शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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है । इसी लिए याज्ञवल्क्य ने वार्त्ता¹—पशुपाल्य, वाणिज्य आदि—के लिए 'नीति' शब्द का प्रयोग किया है। इसी से यह भी सिद्ध है कि वार्त्ता के फल को हम दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) का भी फल कह सकते हैं। इस स्थिति के ध्यान से हमें कौटिल्य के द्वारा 'रक्षित-सम्वर्धन' के दण्ड-नीति-फल-प्रसङ्ग में सन्निवेश का अर्थ लग जाता है।
अर्थ-शास्त्र में दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) के चार प्रयोजन बतलाए गए हैं—'अलब्ध-लाभ, लब्ध-परिरक्षण, रक्षित-सम्वर्धन तथा सम्वर्धित सम्पत्ति का पात्र में समर्पण। उचित दण्ड-प्रयोग से मूर्त्त धन-धान्यादि तथा अमूर्त्त यश की सम्प्राप्ति होती है। अतः प्रथम फल तो दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) का ही है। द्वितीय फल—लब्ध-परिरक्षण—भी दण्ड-प्रापण का ही फल है—यह भी सत्य है। अत एव महाकवि कालिदास का भी कथन है :—
यस्मिन् महीं शासति वाणिनीनां निद्रां विहारार्ध-पथे गतानाम् ।
वातोऽपि नास्रंसयदंशुकानि को लम्भयेदाहरणाय हस्तम्³ ॥
अतः प्रथम दो को तो हम असन्दिग्ध रूप में दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) का फल⁴ मान सकते हैं। यद्यपि ये दोनों फल भी 'नीति' (सन्मार्ग-प्रापण) के ही हैं तथापि औपचारिक रूप में इन्हें दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) के फल कहे गए हैं। ये दोनों ही तत्त्व—अलब्ध-लाभ तथा लब्ध-परिरक्षण—ऐहलौकिक अभ्युदय तो हैं ही, यदि इन्हें पारलौकिक अभ्युदय भी मान लिया जाय तो कोई अनुचित न होगा। अत एव गीता में भगवान् श्रीकृष्ण की उक्ति है—
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योग-क्षेमं वहाम्यहम् ॥⁵
तृतीय फल है तो 'वार्त्ता' का परन्तु पूर्व-निर्देशानुसार इसका भी दण्ड-नीति (दण्ड-प्रापण) के फल के अन्तर्गत निर्देश किया गया है। चतुर्थ-फल का
१. पालितं वर्धयेन्नीत्या—या० स्मृ० १।३१७ ॥
नीत्या = वणिज्यादिकया—मिताक्षरा ।
तुलना कीजिए—
रक्षितं वर्धयेद्वृद्ध्या—म० स्मृ० ७।१०१ ॥
२. अलब्ध-लाभार्था लब्ध-परिरक्षणी रक्षित-विवर्धनी वृद्धस्य तीर्थेषु प्रतिपादनी च ॥ अर्थ-शास्त्र, पृ० १५ ।
३. रघुवंश—६।७५ ॥
४. दण्ड-नीत्याम् = अर्थ-योग-क्षेमोपयोगिन्याम् । मिता० या० स्मृ० १।३११ ।
५. गीता—९।२२ ।