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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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१३२ | शुक्रनीतिः

ढंग से मेरे दिन या रात्रि व्यतीत हो रहे हैं—इस तरह से जो नित्य अपने भले-या बुरे कर्मों का स्मरण (ख्याल) रखता है वह बुरा का त्याग एवं अच्छे का ग्रहण करने से कभी दुःखी नहीं होता है ।

समास-व्यूहहेत्वादि-कृतेच्छार्थं विहाय च ।
स्तुत्यर्थवादान् संत्यज्य सारं संगृह्य यत्नतः ॥ ३९ ॥
धर्मतत्त्वं हि गहनमतः सत्सेवितं नरः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणानां कर्म कुर्याद्विचक्षणः ॥ ४० ॥

**सार को यत्नपूर्वक ग्रहण करने का निर्देश—**विद्वान् मनुष्य श्रुति-स्मृति तथा पुराणों के वचनों में समास (तत्पुरुष-बहुव्रीहि आदि से पद की एकता) करने से किंवा विशिष्ट तर्क करने से या हेतु आदि दिखलाने से इच्छानुरूप अर्थ तथा प्रशंसापरक अर्थवाद को छोड़कर और यत्नपूर्वक उनके सारभाग को ग्रहण कर सज्जनों से सेवित गहन धर्म-तत्त्व समझ कर तदनुकूल कर्म को करे ।

न गोपयेद्वासयेच्च राजा मित्रं सुतं गुरुम् ।
अधर्मनिरतं स्तेनमाततायिनमप्युत ॥ ४१ ॥

**अधर्म में रत-मित्र-पुत्रादि को राज्य से निकाल देने का निर्देश—**राजा अधर्म में निरत मित्र, पुत्र या गुरु की, एवं चोर या आततायी की रक्षा न करे और न उन्हें अपने राज्य में रहने दे ।

अग्निदो गरदश्चैव शस्त्रोन्मत्तो धनापहः ।
क्षेत्रदारहरश्चैतान् षड् विद्यादाततायिनः ॥ ४२ ॥

**आतताइयों के लक्षण—**अग्नि लगानेवाला, विष देनेवाला, शस्त्र से उन्मत्त होकर मारने के लिये उद्यत, धन लूटनेवाला, खेत तथा स्त्री को छीनने-वाला इन ६ व्यक्तियों को 'आततायी' समझना चाहिये ।

नोपेक्षेत स्त्रियं बालं रोगं दासं पशुं धनम् ।
विद्याभ्यासं क्षणमपि सत्सेवां बुद्धिमान्नरः ॥ ४३ ॥

**एक क्षण भी स्त्री आदि की उपेक्षा न करने का निर्देश—**स्त्री, बालक, रोग, दास, पशु, धन, विद्याभ्यास, सज्जन (साधु) पुरुषों-की सेवा इन सबों के विषय में क्षणभर भी उपेक्षा नहीं रखनी चाहिये । सदा इनका ध्यान रखना चाहिये ।

विरुद्धो यत्र नृपतिर्धनिकः श्रोत्रियो भिषक् ।
आचारश्च तथा देशो न तत्र दिवसं वसेत् ॥ ४४ ॥

**विरुद्ध राजादिक जहां हों वहां एक दिन भी रहने का निषेध—**जिस