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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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सम्बन्ध इस दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) से जोड़ना कुछ अधिक अस्पष्ट है। अतः कौटिल्य का फलनिर्देश बहुत उचित नहीं प्रतीत होता है। प्रायः इसी लिए महाभारत¹ मनुस्मृति² तथा याज्ञवल्क्य³ स्मृति आदि में दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) के दो ही फल—अलब्ध-लाभ तथा लब्ध-संरक्षण—बतलाए गए हैं। दण्ड में प्रयास⁴ का भी समावेश है, अतएव मनुस्मृति तथा याज्ञवल्क्य स्मृति में द्वितीय फल के प्रसंग में क्रमशः 'अवेक्षया' तथा 'यत्नेन' जोड़ दिया गया है। परन्तु है तो यह दण्ड-नीति ( दण्ड-प्रापण ) का ही फल।

इस 'नीति' (सन्मार्ग-प्रापण) का एक और नामान्तर है 'अर्थ⁵-विद्या'। इसकी पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि इस दण्ड-नीति-शास्त्र को अर्थ-शास्त्र⁶ भी कहा गया है, जिसकी चर्चा आगे की जाएगी। इसके अतिरिक्त 'नय'⁷ शब्द का भी प्रयोग 'नीति-विद्या' के अर्थ में होता है।

उपर्युक्त कथन के आधार पर यह सिद्ध है कि इस नीति-विद्या के नामान्तर हैं :—राज-नीति, राज-धर्म, राज-विद्या, दण्ड-नीति (दण्डेन-नीतिः अथवा दण्डस्य=राज्ञः नीतिः), अर्थ-विद्या तथा नय। इसी आधार पर इस विद्या के प्रतिपादक ग्रन्थों के नाम हैं :—नीति-शास्त्र, राज-नीति-शास्त्र, राज-धर्म-शास्त्र (राज-धर्मानुशासन), राज-शास्त्र, दण्ड-नीति, दण्ड-नीति-शास्त्र, अर्थ-शास्त्र एवम् नय-शास्त्र। इनमें से हम दण्ड-नीति अर्थ-शास्त्र तथा राज-शास्त्र इन नामकरणों का संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत कर रहे हैं :—


१. दण्ड-नीतिं पुरस्कृत्य विजानन् क्षत्रियः सदा । अनवाप्तं च लिप्सेत लब्धं च परिपालयेत् ॥ म० भा० (शा० प०) ६९।१०३ ॥

२. अलब्धमीहेद्दण्डेन लब्धं रक्षेद्बवेक्षया । रक्षितं वर्धयेद्वृद्ध्या वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ म० स्मृ० ७।१०१ ॥

३. अलब्धमीहेद्धर्मेण लब्धं यत्नेन पालयेत् । पालितं वर्धयेन्नीत्या वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ या० स्मृ० १।३१७ ॥

४. साम्नि प्रयास-धन-व्यय-सैन्य-प्रक्षयादि-दोषाभावात् दण्डे तु तत्सद्भावेऽपि कार्य-सिद्धयतिशयात् ॥ कुल्लूक भट्ट, म० स्मृ० ७।१०९ ॥

५. महाभारत (द्रोण-पर्व) ६।१ ॥

६. आन्वीक्षिकी दण्ड-नीतिः तर्क-विद्यार्थशास्त्रयोः ॥ अमर-कोश (शब्दादि वर्ग)

७. रघुवंश-४।१०, किरातार्जुनीय-१।७, ९ आदि।