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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

( २४ )

(ग) राज-शास्त्र—म० म० काणे¹ महाशय का कथन है कि इस शास्त्र का सबसे उचित नाम है 'राज-शास्त्र'। इसका तात्पर्य यही है कि दण्ड अपने प्राधान्य के कारण 'राजा' या 'शासक' शब्द से अभिहित होने लगा है। अतएव दण्ड-प्रख्यापक शास्त्र को राज-शास्त्र कहना उचित ही है। इस दृष्टि के समर्थन में अन्यान्य युक्तियाँ भी स्पष्ट हैं।

राजा

ऊपर यह बतलाया जा चुका है कि 'नीति' का अधिकारी है 'राजा'। अब हमें राजा शब्द के अर्थ का अनुसन्धान करना चाहिए। राजा शब्द की निष्पत्ति बतलाते हुए यास्क² ने कहा है कि 'राजू दीप्तौ' धातु से राजा की निष्पत्ति हुई है। इसकी उपपत्ति में निरुक्त के अद्वितीय व्याख्याकार³ दुर्गाचार्य का कहना है कि यह राजा आठ लोक-पालों की मात्रा से निर्मित शरीर से प्रदीप्त होते रहता है। पाणिनि-व्याकरण की दृष्टि से भी 'राजू' धातु से ही 'कनिन्' प्रत्यय करने से 'राजन्' शब्द की निष्पत्ति होती है। महाभारत⁴ में 'रञ्ज्' धातु से राजा की निष्पत्ति मानी गई है। महाकवि कालिदास⁵ ने भी इसीका अनुसरण किया है। इसकी व्याख्या में मल्लिनाथ⁶ का कथन है कि यद्यपि राजन् शब्द की निष्पत्ति 'राजू' धातु से ही होती है तथापि धातुओं की नानार्थकता की दृष्टि से 'रञ्ज्' धातु से इस शब्द की निष्पत्ति मानी गई है। म० म० काणे के द्वारा राज-धर्म-काण्ड से⁷ उद्धृत एक वचन के अनुसार


१. हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, पृ० ४, (भाग-३)
२. राजा राजतेः—या० निरुक्त २।३।
३. दीप्यते ह्यसौ पञ्चानां (अष्टानाम्) लोकपालानाम् वपुषा। दुर्गाचार्य।
४. रञ्जिताश्च प्रजाः सर्वास्तेन राजेति शब्द्यते।
म० भा० (शा० प०) ५९।१२५।
लोक-रञ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः।
म० भा० (शा० प०) ५७।११॥
५. राजा प्रकृति-रञ्जनात्। रघुवंश ४।१२॥
६. यद्यपि राज-शब्दो राजतेः दीप्यर्थात् कनिन्-प्रत्ययान्तः न तु रञ्जेः तथापि धातूनाम् अनेकार्थत्वाद् रञ्जनात् राजा इत्युक्तम्। मल्लिनाथ रघु० ४।१२॥
७. बलेन चतुरङ्गेन यतो रञ्जयति प्रजाः।
दीप्यमानः स वपुषा तेन राजारभिधीयते॥
हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, भाग-३, पृ० २८॥