥
ब्राह्मण के लिए शूद्र-कर्म का परिग्रहण सर्वथा प्रतिषिद्ध है।
"ब्राह्मणस्य हि आपदि जीवेत् क्षत्रिय-धर्मेण इत्यभिधास्यति. वैश्यस्यापि क्षत्रिय-धर्मं शूद्रस्य च क्षत्रिय-वैश्य-कर्मणी जीवनार्थमापदि जगाद नारदः"—
कुल्लूक भट्ट—म० स्मृ० ७।२ ॥
इस विषय में या० स्मृ० ३।३५ की मिताक्षरा भी द्रष्टव्य है।

३. एतत्सर्वं क्षत्रियस्य राज्यं कुर्वतः प्रविहितम्। यदा पुनः अक्षत्रियः क्षत्रियः कार्यं कुर्यात् तदा अनेनाऽपि एतत्सर्वम् अनुष्ठेयम्, "तत्तार्यापत्तया तद्धर्म-लाभः" इति न्यायात्। अपरार्क—या० स्मृ० १।३६६ ॥

४. ब्रह्म-क्षत्रमिदं सृष्टमेक-योनि स्वयम्भुवा।
पृथग्बल-विधानं तद् न लोकं परिपालयेत् ॥

( २६ )

का संरक्षण करना पड़ता है। राज-नीति के प्रसङ्ग में वर्णित राज-धर्म में केवल बाहु-बल आदि का विनिर्णय है। इसीलिए इसका सम्बन्ध राजन्य से मुख्य है। और यही धर्म ब्राह्मण से गौणतः सम्बद्ध है न कि मन्त्र-बल से क्रियमाण प्रजा-पालनात्मक धर्म। अत एव राजन् शब्द का प्रकृत प्रसङ्ग में मुख्य अर्थ क्षत्रिय ही है। यह भी क्षत्रिय-मात्र का नहीं अपितु अभिषिक्त क्षत्रिय का ही धर्म है। अत एव महाभारत¹ में भी चातुर्वर्ण्य के धर्म से अतिरिक्त राज-धर्म का उल्लेख किया गया है। अन्यान्य धर्म-शास्त्रकारों² का भी मत यही है। शुक्र-नीति-सार.में जो अनभिषिक्त³ को राजा कहा गया है उसका तात्पर्य इतना ही है कि उसका अभिषेक वैदिक-विधि से न होकर यदि लौकिक रूप में भी हुआ हो तब भी वह राजा कहला सकता है। अतः अभिषिक्त क्षत्रिय ही प्रधानतः राज्याधिकारी है और अन्यजातीय व्यक्ति गौण-रूप में 'राजा' कहला सकता है।

राजा का मूल

यह तो स्पष्ट है कि जब कुमार्ग पर लोग चलने लगे होंगे तभी 'नीति' की और उसके उपाय के रूप में प्रधानतया 'दण्ड' और उस 'दण्ड' के निर्वाहक के रूप में राजा की आवश्यकता हुई होगी। अतएव सर्वत्र 'दण्ड' की आवश्यकता बतलाते समय 'मात्स्य न्याय'⁴ का उल्लेख किया गया है। इसी


तपो-मन्त्र-बलं नित्यं ब्राह्मणेषु प्रतिष्ठितम् ।
अस्त्र-बाहु-बलं नित्यं क्षत्रियेषु प्रतिष्ठितम् ॥
ताभ्यां सम्भूय कर्तव्यं प्रजानाम्परिपालनम् ।
म० भा० (शा० प०) ७४।१३-१५ ॥

१. के धर्माः सर्व-वर्णानां चातुर्वर्ण्यस्य के पृथक् ।
चातुर्वर्ण्याश्रमाणां च राज-धर्माश्च के मताः ?
म० भा० (शा० प०) ६०।२ ॥

२. राजा अभिषिक्तः क्षत्रियः । हरदत्त-गौ० ध० शा० ११।१ ॥
विज्ञानेश्वर—या० स्मृ० २।१ ॥

३. अभिषिक्तो नाभिषिक्तो नृपत्वं तु यदाप्नुयात् ॥ शु० नी० सा० १।२६ ॥

४. 'अप्रणीतो हि मात्स्य-न्यायमुद्भावयति । बलीयानबलं हि ग्रसते दण्डधराभावे' अर्थ-शास्त्र-पृ० १६ ॥
दण्डाभावे परिध्वंसी मात्स्यन्यायः प्रवर्त्तते ॥ का० नी० सा० २।४० ॥
दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विनश्येयुरिमाः प्रजाः ।
जले मत्स्यानिवाभक्ष्यन् दुर्बलं बलवत्तराः ॥ म०भा० (शा०प०) १५।३० ॥

( ३० )

लिए यह भी कहा गया है कि राजा के अभाव में प्रजा की¹ रक्षा नहीं हो सकती है। सारांश यही है कि जब अनाचार या अधर्म का संचार हुआ तभी राजा की आवश्यकता हुई। अतः विचारणीय यही है कि अनाचार का संचार कब हुआ।

युधिष्ठिर के प्रश्न का उत्तर देते हुए महाभारत में भीष्म ने² कहा है कि कृत-युग में धर्म के ही प्रसार से अधर्म-निरोधक दण्ड या दण्ड-धर राजा की स्थिति थी ही नहीं, पर जब लोगों में अनाचार का संचार हुआ तब देवताओं की प्रार्थना से ब्रह्मा तथा विष्णु के द्वारा क्रमशः दण्ड-प्रकार आदि के उपदेश के लिए नीति-शास्त्र तथा राजा का आविष्कार किया गया। मनुस्मृति में किए गए कृत-युग³ के वर्णन तथा राजा की सृष्टि⁴ की एकवाक्यता से भी


यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्डेष्वतन्द्रितः ।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन् दुर्बलान् बलवत्तराः ॥ म० स्मृ० ७।२० ॥
१. रक्षार्थमस्य लोकस्य राजानमसृजत् प्रभुः ॥ म० स्मृ० ७।२ ॥
यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ्नेता ततः प्रजाः ।
अकर्ण-धारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव ॥ शु० नी० सा० १।६५ ॥
२. नियतस्त्वं नर-व्याघ्र शृणु सर्वानशेषतः ।
यथा राज्यं समुत्पन्नमादौ कृत-युगेऽभवत् ॥ शा० प० ५९।१३ ॥
न वै राज्यं न राजाऽसीत् न दण्डो न च दाण्डिकः ।
धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ शा० प० ५९।१४ ॥
ते मोह-वशमापन्ना मनुजा भरतर्षभ ॥ शा० प० ५९।१६ ॥

$$\times \quad\quad\quad \times \quad\quad\quad \times$$

नष्टे ब्रह्मणि धर्मे च देवांस्त्रासः समाविशत् ।
ते त्रस्ता नर-शार्दूल ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥ शा० प० ५९।२२ ॥

$$\times \quad\quad\quad \times \quad\quad\quad \times$$

ततोऽध्यायः सहस्राणां शतं चक्रे स्व-बुद्धिजम् ॥ शा० प० ५९।२९ ॥

$$\times \quad\quad\quad \times \quad\quad\quad \times$$

अथ देवाः समागम्य विष्णुमूचुः प्रजापतिम् ।
एको योऽर्हति मर्त्येभ्यः श्रैष्ठ्यं वै तं समादिश ॥ शा० प० ५९।८७ ॥
ततः सञ्चिन्त्य भगवान् देवो नारायणः प्रभुः ।
तैजसं वै विरजसं सोऽसृजद् मानसं सुतम् ॥ शा० प० ५९।८८ ॥
३. चतुष्पात् सकलो धर्मः सत्यं चैव कृते युगे ।
नाधर्मेणागमः कश्चिन्मनुष्यान् प्रति वर्तते ॥ म० स्मृ० १।८१ ॥
४. म० स्मृ० ७।३ ॥

( ३१ )

साधारणतः यही प्रतीत होता है कि कृत-युग में राजा की कोई आवश्यकता न थी। इसी प्रकार का मत कई ग्रन्थों में पाया जाता है।

परन्तु आधुनिक विचारक—जिनकी दृष्टि में कृत-युग, त्रेता आदि का कोई महत्त्व नहीं है—इस मत को मानने में पूर्णतः सपक्ष नहीं हो सकते। इन लोगों की दृष्टि में राजा भी एक मनुष्य ही होता है और मानव-जाति की उत्पत्ति के साथ-साथ ही राजा की भी एक मानव के रूप में उत्पत्ति हुई है यद्यपि उसके राज्य-पद पर नियोजन के प्रकार समय-समय पर परिवर्तित होते रहे हैं। न्याय्य तथा अन्याय्य आचरण की अवधि कुछ निश्चित नहीं हो सकती है, जिसे कृत-युग या कलि-युग कहा जा सके। देश-काल आदि के अनुसार कभी न्याय्य आचरण का प्राधान्य हो सकता है और कभी अन्याय्य आचरण का। इस लिए यह कहना उचित नहीं है कि कृत-युग की कोई निश्चित अवधि रही और उसमें किसी राजा की आवश्यकता थी ही नहीं, अपितु यही मानना उचित है कि सब दिन लोगों में अत्यधिक रूप में अशान्ति रही और उसके प्रतीकार के लिए एक व्यवस्थापक या शासक की भी स्थिति अवश्य ही, अधिकार-तारतम्य के साथ-साथ, रही होगी।

इस प्रसङ्ग में यह विचारणीय है कि इस आधुनिक मत का समर्थन हमारे प्राचीन ग्रन्थों से भी होता है। जिन महा-भारत या मनुस्मृति आदि ग्रन्थों को पूर्वोक्त प्रथम-पक्ष का समर्थक बतलाया गया है उन्हीं से यह आधुनिक मत भी सिद्ध होता है। हमें तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इन ग्रन्थों के पूर्वोक्त मत का भी वस्तुतः तात्पर्य यही है जो आधुनिक मत का तात्पर्य है। महाभारत में युधिष्ठिर के प्रति भीष्म का कथन है कि सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलि-युग का अर्थ है 'दण्ड' के प्रयोग में राजा के अवधान का आधिक्य और अल्पत्व'। इससे यही सार निकलता है कि राजा की कुशलता तथा


१. दण्ड-नीत्यां यदा राजा सम्यक्कात्स्न्र्येन वर्त्तते ।
तदा कृत-युगं नाम कालसृष्टं प्रवर्त्तते ॥
दण्ड-नीत्यां यदा राजा त्रीनंशाननुवर्त्तते ।
चतुर्थमंशमुत्सृज्य तदा त्रेता प्रवर्त्तते ॥
अर्धं त्यक्त्वा यदा राजा नीत्यर्धमनुवर्त्तते ।
ततस्तु द्वापरं नाम स कालः सम्प्रवर्त्तते ॥
दण्ड-नीतिं परित्यज्य यदा कात्स्न्र्येन भूमिपः ।
प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन प्रवर्त्तेत तदा कलिः ॥

( ३२ )

अकुशलता के ऊपर ही कृत-युग तथा कलियुग निर्भर हैं, इनकी कोई निश्चित अवधि नहीं है। फिर कृत-युग में राजा की कोई आवश्यकता नहीं थी—इस कथन का क्या अर्थ है ? वसुमना तथा¹ बृहस्पति के सम्वाद से भी उपर्युक्त कथन की ही पुष्टि होती है। शुक्र-नीति-सार में भी राजा को ही युग-प्रवर्त्तक² माना गया है। मनु भी जब यह कहते हैं कि स्वभावतः सत्पथ-प्रवृत्त³ मनुष्य दुर्लभ है तो इससे यही मत परिपुष्ट होता है कि राजा के दण्ड-प्रयोग-नैपुण्य से ही प्रजा में सम्पूर्ण रूप से सत्पथ-प्रवृत्ति हुई है न कि किसी युग-विशेष का धर्म-स्थापन में कोई मूल्य है। मनु की व्याख्या में कुल्लूक भट्ट द्वारा उद्धृत एक श्रुति-वाक्य से⁴ भी यह सिद्ध होता है कि मनुष्य मूलतः सर्व-दोष-विनिर्मुक्त नहीं था। राज्य का अधिकारी क्षत्रिय है, जैसा पहले बतलाया जा चुका है, और 'पुरुष-सूक्त' में वर्णित क्षत्रिय की उत्पत्ति से भी कुछ अस्पष्ट समर्थन इस मतको मिलता है। 'प्रजापति' की भावना में भी राजा की ही भावना निहित है। यह दूसरी बात है कि राजा तथा 'प्रजापति' के कर्त्तव्यों में कुछ तारतम्य हो, परन्तु इतना तो स्पष्ट ही है कि 'प्रजापति' के वैदिक सिद्धान्त का 'राजा' के साथ घनिष्ठ-सम्बन्ध है। इस तथ्य से भी यही प्रमाणित होता है कि किसी न किसी रूप में सृष्टि के प्रारम्भ से ही राजा की अनुवृत्ति होती आ रही है। फिर भी कृत-युग में जो राजा या दण्ड आदि की सत्ता का प्रतिषेध किया गया है उसका तात्पर्य इतना ही प्रतीत हो रहा है कि दण्ड-प्रयोग के द्वारा प्रजा को सुव्यवस्थित कर दिए जाने पर राजा की मुख्य कृत्य—दण्ड-प्रयोग—से जो निवृत्ति हो जाती है इसी लिए यह अर्थ-वाद मात्र है कि राजा या दण्ड आदि की सत्ता कृत-युग में नहीं थी। किन्तु यह तो कथमपि नहीं कहा जा सकता कि कृत-युग में धर्म ही धर्म स्वभावतः प्रसृत था और राजा की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। इसका एक बहुत ही


राजा कृत-युग-स्रष्टा त्रेताया द्वापरस्य च ।
युगस्य च चतुर्थस्य राजा भवति कारणम् ॥
शान्ति-पर्व–६९।८०, ८७, ८९, ९१, ९८ ॥

इस प्रसङ्ग में शा० प० ९१।६, १४१।९-१०, उद्योग-पर्व १३२।१६ आदि श्लोक भी द्रष्टव्य हैं।

१. शान्ति-पर्व ६८।६–३६ ॥
२. शु० नी० सा० ४।५५ ॥
३. म० स्मृ० ७।२२ ॥
४. 'सत्यवाचो देवा अनृत-वाचो मनुष्याः'। कुल्लूक भट्ट–म० स्मृ० १।२९ ॥

( ३३ )

स्पष्ट चित्रण हमें नैषधीयचरित के¹ श्लोक में भी मिलता है जिसमें यह कहा गया है कि यद्यपि कृत-युग में भी अधर्म का एक पाद वर्त्तमान था परन्तु राजा नल के राज्य-विधान के द्वारा धर्म की पूर्ण-प्रतिष्ठा हो जाने से वह अधर्म व्यापृत नहीं हो पाता था।

राजा के मूल के विषय में अन्यान्य प्राचीन तथा अर्वाचीन मतों के विवरण के लिए म० म० काणे महाशय का "हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र" देखना चाहिए।

नीति-विद्या का मूल तथा इसके प्रवर्त्तक आचार्य

राजा या राज्य के मूल के विषय में जो स्थिति बतलाई गई है साधारणतया वही स्थिति राज-नीति विद्या के मूल के प्रसङ्ग में भी है। महाभारत में यह कहा गया है कि जब धर्म-विप्लव के कारण लोगों में अनाचार² का अत्यधिक उत्कर्ष हो गया तब सन्त्रस्त देवता-गण ब्रह्मा के यहां पहुंचे और उनसे धर्म के उद्धार के लिए प्रार्थना की। तदनन्तर ब्रह्मा ने एक लाख³ अध्यायों में एक शास्त्र की रचना की और उसमें सभी पुरुषार्थ और दण्ड-नीति आदि प्रायः सभी उपयोगी विषयों का समावेश किया गया था। इस शास्त्र का नाम था 'नीति-शास्त्र'⁴


१. पदैश्चतुर्भिः सुकृते स्थिरी-कृते कृतेऽमुना के न तपः प्रपेदिरे ?
मुवं यदेकाङ्घ्रिकनिष्ठया स्पृशन् दधावधर्मोऽपि कृशस्तपस्विताम् ॥
नै० च० १।७ ।।

२. नष्टे ब्रह्मणि धर्मे च देवांस्त्रासः समाविशत् ।
ते त्रस्ता नर-शार्दूल ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥
प्रसाद्य भगवन्तं तं देवं लोक-पितामहम् ।
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे दुःख-वेग-समाहताः ।।
भगवन्नर-लोकस्थं ग्रस्तं ब्रह्म सनातनम् ।
लोभ-मोहादिभिर्भावैः ततो नो भयमाविशत् ।।
अत्र निःश्रेयसं यन्नस्तद्ब्रूयायस्व पितामह ।
शान्ति-पर्व ५९।२२, २३, २४, २७ ।।

३. ततोऽध्याय-सहस्राणां शतं चक्रे स्व-बुद्धिजम् ।
यत्र धर्मस्तथैवार्थः कामश्चैवाभिवर्णितः ।। शा० प० ५९।२९ ।।
इस शास्त्र के विषय-विवरण के लिए इस अध्याय के ७४ श्लोक तक द्रष्टव्य हैं।

४. तत्सर्वं राज-शार्दूल नीति-शास्त्रेऽभिवर्णितम् ।। वही ५९।७४ ।।
३ शु० भू०

( ३४ )

किम्वा 'दण्ड-नीति'¹। महाभारत में ही अन्यत्र² ब्रह्म-प्रणीत नीति-शास्त्र के प्रचारक के रूप में स्वायम्भुव मनु का भी नाम आया है और इसी मानव-शास्त्र के आधार पर उशना तथा बृहस्पति के द्वारा अपने-अपने शास्त्र का प्रणयन किए जाने का उल्लेख है। शुक्र-नीति-सार के अनुसार इस ब्रह्म-प्रणीत 'नीति-शास्त्र' में एक करोड़³ श्लोक थे। परन्तु प्रजा की आयु में ह्रास को देखकर भगवान् शङ्कर ने उस 'नीति-शास्त्र' को दश हजार अध्यायों में संक्षिप्त किया।

इस संक्षिप्त शास्त्र का नाम भगवान् शङ्कर के पर्याय 'विशालाक्ष' के आधार पर 'वैशालाक्ष नीति-शास्त्र'⁴ पड़ा। पुनः इन्द्र ने उस वैशालाक्ष शास्त्र को ५ हजार अध्यायों में संक्षिप्त किया और उसका नाम पड़ा 'बाहुदन्तक-शास्त्र'⁵। तत्पश्चात् बृहस्पति ने तीन हजार अध्यायों में उस 'बाहुदन्तक-शास्त्र' का सार निकाला जिसका नाम 'बार्हस्पत्य⁶ शास्त्र' पड़ा। परन्तु सर्वान्त में महान् शुक्राचार्य ने एक हजार⁷ अध्यायों में उसका संक्षिप्त रूप प्रस्तुत किया। शुक्र-नीति-सार के विवरण के अनुसार इस शुक्र-कृत,संक्षिप्त शास्त्र में केवल २२००⁸ श्लोक थे। वे २२०० श्लोक सम्पाद्यमान शुक्र-नीति-सार में वर्त्तमान हैं, यद्यपि


१. दण्डेन नीयते चेदं दण्डं नयति वा पुनः ।
दण्ड-नीतिरिति ख्याता त्रींल्लोकानभिवर्तते ॥ शा० प० ५९।७८ ॥
२. शा० प० ३३६।३८-४६ ॥
३. शतलक्ष-श्लोक-मितं नीति-शास्त्रमयोक्तवान् ।
स्वयम्भूभगवान्लोक-हितार्थं संग्रहेण वै ॥ शु० नी० सा० १।२,३ ॥
४. प्रजानामायुषो ह्रासं विज्ञाय भगवान् शिवः ।
संचिक्षेप ततः शास्त्रम् महास्त्रं ब्रह्मणा कृतम् ॥
'वैशालाक्ष' मिति प्रोक्तं तदिन्द्रः प्रत्यपद्यत ।
दशाध्याय-सहस्राणि सुब्रह्मण्यो महातपाः ॥ शा० प० ५९।८१-८२ ॥
५. भगवानपि तच्छास्त्रं संचिक्षेप पुरन्दरः ।
सहस्रैः पञ्चभिस्तात यदुक्तं बाहुदन्तकम् ॥ वही ५९।८३ ॥
६. अध्यायानां सहस्रैस्तु त्रिभिरेव बृहस्पतिः ।
संचिक्षेपेश्वरो बुद्ध्या बार्हस्पत्यं तदुच्यते ॥ वही ५९।८४ ॥
७ अध्यायानां सहस्रेण काव्यः संक्षेपमब्रवीत् ॥ वही ५९।८५ ॥
८. मन्वाद्यैराहतो योऽर्थस्तदर्थो भार्गवेण वै ।
द्वा-विंशति-शतं श्लोका नीति-सारे प्रकीर्त्तिताः ॥
शु० नी० सा० ४।१२४१-४२ ॥

( ३५ )

वस्तुस्थिति तो यह है कि 'खिल' को छोड़ कर भी प्रस्तुत शुक्र-नीति-सार में २३६९ श्लोक हैं और 'खिल' के साथ २४५४ श्लोक। कुछ सम्वादात्मक श्लोकों के पृथक्करण से २२०० श्लोक ही मौलिक हैं—ऐसा कहा जा सकता है। परन्तु यह कुछ असङ्गत सा प्रतीत हो रहा है कि जिस शास्त्र में एक हजार अध्याय थे उसकी श्लोक-संख्या केवल २२०० होगी। उशना¹ (शुक्र) तथा बृहस्पति² का उल्लेख महाभारत में अनेक बार किया गया है। एक स्थान पर महाभारत ने³ 'बृहस्पति', 'विशालाक्ष', 'काव्य' (शुक्र), 'इन्द्र' (सहस्राक्ष महेन्द्र), 'प्राचेतस मनु', 'भरद्वाज' तथा 'गौर-शिरा' मुनि को राज-शास्त्र-निर्माता बतलाया है। उसमें एक जगह शम्बर⁴ तथा आचार्य का भी उल्लेख हुआ है। कौटिल्य के अर्थ-शास्त्र में ५ सम्प्रदायों के नाम उल्लिखित हैं—मानव,⁵ बार्हस्पत्य,⁶ औशनस,⁷ पाराशर⁸ तथा आम्भीय⁹। इन सम्प्रदायों के अतिरिक्त सर्वनाम का भी प्रयोग मिलता है—'अपरे',¹⁰ 'एके'¹¹ तथा 'एके'¹²। यह कहना कठिन है कि कौटिल्य ने ज्ञात आचार्यों में से ही कुछ आचार्यों के लिए 'अपरे', 'एके' आदि सर्वनाम का प्रयोग किया है या किसी अज्ञात आचार्य के लिए। इन नामों के अतिरिक्त अर्थ-शास्त्र में निम्न-लिखित आचार्यों के नाम उल्लिखित हैं :—भारद्वाज,¹³ विशालाक्ष¹⁴, पराशर,¹⁵ पिशुन,¹⁶ पिशुन-पुत्र,¹⁷ कौणप-दन्त,¹⁸ वात-व्याधि¹⁹, बाहुदन्ती-पुत्र²⁰ (इन्द्र),


१. शा० पर्व ५७।२; ५७।४०; ३७।१०; ५६।२८; अनु० पर्व-३९।८ इत्यादि।
२. शा० पर्व ५६।३८; ५७।६; ३७।१०; अनु० पर्व-३९।८ इत्यादि।
३. शा० पर्व-५८।१-३।
४. शा० पर्व-१०२।३१-३२।
५. अर्थ-शा०-पृ० १०, ५७, ३७२, ४०१ (चौखम्बा १९६२ ई०)।
६. वही-पृ० १०, ५७, ३७२, ४०२, ८१२।
७. वही-पृ० १०, ५७, ३७२, ४०१, ८१२।
८. वही-पृ० ५४, ६४, ६८२, ६९६।
९. वही-पृ० ६६।
१०. वही-पृ० ३४५।
११. वही-पृ० ७२६।
१२. वही-पृ० ७२६।
१३. वही-पृ० २५, ६४, ५२८, ६८० इत्यादि।
१४. वही-पृ० २५, ५४, ६४, ६८१, आदि।
१५. वही-पृ० २५।
१६. वही-पृ० २६, ५५, ६४, ५२५, आदि।
१७. वही-पृ० ५२५।
१८. वही-पृ० २६, ६४ आदि।
१९. वही-पृ० २६, ६६, ५४९ आदि।
२०. वही-पृ० २७।

( ३६ )

कात्यायन,$^१$ कणिङ्क$^२$ भारद्वाज, दीर्घ-चारायण$^३$ ( दीर्घश्चारायणः ), घोटमुख$^४$ तथा किञ्जल्क$^५$। अर्थ-शास्त्र में ही भूयो-भूयः 'आचार्याः'$^६$ का भी उल्लेख किया गया है। यह निर्णय करना कठिन है कि यहां अन्यान्य आचार्यों का ही मत 'आचार्याः' शब्द से खण्डनार्थ प्रस्तुत किया गया है या किसी व्यक्ति-विशेष का संकेत है। महाभारत में भी एक जगह आचार्य$^७$ का उल्लेख हुआ है परन्तु वहां तो यही प्रतीत होता है कि नीति-विद्या-विशारद के अर्थ में आचार्य शब्द का प्रयोग किया गया है। महाभारत में एक 'भाष्य'$^८$ का भी उल्लेख है।

कामन्दकीय-नीति-सार की$^९$ उपाध्याय-निरपेक्षा व्याख्या में किसी ग्रन्थान्तर के उद्धरण से यह बतलाया गया है कि ब्रह्मा ने एक लाख अध्यायों में सम्पन्न एक शास्त्र की रचना की और बाद में नारद, शक्र ( इन्द्र ), बृहस्पति, भार्गव ( शुक्र ), भारद्वाज, भीष्म, पाराशर, मनु तथा अन्यान्य ऋषियों द्वारा उस ब्राह्म-शास्त्र को संक्षिप्त बनाया गया और पश्चात् पुनः विष्णुगुप्त ( कौटिल्य ) ने राजाओं के उपयोग के लिए देश-काल के अनुसार उसका संक्षेप किया।

काम-सूत्र$^{१०}$ के अनुसार यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मा ने एक लाख अध्यायों में विभक्त एक शास्त्र की रचना की और बाद में उस शास्त्र में


१. वही-पृ० ५२४।
२. वही-पृ० ५२४ ( सम्भवतः पूर्वोक्त भारद्वाज से ये अभिन्न हैं )।
३. वही-पृ० ५२४।
४. वही-पृ० ५२४।
५. वही-पृ० ५२५।
६. वही-पृ० १६, ३३२, ३४५, ३८८, ४०२, ४०९ आदि।
७. शान्ति-पर्व—१०२। ३२॥
८. शान्ति-पर्व १०३।४४।
९. ब्रह्माध्याय-सहस्राणां शतं चक्रे स्व-बुद्धिजम्।
तन्नारदेन शक्रेण गुरुणा भार्गवेण च॥
भारद्वाज-विशालाक्ष-भीष्म-पाराशरैस्तथा।
संक्षिप्तं मनुना चैव तथा चान्यैर्महर्षिभिः॥
प्रजानामायुषो ह्रासं विज्ञाय च महात्मना।
संक्षिप्तं विष्णु-गुप्तेन नृपाणामर्थ-सिद्धये॥ उ० निरपेक्षा-पृ० ८ (पूना)।
१०. प्रजापतिर्हि प्रजाः सृष्ट्वा तासां स्थिति-निबन्धनं त्रिवर्गस्य साधनम् अध्यायानां शत-सहस्रेण अग्रे प्रोवाच। तस्य ऐक-देशिकं स्वायम्भुवो मनुः धर्माधिकारिकं पृथक् चकार। बृहस्पतिः अर्थाधिकारिकम्॥ का० सू० १।१। ५-७॥

( ३७ )

वर्णित धर्म-शास्त्र को स्वायम्भुव मनु ने और अर्थ-शास्त्र को बृहस्पति ने सुसङ्घठित किया। महाभारत में भी स्वायम्भुव¹ मनु को धर्म-शास्त्र का प्रवर्त्तक माना गया है और प्राचेतस² मनु को अर्थ-शास्त्र (नीति-शास्त्र) का। नीति-प्रकाशिका³ में ब्रह्मा, महेश्वर, इन्द्र, प्राचेतस मनु, बृहस्पति, शुक्र, भारद्वाज, वेद-व्यास तथा गौर-शिरा का, दशकुमार⁴ चरित्र में शुक्र, आङ्गिरस (बृहस्पति), विशालाक्ष, बाहुदन्ती-पुत्र तथा पराशर (इत्यादि) का और बुद्ध-चरित⁵ में भृगु, अङ्गिरा, शुक्र तथा बृहस्पति का उल्लेख राज-शास्त्र निर्माताओं के रूप में किया गया है। शुक्र-नीति-सार⁶ में वशिष्ठ आदि को नीति-सार-संग्राहक बतलाया गया है। एड्गर्टन के द्वारा पुनरुद्धृत (Reconstructed) पञ्चतन्त्र के प्रथम श्लोक में मनु, बृहस्पति, शुक्र, पराशर, पराशर-पुत्र तथा चाणक्य का नृप-शास्त्र के प्रतिष्ठापक के रूप में अभिवन्दन किया गया है। चाणक्य तथा कौटिल्य के विषय में एकता तथा अनेकता के परस्पर-विरुद्ध दो मत प्रचलित हैं।

उपर्युक्त आचार्यों में से कुछ आचार्यों के राज-नीति-विषयक (अर्थ-शास्त्र-विषयक) ग्रन्थ की स्थिति तो प्रामाणिक है पर सभी आचार्यों के तद्विषयक ग्रन्थों की स्थिति में अभी प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ आचार्यों ने धर्म-शास्त्र के ऊपर, कुछ ने अर्थ-शास्त्र (राज-नीति-शास्त्र) के ऊपर और कुछ आचार्यों ने धर्म-शास्त्र तथा अर्थ-शास्त्र इन दोनों पर स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखे थे। परन्तु धर्म-शास्त्र में भी अर्थ-शास्त्र⁷ की चर्चा और अर्थ-शास्त्र में धर्म-शास्त्र की चर्चा अत्यावश्यक है, अन्यथा दोनों ही अपूर्ण रह जाते हैं। फिर भी दोनों को अलग-अलग मानने का मुख्य कारण यही है कि धर्म-शास्त्र में धर्म का प्राधान्य होता है जब कि अर्थ-शास्त्र में अर्थ का। यही विज्ञानेश्वर⁸ का भी मत है। बहुत सम्भव है कि जिन धर्म-शास्त्र ग्रन्थों में राज-नीति का मार्मिक विवेचन किया गया होगा उन धर्म-शास्त्रों के आचार्यों को भी नीति-शास्त्र-प्रवर्त्तक के रूप में मान लिया गया हो ! परन्तु उपर्युक्तलिखित सूचियों


१. शान्ति-पर्व २१।१२ ॥
२. शान्ति-पर्व ५७।४३, ५८।२ ॥
३. हिस्ट्री ऑफ् धर्म-शास्त्र, भा०, ३, पृ० ४ ॥
४. द० कु० च०, उ० पी०-८ ॥
५. बुद्ध-चरित-१।४६ ॥
६. शु० नी० सा० १।३ ॥
७. वही ४।२९४-९५ ॥ मिताक्षरा २।२१ ॥
८. यद्यपि समान-कर्तृकतया अर्थ-शास्त्र-धर्म-शास्त्रयोः स्वरूप-गतो विशेषो नास्ति तथापि प्रमेयस्य धर्मस्य प्राधान्यात् अर्थस्य च अप्राधान्यात्...मिताक्षरा-या० स्मृ० २।२१ ।

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में कुछ ऐसे भी आचार्य हैं जिनका संकेत अत्यल्प है। उदाहरणार्थ हम कौटिल्य के द्वारा उल्लिखित पिशुन, पिशुन-पुत्र, कौणप-दन्त तथा वात-व्याधि को ले सकते हैं। इन आचार्यों का संकेत भी इतना दुर्लभ है कि यह कहना कठिन है कि इन आचार्यों के ग्रन्थ भी कभी थे ! यदि अर्थ-शास्त्र के ऊपर 'नय-चन्द्रिका' व्याख्या लिखने वाले माधवयज्वा (जिसका सम्पादन डा० जौली तथा डा० स्मित ने किया है) के अनुसार पिशुन को नारद का, कौणपदन्त को भीष्म का और वात-व्याधि को उद्धव का पर्याय मान लिया जाय तो कथञ्चित् कुछ समाधान मिल जाता है। इनमें से भीष्म तथा उद्धव की राजनीति महाभारत आदि कुछ ग्रन्थों को छोड़ कर स्वतन्त्र रूप में उनके द्वारा उपनिबद्ध नहीं हुई है। जो कुछ भी हो इतना तो निश्चित है कि किसी भी सूची को पूर्ण नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि अपने से पूर्ववर्त्ती सभी आचार्यों का संग्रह किसी भी सूचीकार ने नहीं किया है।

उपर्युक्त आचार्यों के ग्रन्थों में से अर्थ-शास्त्र या नीति-शास्त्र से स्वतन्त्र रूप में सम्बद्ध केवल तीन ग्रन्थ—कौटिल्य-अर्थ-शास्त्र, शुक्र-नीति-सार तथा चाणक्य-सूत्र—अथवा डा० एफ० डब्ल्यू० थॉमस द्वारा सम्पादित बार्हस्पत्य-सूत्र को लेकर चार ग्रन्थ उपलब्ध हैं। विद्वानों का मत है कि इस बार्हस्पत्य-सूत्र का मूल रूप यद्यपि प्राचीनतम है तथापि वर्त्तमान रूप नवम या दशम शतक का है। शुक्र-नीति-सार का भी साक्षात्-सम्बन्ध शुक्राचार्य से सिद्ध करना कुछ कठिन है।

इन ग्रन्थों के अतिरिक्त आचार्य कामन्दक का 'नीति-सार' (जिसका प्रथम-संघटन ४०० ई० के आस-पास हुआ था और द्वितीय-संघटन १७ वीं शताब्दी में माना जाता है), वैशम्पायन के द्वारा निर्मित 'नीति-प्रकाशिका', भोज का 'युक्ति-कल्पतरु' सोमदेव (९५९ ई०) का 'नीति-वाक्यामृत'; लक्ष्मीधर के 'कृत्य-कल्पतरु' का 'राजनीति-काण्ड', चण्डेश्वर का 'राजनीति-रत्नाकर', मित्र-मिश्र का 'राजनीति-प्रकाश', नीलकण्ठ का 'नीति-मयूख' अथवा 'राज-नीति-मयूख' अनन्तदेव का 'राज-धर्म-कौस्तुभ' आदि राज-नीति-शास्त्र के प्रमुख ग्रन्थ हैं। पुराणों में भी अग्नि-पुराण (अध्याय—२१८-२४२), गरुड़-पुराण (अध्याय—१०८-११५), मत्स्य-पुराण (अध्याय—२१५-२४३), मार्कण्डेय-पुराण (अध्याय—२४), कालिका-पुराण (अध्याय—८७) आदि विशेषतः अवलोकनीय हैं। स्मृतियों में मनुस्मृति (सप्तम से नवम अध्याय तक), बृहत्पाराशर-स्मृति (अध्याय—१०) वृद्ध-हारित-स्मृति (अध्याय—७) आदि द्रष्टव्य हैं। महाभारत के वनपर्व (अध्याय—१५०), सभापर्व