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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

तृतीयोऽध्यायः १३१

आचार्यः सर्वचेष्टासु लोक एव हि धीमतः । अनुकुर्यात् तमेवातो लौकिकार्थे परीक्षकः ॥ ३३ ॥

व्यवहार में लोक की आचार्य्यता का कथन— बुद्धिमान जनका प्रत्येक व्यवहार के लिये लोक (जनसमाज) ही आचार्य (उपदेष्टा) है। अतः विवेचना पूर्ण कार्य करनेवालों के लिये यही उचित है कि वह लौकिक कार्यों में लोक का ही अनुसरण करे।

राजदेशकुलज्ञातिसद्धर्मान् नैव दूषयेत् । शक्तोऽपि लौकिकाचारं मनसापि न लङ्घयेत् ॥ ३४ ॥

राजादिगत धर्म में दोष लगाने का निषेध— राजा, देश, कुल, ज्ञाति और सज्जन इनके जो भी धर्म हों उनको दोष न लगावे अर्थात् उसकी निन्दा न करे। सामर्थ्य रहते हुये भी लौकिक आचारों का मन से भी उल्लङ्घन न करे।

अयुक्तं यत् कृतं चोक्तं न बलाद्धेतुनोद्धरेत् । दुर्गुणस्य च वक्तारः प्रत्यक्षं विरला जनाः ॥ ३५ ॥

आग्रहपूर्वक भाषण का निषेध— किसी से जो अनुचित रूप से किया या कहा गया हो उसे जबरदस्ती या मिथ्या कारण दिखाकर उचित नहीं सिद्ध करना चाहिये। संसार में किसी के सामने उसके दुर्गुणों को कहनेवाले विरले ही लोग होते हैं।

लोकतः शास्त्रतो ज्ञात्वा ह्यतस्त्याज्यांस्त्यजेत् सुधीः । अनयं नयसंकाशं मनसापि न चिन्तयेत् ॥ ३६ ॥

इसलिये लोक तथा शास्त्र से त्याज्य विषयों को जानकर बुद्धिमान व्यक्ति को उन्हें छोड़ देना चाहिये। 'अनीति नीति के समान है' इसकी मनसे भी कल्पना नहीं करनी चाहिये।

अयं सहस्रापराधी किमेकेन भवेन्मम । मत्वा नाघं स्मरेदीषद्विन्दुना पूर्यते घटः ॥ ३७ ॥

किंचित् भी पाप का स्मरण करने का निषेध— 'यह दूसरा व्यक्ति तो हजारों अपराधों से भरा हुआ है फिर यदि मेरे में एक दोष है तो उससे क्या बिगड़ सकता है' ऐसा समझ कर थोड़े से भी पाप का चिन्तन नहीं करना चाहिये क्योंकि जैसे बिन्दु-बिन्दु से घड़ा भर जाता है वैसे थोड़ा २ पापचिन्तन से वह व्यक्ति भी पाप से भर जाता है।

नक्तं दिनानि मे यान्ति कथम्भूतस्य सम्प्रति । दुःखभाग् न भवेदेवं नित्यं सन्निहितस्मृतिः ॥ ३८ ॥

अच्छे का ग्रहण एवं बुरे के त्याग का निर्देश— इस समय प्रतिदिन किस