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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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होने पर भी राज-धर्म का सम्बन्ध जो अन्यान्य जातीय लोगों से जोड़ा¹ जाता है उसका कारण इतना ही है कि मध्यम ब्राह्मण आदि अपने कृत्य के सम्पादन में असफल होकर जब क्षत्रिय आदि के कृत्य से² अपनी जीविका चलाने लगते हैं तो उनके लिए क्षत्रिय आदि के धर्म का अवलम्बन आवश्यक ही है³।

वस्तुतः प्रजा-पालन का भार ब्राह्मण तथा क्षत्रिय इन दोनों पर है, अत एव दोनों ही राज्य-कृत्य के अधिकारी हैं। परन्तु दोनों का क्षेत्र व्यवस्थित है— ब्राह्मण को मन्त्र-बल से⁴ तथा राजन्य को बाहु-बल एवम् अस्त्र-बल से प्रजा


१. यद्यपि राजानमधिकृत्य अयं धर्म-कलाप उक्तः तथापि वर्णान्तरस्यापि विषय-मण्डलादि-परिपालनाधिकृतस्यायं धर्मो वेदितव्यः। विज्ञानेश्वर—या० स्मृ० १।३६८ ॥
नृप इति न क्षत्रिय-मात्रस्यायं धर्मः किन्तु प्रजा-पालनाधिकृतस्यान्यस्यपीति दर्शयति। वही २।१ ॥
राज-शब्दोऽपि नात्र क्षत्रिय-जाति-वचनः किन्तु अभिषिक्त-जनपद-पुर-पालयितृ-वचनः। कुल्लूक भट्ट—म० स्मृ० ७। १ ॥
इस श्लोक पर मेधातिथि-भाष्य भी द्रष्टव्य है।

२. युधिष्ठिर उवाच—
व्याख्याता राज-धर्मेण वृत्तिरापत्सु भारत ?
कथंस्विद्वैश्य-धर्मेण सञ्जीवेद् ब्राह्मणो न वा ?
भीष्म उवाच—
अशक्तः क्षत्र-धर्मेण वैश्य-धर्मेण वर्त्तयेत्।
म० भा० (शा० प०) ७८।१,२ ॥
ब्राह्मण के लिए शूद्र-कर्म का परिग्रहण सर्वथा प्रतिषिद्ध है।
"ब्राह्मणस्य हि आपदि जीवेत् क्षत्रिय-धर्मेण इत्यभिधास्यति. वैश्यस्यापि क्षत्रिय-धर्मं शूद्रस्य च क्षत्रिय-वैश्य-कर्मणी जीवनार्थमापदि जगाद नारदः"—
कुल्लूक भट्ट—म० स्मृ० ७।२ ॥
इस विषय में या० स्मृ० ३।३५ की मिताक्षरा भी द्रष्टव्य है।

३. एतत्सर्वं क्षत्रियस्य राज्यं कुर्वतः प्रविहितम्। यदा पुनः अक्षत्रियः क्षत्रियः कार्यं कुर्यात् तदा अनेनाऽपि एतत्सर्वम् अनुष्ठेयम्, "तत्तार्यापत्तया तद्धर्म-लाभः" इति न्यायात्। अपरार्क—या० स्मृ० १।३६६ ॥

४. ब्रह्म-क्षत्रमिदं सृष्टमेक-योनि स्वयम्भुवा।
पृथग्बल-विधानं तद् न लोकं परिपालयेत् ॥