शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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का संरक्षण करना पड़ता है। राज-नीति के प्रसङ्ग में वर्णित राज-धर्म में केवल बाहु-बल आदि का विनिर्णय है। इसीलिए इसका सम्बन्ध राजन्य से मुख्य है। और यही धर्म ब्राह्मण से गौणतः सम्बद्ध है न कि मन्त्र-बल से क्रियमाण प्रजा-पालनात्मक धर्म। अत एव राजन् शब्द का प्रकृत प्रसङ्ग में मुख्य अर्थ क्षत्रिय ही है। यह भी क्षत्रिय-मात्र का नहीं अपितु अभिषिक्त क्षत्रिय का ही धर्म है। अत एव महाभारत¹ में भी चातुर्वर्ण्य के धर्म से अतिरिक्त राज-धर्म का उल्लेख किया गया है। अन्यान्य धर्म-शास्त्रकारों² का भी मत यही है। शुक्र-नीति-सार.में जो अनभिषिक्त³ को राजा कहा गया है उसका तात्पर्य इतना ही है कि उसका अभिषेक वैदिक-विधि से न होकर यदि लौकिक रूप में भी हुआ हो तब भी वह राजा कहला सकता है। अतः अभिषिक्त क्षत्रिय ही प्रधानतः राज्याधिकारी है और अन्यजातीय व्यक्ति गौण-रूप में 'राजा' कहला सकता है।
राजा का मूल
यह तो स्पष्ट है कि जब कुमार्ग पर लोग चलने लगे होंगे तभी 'नीति' की और उसके उपाय के रूप में प्रधानतया 'दण्ड' और उस 'दण्ड' के निर्वाहक के रूप में राजा की आवश्यकता हुई होगी। अतएव सर्वत्र 'दण्ड' की आवश्यकता बतलाते समय 'मात्स्य न्याय'⁴ का उल्लेख किया गया है। इसी
तपो-मन्त्र-बलं नित्यं ब्राह्मणेषु प्रतिष्ठितम् ।
अस्त्र-बाहु-बलं नित्यं क्षत्रियेषु प्रतिष्ठितम् ॥
ताभ्यां सम्भूय कर्तव्यं प्रजानाम्परिपालनम् ।
म० भा० (शा० प०) ७४।१३-१५ ॥
१. के धर्माः सर्व-वर्णानां चातुर्वर्ण्यस्य के पृथक् ।
चातुर्वर्ण्याश्रमाणां च राज-धर्माश्च के मताः ?
म० भा० (शा० प०) ६०।२ ॥
२. राजा अभिषिक्तः क्षत्रियः । हरदत्त-गौ० ध० शा० ११।१ ॥
विज्ञानेश्वर—या० स्मृ० २।१ ॥
३. अभिषिक्तो नाभिषिक्तो नृपत्वं तु यदाप्नुयात् ॥ शु० नी० सा० १।२६ ॥
४. 'अप्रणीतो हि मात्स्य-न्यायमुद्भावयति । बलीयानबलं हि ग्रसते दण्डधराभावे' अर्थ-शास्त्र-पृ० १६ ॥
दण्डाभावे परिध्वंसी मात्स्यन्यायः प्रवर्त्तते ॥ का० नी० सा० २।४० ॥
दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विनश्येयुरिमाः प्रजाः ।
जले मत्स्यानिवाभक्ष्यन् दुर्बलं बलवत्तराः ॥ म०भा० (शा०प०) १५।३० ॥