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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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(क) दण्ड-नीति—इस प्रसंग में नीति शब्द का अर्थ सन्मार्ग-प्रापण या दण्ड-प्रापण नहीं है अपितु प्रख्यापन अथवा¹ उपदेश। जिनकी दृष्टि से दण्ड-नीति में प्रयुक्त नीति शब्द प्रापण (दण्ड-प्रापण) अर्थ का अभिधायक है उनके मत में इस शास्त्र का नाम होना चाहिए—दण्ड-नीति-शास्त्र।

(ख) अर्थशास्त्र—हम पहले देख चुके हैं कि दण्ड या दण्ड-नीति के दो फल हैं—अलब्ध-लाभ तथा लब्ध-संरक्षण। अर्थ-शास्त्र के भी ये ही दो फल बतलाए² गए हैं। अतएव दण्ड-नीति (नीति-शास्त्र) को अर्थ-शास्त्र कहा जाता है। यद्यपि नीति-शास्त्र तथा अर्थ-शास्त्र के पर्यायत्व का स्पष्ट संकेत शुक्र-नीति-सार में नहीं है तथापि इसमें किए गए विद्या-परिगणन³ में नीति-शास्त्र के पृथक् अनुल्लेख तथा अर्थ-शास्त्र के⁴ लक्षण पर ध्यान देने से इनका पर्यायत्व प्रतीत हो जाता है। यतः दण्ड-प्रयोग में धर्म का अनुसन्धान⁵ परमावश्यक बतलाया गया है अतएव महाभारत⁶ में धर्म-शास्त्र से अननुमोदित अर्थ-शास्त्र की निन्दा भी की गई है। परन्तु इसका तात्पर्य उपर्युक्त ही है। परन्तु 'बार्हस्पत्य-अर्थ-शास्त्र' में प्रयुक्त अर्थ-शब्द का अर्थ व्यापक है और इस दृष्टि से उस अर्थ-शास्त्र का यह अर्थ-शास्त्र या नीति-शास्त्र एक अंश है न कि पर्याय। अतएव कामन्दक⁷ ने कौटिल्य के अर्थ-शास्त्रापरपर्याय नीति-शास्त्र को बार्हस्पत्य अर्थ-शास्त्र का एक अंश माना है।


१. दण्डनीत्याम् = अर्थ-शास्त्रे—विज्ञानेश्वर—या० स्मृ० २।२१ ॥
राजनीतिलक्षणमर्थ-शास्त्रमिह विवक्षितम्—
विज्ञानेश्वर—या० स्मृ० १।३१३ ॥
दण्डेन नीयते चेदं दण्डं नयति वा पुनः।
दण्ड-नीतिरिति ख्याता त्रींल्लोकानभिवर्तते ॥
म० भा० (शा० प०) ५९।७८ ॥
२. पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थ-शास्त्राणि पूर्वाचार्यैः प्रस्थापितानि ......। कौ० शा०, पृ० १।
३. शु० नी० सा० ४।२६७–२७१ ॥
४. श्रुति-स्मृत्यनुरोधेन राज-वृत्तं हि शासनम् ।
सुयुक्त्यार्थार्जनं यत्र ह्यर्थ-शास्त्रं तदुच्यते ॥ शु० नी० सा० २९६–९७ ॥
५. इस प्रसङ्ग में या० स्मृ० २।२१ की मिताक्षरा द्रष्टव्य है।
६. अर्थ-शास्त्र-परो राजा धर्मार्थान्नाधिगच्छति ।
अस्थाने चास्य तद्वित्तं सर्वमेव विनश्यति ॥
म० भा० (शा० प०) ७१।१४ ॥
७. का० नी० सा० १।६ ॥

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