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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

तृतीयोऽध्यायः १३१

आचार्यः सर्वचेष्टासु लोक एव हि धीमतः । अनुकुर्यात् तमेवातो लौकिकार्थे परीक्षकः ॥ ३३ ॥

व्यवहार में लोक की आचार्य्यता का कथन— बुद्धिमान जनका प्रत्येक व्यवहार के लिये लोक (जनसमाज) ही आचार्य (उपदेष्टा) है। अतः विवेचना पूर्ण कार्य करनेवालों के लिये यही उचित है कि वह लौकिक कार्यों में लोक का ही अनुसरण करे।

राजदेशकुलज्ञातिसद्धर्मान् नैव दूषयेत् । शक्तोऽपि लौकिकाचारं मनसापि न लङ्घयेत् ॥ ३४ ॥

राजादिगत धर्म में दोष लगाने का निषेध— राजा, देश, कुल, ज्ञाति और सज्जन इनके जो भी धर्म हों उनको दोष न लगावे अर्थात् उसकी निन्दा न करे। सामर्थ्य रहते हुये भी लौकिक आचारों का मन से भी उल्लङ्घन न करे।

अयुक्तं यत् कृतं चोक्तं न बलाद्धेतुनोद्धरेत् । दुर्गुणस्य च वक्तारः प्रत्यक्षं विरला जनाः ॥ ३५ ॥

आग्रहपूर्वक भाषण का निषेध— किसी से जो अनुचित रूप से किया या कहा गया हो उसे जबरदस्ती या मिथ्या कारण दिखाकर उचित नहीं सिद्ध करना चाहिये। संसार में किसी के सामने उसके दुर्गुणों को कहनेवाले विरले ही लोग होते हैं।

लोकतः शास्त्रतो ज्ञात्वा ह्यतस्त्याज्यांस्त्यजेत् सुधीः । अनयं नयसंकाशं मनसापि न चिन्तयेत् ॥ ३६ ॥

इसलिये लोक तथा शास्त्र से त्याज्य विषयों को जानकर बुद्धिमान व्यक्ति को उन्हें छोड़ देना चाहिये। 'अनीति नीति के समान है' इसकी मनसे भी कल्पना नहीं करनी चाहिये।

अयं सहस्रापराधी किमेकेन भवेन्मम । मत्वा नाघं स्मरेदीषद्विन्दुना पूर्यते घटः ॥ ३७ ॥

किंचित् भी पाप का स्मरण करने का निषेध— 'यह दूसरा व्यक्ति तो हजारों अपराधों से भरा हुआ है फिर यदि मेरे में एक दोष है तो उससे क्या बिगड़ सकता है' ऐसा समझ कर थोड़े से भी पाप का चिन्तन नहीं करना चाहिये क्योंकि जैसे बिन्दु-बिन्दु से घड़ा भर जाता है वैसे थोड़ा २ पापचिन्तन से वह व्यक्ति भी पाप से भर जाता है।

नक्तं दिनानि मे यान्ति कथम्भूतस्य सम्प्रति । दुःखभाग् न भवेदेवं नित्यं सन्निहितस्मृतिः ॥ ३८ ॥

अच्छे का ग्रहण एवं बुरे के त्याग का निर्देश— इस समय प्रतिदिन किस

१३२ | शुक्रनीतिः

ढंग से मेरे दिन या रात्रि व्यतीत हो रहे हैं—इस तरह से जो नित्य अपने भले-या बुरे कर्मों का स्मरण (ख्याल) रखता है वह बुरा का त्याग एवं अच्छे का ग्रहण करने से कभी दुःखी नहीं होता है ।

समास-व्यूहहेत्वादि-कृतेच्छार्थं विहाय च ।
स्तुत्यर्थवादान् संत्यज्य सारं संगृह्य यत्नतः ॥ ३९ ॥
धर्मतत्त्वं हि गहनमतः सत्सेवितं नरः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणानां कर्म कुर्याद्विचक्षणः ॥ ४० ॥

**सार को यत्नपूर्वक ग्रहण करने का निर्देश—**विद्वान् मनुष्य श्रुति-स्मृति तथा पुराणों के वचनों में समास (तत्पुरुष-बहुव्रीहि आदि से पद की एकता) करने से किंवा विशिष्ट तर्क करने से या हेतु आदि दिखलाने से इच्छानुरूप अर्थ तथा प्रशंसापरक अर्थवाद को छोड़कर और यत्नपूर्वक उनके सारभाग को ग्रहण कर सज्जनों से सेवित गहन धर्म-तत्त्व समझ कर तदनुकूल कर्म को करे ।

न गोपयेद्वासयेच्च राजा मित्रं सुतं गुरुम् ।
अधर्मनिरतं स्तेनमाततायिनमप्युत ॥ ४१ ॥

**अधर्म में रत-मित्र-पुत्रादि को राज्य से निकाल देने का निर्देश—**राजा अधर्म में निरत मित्र, पुत्र या गुरु की, एवं चोर या आततायी की रक्षा न करे और न उन्हें अपने राज्य में रहने दे ।

अग्निदो गरदश्चैव शस्त्रोन्मत्तो धनापहः ।
क्षेत्रदारहरश्चैतान् षड् विद्यादाततायिनः ॥ ४२ ॥

**आतताइयों के लक्षण—**अग्नि लगानेवाला, विष देनेवाला, शस्त्र से उन्मत्त होकर मारने के लिये उद्यत, धन लूटनेवाला, खेत तथा स्त्री को छीनने-वाला इन ६ व्यक्तियों को 'आततायी' समझना चाहिये ।

नोपेक्षेत स्त्रियं बालं रोगं दासं पशुं धनम् ।
विद्याभ्यासं क्षणमपि सत्सेवां बुद्धिमान्नरः ॥ ४३ ॥

**एक क्षण भी स्त्री आदि की उपेक्षा न करने का निर्देश—**स्त्री, बालक, रोग, दास, पशु, धन, विद्याभ्यास, सज्जन (साधु) पुरुषों-की सेवा इन सबों के विषय में क्षणभर भी उपेक्षा नहीं रखनी चाहिये । सदा इनका ध्यान रखना चाहिये ।

विरुद्धो यत्र नृपतिर्धनिकः श्रोत्रियो भिषक् ।
आचारश्च तथा देशो न तत्र दिवसं वसेत् ॥ ४४ ॥

**विरुद्ध राजादिक जहां हों वहां एक दिन भी रहने का निषेध—**जिस

तृतीयोऽध्यायः १३३

देश में राजा, धनी, वेद का ज्ञाता ब्राह्मण, वैद्य, आचार और देश अपने से विरुद्ध प्रतीत हों वहां पर एक दिन भी नहीं ठहरना चाहिये ।

नपुंसकश्च स्त्री बालश्चण्डो मूर्खश्च साहसी ।
यत्राधिकारिणश्चैते न तत्र दिवसं वसेत् ॥ ४५ ॥

जिस राज्य में नपुंसक ( मेहरा ), स्त्री, बालक, अत्यन्त क्रोधी, मूर्ख या साहसी ( सहसा बिना विचारे कार्य करनेवाला ) इनमें से कोई भी अधिकारी वर्ग का हो, वहां पर एक दिन भी नहीं ठहरना चाहिये ।

अविवेकी यत्र राजा सभ्या यत्र तु पाक्षिकाः ।
सन्मार्गोझितविद्वांसः साक्षिणोऽनृतवादिनः ॥ ४६ ॥
दुरात्मनां च प्राबल्यं स्त्रीणां नीचजनस्य च ।
यत्र नेच्छेद्धनं मानं वसतिं तत्र जीवितम् ॥ ४७ ॥

**अविवेकी राजादिक से धनादि की इच्छा करने का निषेध—**जहां पर राजा विवेक करनेवाला न हो और राजसभा के सभासद्-गण पक्षपात रखनेवाले हों, सदाचार से हीन पण्डित लोग हों, साक्षीगण ( गवाही देनेवाले लोग ) झूठ बोलनेवाले हों और जहां दुष्टों, स्त्रियों एवं नीचजनों की प्रबलता हो वहां पर रहने से 'धन, इज्जत, रहने के लिये स्थान और जीवन इनकी रक्षा होगी' इसकी इच्छा भी न करे अर्थात् कल्याण नहीं है अतः वहां रहना अनुचित है ।

माता न पालयेद्बाल्ये पिता साधु न शिक्षयेत् ।
राजा यदि हरेद्वित्तं का तत्र परिदेवना ॥ ४८ ॥

**मात्रादिक के पालनादि न करने पर शोक न करने का निर्देश—**यदि बाल्यकाल में माता पालन एवं पिता अच्छी प्रकार से शिक्षा न दिलावे और राजा होकर यदि प्रजा का धन हरण करे तो इसमें खेद करना वृथा है । अर्थात् ऐसी स्थिति में बालक या प्रजा का अपना कोई दोष नहीं है अतः खेद व्यर्थ ही होता है ।

सुसेविताः प्रकुप्यन्ति मित्रस्वजनपार्थिवाः ।
गृहमग्न्यशनिहतं का तत्र परिदेवना ॥ ४९ ॥

मित्र, स्वजन तथा राजा इनकी भलीभांति सेवा करने पर भी यदि ये कुपित हों और गृह अग्नि से या बिजुली गिरने से नष्ट हो जाय तो अपना कोई वश न होने से खेद करना वृथा है ।

आप्तवाक्यमनादृत्य दर्पेणाचरितं यदि ।
फलितं विपरीतं तत् का तत्र परिदेवना ॥ ५० ॥

१३४शुक्रनीतिः

और यदि किसी ने विश्वस्त या हितैषी योग्य व्यक्ति के बात को अहंकार-वश टालकर कोई कार्य करता है और उसका विपरीत ( बुरा ) फल पाता है तो उस पर उसका खेद करना वृथा है ।

सावधानमना नित्यं राजानं देवतां गुरुम् ।
अग्निं तपस्विनं धर्मज्ञानवृद्धं सुसेवयेत् ॥ ५१ ॥

**सावधानी से राजादि की सेवा करने का निर्देश—**सावधान-चित्त होकर राजा, देवता, गुरु, अग्नि, तपस्वी एवं धर्म वा ज्ञान में वृद्ध ( बड़े ) लोगों की नित्य अच्छी तरह से सेवा करनी चाहिये ।

मातृपितृगुरुस्वामि-भ्रातृपुत्रसखिष्वपि ।
न विरुध्येन्नापकुर्यान्मनसाऽपि क्षणं कचित् ॥ ५२ ॥

**माता आदि के साथ विरोधादि करने का निषेध—**माता, पिता, गुरु, स्वामी, भाई, पुत्र तथा मित्र इन सबों का क्षण भर के लिये मन से भी कभी विरोध या अपकार नहीं करना चाहिये ।

स्वजनैर्न विरुद्धयेत न स्पर्धेत बलीयसा ।
न कुर्यात् स्त्रीबालवृद्धमूर्खेषु च विवादनम् ॥ ५३ ॥

**स्वजनादि से विरोधादि एवं स्त्री आदि से विवाद का निषेध—**स्वजनों के साथ विरोध, बलवान के साथ स्पर्धा ( बराबरी का दावा ) एवं स्त्री, बालक, वृद्ध या मूर्ख के साथ विवाद कभी नहीं करना चाहिये ।

एकः स्वादु न भुञ्जीत एकोऽर्थान्न विचिन्तयेत् ।
एको न गच्छेदध्वानं नैकः सुप्तेषु जागृयात् ॥ ५४ ॥

**अकेला स्वादिष्ट भोजनादि का निषेध—**अकेले स्वादिष्ट भोजन नहीं करना चाहिये, अकेले किसी कार्य के विषय में विचार नहीं करना चाहिये, अकेले मार्ग नहीं चलना चाहिये, और सोये हुये लोगों के बीच में अकेले नहीं जागना चाहिये ।

नान्यधर्मं हि सेवेत न द्रुह्याद्वै कदाचन ।
हीनकर्मगुणैः स्त्रीभिर्नासीतैकासने क्वचित् ॥ ५५ ॥

**अन्य धर्म के सेवन का निषेध—**और कभी भी दूसरे धर्म को स्वीकार या उसका द्रोह नहीं करना चाहिये । और कभी हीन कर्म या गुण वाले दुर्जनों एवं स्त्रियों के साथ एक आसन पर नहीं बैठना चाहिये ।

षड्दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥ ५६ ॥
प्रभवन्ति विघाताय कार्यस्यैते न संशयः ।

**त्याज्य निद्रादि दोषों का निर्देश—**इस संसार में १. निद्रा ( दिन में वा

तृतीयोऽध्यायः [१५५]

अधिक सोना ), २. तन्द्रा ( अर्द्धनिद्रित अवस्था ), ३. भय, ४. क्रोध, ५. आलस्य, ६. दीर्घ सूत्रता ( थोड़े समय में पूर्ण होने योग्य कार्य को देरी लगाकर करना ) इन ६ दोषों को ऐश्वर्य चाहनेवाले व्यक्ति त्याग कर दें। क्योंकि ये सब दोष कार्य नष्ट करने के लिये समर्थ होते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

उपायज्ञश्च योगज्ञस्तत्त्वज्ञः प्रतिभानवान् ॥ ५७ ॥
स्वधर्मनिरतो नित्यं परस्त्रीषु पराङ्मुखः ।
वक्तोहवांश्चित्रकथः स्यादकुण्ठितवाक् सदा ॥ ५८ ॥

मनुष्य को कौन सा कार्य करना और कौन सा छोड़ना चाहिये इसका निर्देश— प्रत्येक कार्य करने का उपाय और कौशल का जाननेवाला, तत्त्व विषय का ज्ञाता, प्रतिभाशाली, नित्य अपने धर्म में रत एवं परस्त्री से दूर रहनेवाला, वक्ता (बोलने में चतुर), तर्क करनेवाला, नाना प्रकार की मधुर बातें करनेवाला एवं बोलने में कुण्ठित नहीं होनेवाला सदा होना चाहिये।

चिरं संशृणुयान्नित्यं जानीयात्क्षिप्रमेव च ।
विज्ञाय प्रभजेदर्थान्न कामं प्रभजेत् क्वचित् ॥ ५९ ॥

नित्य देर तक बातें सुननी चाहिये अर्थात् पूरी बातें सुननी चाहिये एवं शीघ्र कहनेवालों की बातें समझनी चाहिये। समझकर किसी कार्य को करना चाहिये और कभी मनमानी नहीं करनी चाहिये।

क्रयविक्रयातिलिप्सां स्वदैन्यं दर्शयेन्नहि ।
कार्यं विनाऽन्यगेहे न नाज्ञातः प्रविशेदपि ॥ ६० ॥

किसी वस्तु के खरीदने या बेचने में अत्यन्त आग्रह एवं हर किसी के सामने अपनी दीनता नहीं प्रकट करनी चाहिये क्योंकि इनसे क्रम से लाभ में हानि तथा लघुता होती है। बिना प्रयोजन एवं बिना जान पहचान के स्वयं किसी दूसरे के गृह के अन्दर नहीं घुसना चाहिये।

अपृष्टो नैव कथयेद् गृहकृत्यं तुं कं प्रति ।
बह्वर्थाल्पाक्षरं कुर्यात् संल्लापं कार्यसाधकम् ॥ ६१ ॥

बिना पूछे किसी से कुछ कहने का निषेध— बिना पूछे किसी से अपने घर के कार्य या बातों को नहीं बताना चाहिये। बहुत अर्थों से भरा हुआ एवं थोड़े अक्षरों (शब्दों) से युक्त, कार्य को सिद्ध करनेवाला (मतलब की) सुन्दर वार्तालाप करना चाहिये।

न दर्शयेत् स्वाभिमतमनुभूताद्विना सदा ।
ज्ञात्वा परमतं सम्यक् तेनाज्ञातोत्तरं वदेत् ॥ ६२ ॥

बिना अनुभव के स्वाभिप्राय प्रकट करने का निषेध— बिना अनुभव किये

१३६ शुक्रनीतिः

हुये किसी विषय में अपना विचार सदा प्रकट नहीं करना चाहिये। और दूसरे के अभिप्राय को भलीभांति समझकर उससे अज्ञात उत्तर देना चाहिये।

दम्पत्योः कलहे साक्ष्यं न कुर्यात् पितृपुत्रयोः । सुगुप्तः कृत्यमन्त्रः स्यान्न त्यजेच्छरणागतम् ॥ ६३ ॥

**दम्पती आदि के बीच में किसी की साक्षी न देने का निर्देश—**स्त्री-पुरुष या पिता-पुत्र की आपसी झगड़े में किसी के तरफ से साक्षी (गवाही) नहीं देनी चाहिये। अपने कार्य तथा विचार को गुप्त रखना चाहिये अर्थात् बिना कार्य पूर्ण हुये प्रकाशित नहीं करना चाहिये। शरण में आये हुये विपत्ति-ग्रस्त का त्याग नहीं करना चाहिये।

यथाशक्ति चिकीर्षेत्तु कुर्यान्मुह्येच्च नापदि । कस्यचिन्न स्पृशेन्मर्म मिथ्यावादं न कस्यचित् ॥ ६४ ॥

**आपत्ति में विचलित होने एवं मर्मवेधी बातें करने का निषेध—**यथा-शक्ति प्रत्येक कार्य करने की इच्छा करनी चाहिये। और कार्य करते हुये आपत्ति पड़ने पर विचलित नहीं होना चाहिये। किसी से मर्मवेधी (हृदय में चुभनेवाली) बातें नहीं करनी चाहिये एवं किसी के संबन्ध में या किसी से झूठी बातें नहीं करनी चाहिये।

नाश्लीलं कीर्तयेत् कञ्चित् प्रलापं न च कारयेत् ।

**अश्लील बातें आदि करने का निषेध—**अश्लील (घृणा-लज्जाविधोधक) बातें नहीं करनी चाहिये एवं कोई अनर्थक वचन नहीं बोलना चाहिये।

अस्वर्ग्यं स्याद्धर्म्यमपि लोकविद्वेषितं तु यत् ॥ ६५ ॥ स्वहेतुभिर्न हन्येत कस्य वाक्यं कदाचन । प्रविचार्य्योत्तरं देयं सहसा न वदेत् क्वचित् ॥ ६६ ॥

**लोकनिन्दित आदि कार्य करने का निषेध—**जो कार्य लोक में निन्दित होता है वह यदि धर्मयुक्त भी हो तो नरक में ले जानेवाला होता है अतः उसे नहीं करना चाहिये। अपने कारण से किसी की बात को न काटे। खूब विचार करके उत्तर देना चाहिये और सहसा कभी नहीं बोलना चाहिये।

शत्रोरपि गुणा ग्राह्या गुरोस्त्याज्यास्तु दुर्गुणाः ।

**शत्रु के भी गुणों को ग्रहण करने का निर्देश—**शत्रुओं के भी गुणों को ग्रहण करना चाहिये या उनका अभिनन्दन करना चाहिये। और गुरुजनों के भी दुर्गुणों को छोड़ देना चाहिये।

उत्कर्षो नैव नित्यः स्यान्नापकर्षस्तथैव च ॥ ६७ ॥ प्राक्कर्मवशतो नित्यं सधनो निर्धनो भवेत् । तस्मात् सर्वेषु भूतेषु मैत्रीं नैव च हापयेत् ॥ ६८ ॥

तृतीयोऽध्यायः १३७

तृतीयोऽध्यायः १३७

**प्रारब्धवश धनी-निर्धन होने का निर्देश—**उत्कर्ष (सुख की अवस्था) या अपकर्ष (दुःखावस्थ।) नित्य नहीं बना रहता है। प्राक्तन कर्मवश मनुष्य धनवान या निर्धन सदा होता है। अतः एक सी अवस्था सदा न रहने से सभी प्राणियों में मैत्रीभाव (सुख-से सुखी-दुःख से दुःखी होना) रखना न छोड़े ऐसा करने से सभी लोग सन्तुष्ट रहकर दुःख नहीं पहुँचायेंगे।

दीर्घदर्शी सदा च स्यात् प्रत्युत्पन्नमतिः क्वचित् ।
साहसी सालसो चैव चिरकारी भवेन्न हि ॥ ६९ ॥

**दीर्घदर्शी के लक्षण—**सदा दूर तक सोचनेवाला तथा क्वचित् समयानुसार तत्काल कर्त्तव्य स्थिर करनेवाला होना चाहिये, और सहसा कार्य करनेवाला, आलसी तथा देरी से धीरे-धीरे कार्य समाप्त करनेवाला नहीं होना चाहिये।

यः सुदुर्निष्फलं कर्म ज्ञात्वा कर्तुं व्यवस्यति ।
द्रागादौ दीर्घदर्शी स्यात् स चिरं सुखमश्नुते ॥ ७० ॥

जो व्यक्ति किसी कार्य के अच्छे-बुरे फल या निष्फलता को विचार कर तदनुसार कार्य करने की चेष्टा करता है और जो कार्य करने के प्रथम शीघ्र ही दूर तक उसके परिणाम (फल) को जाननेवाला होता है वह चिरकाल तक सुख भोगता है। अतः दीर्घदर्शी होना उचित है।

प्रत्युत्पन्नमतिः प्राप्तां क्रियां कर्तुं व्यवस्यति ।
सिद्धिः सांशायिकी तत्र चापल्यात् कार्यगौरवात् ॥ ७१ ॥

**प्रत्युत्पन्नमति के लक्षण—**जो प्रत्युत्पन्नमति (समयानुसार सूझवाला) व्यक्ति तत्काल में उपस्थित कार्य करने की चेष्टा करता है उसके कार्य में जल्द-बाजी तथा कार्य की गुरुता से सिद्धि के विषय में सन्देह बना रहता है अर्थात् वह कार्य हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है।

यतते नैव कालेऽपि क्रियां कर्तुं च सालसः ।
न सिद्धिस्तस्य कुत्रापि स नश्यति च सान्वयः ॥ ७२ ॥

**आलसी मनुष्य के लक्षण—**जो आलसी होता है वह समय उपस्थित होने पर भी करने योग्य कार्य के करने में प्रयत्नशील नहीं होता है, उसके कार्य की सिद्धि कभी भी नहीं होती है और वह वंश-सहित या साथी-सहित नष्ट हो जाता है।

क्रियाफलमविज्ञाय यतते साहसी च सः ।
दुःखभागी भवत्येव क्रियया तत्फलेन वा ॥ ७३ ॥

**साहसी के लक्षण व दोष—**जो साहसी व्यक्ति क्रिया के फल का बिना विचार किये हुये सहसा (एकाएक) कार्य करने का प्रयत्न करता है वह क्रिया या उसके फल के कारण से केवल दुःखभागी ही होता है।

१३८ शुक्रनीतिः

महत्कालेनाल्पकर्म चिरकारी करोति च ।
स शोचत्यल्पफलतो दीर्घदर्शी भवेदतः ॥ ७४ ॥

**चिरकारी मनुष्य के लक्षण—**जो चिरकारी (देरी तक कार्य करनेवाला) होता है वह थोड़े से कार्य को बहुत देर में धीरे २ करता हुआ समाप्त करता है वह थोड़ा फल होने से अनुताप करता है अतः दीर्घदर्शी (दूर तक परिणाम पर करनेवाली) होना चाहिये।

सुफलं तु भवेत्कर्म कदाचित् सहसाकृतम् ।
निष्फलं वापि प्रभवेत् कदाचित् सुविचारितम् ॥ ७५ ॥
तथापि नैव कुर्वीत सहसानर्थकारि तत् ।
कदाचिदपि सञ्जातमकार्यादिष्टसाधनम् ॥ ७६ ॥
यदनिष्टं तु सत्कार्यान्नाकार्यप्रेरकं हि तत् ।

**सहसा कार्य करने का निषेध—**सहसा किया हुआ भी कर्म कभी २ सुन्दर फल देनेवाला हो जाता है कभी २ भलीभांति विचार कर भी किया हुआ कर्म निष्फल हो जाता है। तथापि (कदाचित् कार्य सफलता होने पर भी) सहसा (बिना विचारे एकाएक) कार्य नहीं करना चाहिये, क्योंकि वह अनर्थ पैदा करनेवाला होता है। और कदाचित् अकार्य (नहीं करने योग्य कार्य) से भी जो इष्टसिद्धि होती है और सत् (अच्छे) कार्य से जो अनिष्ट फल होता है, इससे वह अकार्य को करने के लिये प्रेरणा करनेवाला नहीं हो सकता है।

भृत्यो भ्राताऽपि वा पुत्रः पत्नी कुर्यान्न चैव यत् ॥ ७७ ॥
विधास्यन्ति च मित्राणि तत्कार्यमविशङ्कितम् ।

**मित्र की विशेषता—**भृत्य, भाई, पुत्र और पत्नी भी जिस कार्य को पूर्ण नहीं कर सकते, उसीको उसके मित्र-गण निःसन्देह पूर्ण कर देते हैं।

यो हि मित्रमविज्ञाय याथातथ्येन मन्दधीः ॥ ७८ ॥
मित्रार्थे योजयत्येनं तस्य सोऽर्थोऽवसीदति ।

**बिना समझे किसी को मित्र बनाने का निषेध—**जो मन्दबुद्धि यथार्थ रूप से मित्र के भीतरी (अच्छे-बुरे) भाव को बिना समझे मित्रता के लिये उसे नियुक्त करता है उसका वह मैत्रीरूप अर्थ नष्ट हो जाता है।

न हि मानसिको धर्मः कस्यचिज्ज्ञायतेऽञ्जसा ॥ ७९ ॥
अतो यतेत तत्प्राप्त्यै मित्रलब्धिर्वरा नृणाम् ।

**मित्र की प्राप्ति के लिये यत्न करने का निर्देश—**किसी के मानसिक भाव को वस्तुतः नहीं जाना जा सकता है। इससे उसकी (अच्छे मित्र की) प्राप्ति

तृतीयोऽध्यायः १३६

तृतीयोऽध्यायः १३६

के लिये प्रयत्न करना चाहिये। क्योंकि मनुष्यों के लिये मित्र का पाना उत्तम बात है।

नात्यन्तं विश्वसेत् कञ्चिद् विश्वस्तमपि सर्वदा ॥ ८० ॥ पुत्रं वा भ्रातरं भार्यामामात्यमधिकारिणम् । धनस्त्रीराज्यलोभो हि सर्वेषामधिको यतः ॥ ८१ ॥

विश्वस्त का भी अत्यन्त विश्वास करने का निषेध—सर्वदा विश्वासपात्र किसी भी व्यक्ति का यहां तक पुत्र, भाई, स्त्री, अमात्य या अधिकारी पुरुष का भी अत्यन्त विश्वास नहीं करना चाहिये। क्योंकि सभी लोगों को धन, स्त्री तथा राज्य का लोभ अधिक रूप से होता है।

प्रामाणिकं चानुभूतमाप्तं सर्वत्र विश्वसेत् । प्रामाणिकादि का विश्वास करने का निर्देश—अतः विश्वस्त रूप से प्रामाणिक, सुपरिचित एवं हितैषी लोगों का सर्वत्र विश्वास करना चाहिये।

विश्वसित्वात्मवद्गूढस्तत्कार्यं विमृशेत् स्वयम् ॥ ८२ ॥ तद्वाक्यं तर्कतोऽनर्थं विपरीतं न चिन्तयेत् । परीक्षा करके विश्वस्त मानने का निर्देश—अपने समान विश्वास करके भी छिपकर उसे (विश्वासपात्र) के कार्यों की परीक्षा करे। और परीक्षा करने के बाद वस्तुतः विश्वासपात्र निकलने पर उसके वाक्यों में तर्क से अनर्थ होने से विरुद्ध जैसा विचार न करे अर्थात् उसके वचनों को निःसन्देह सर्वतोभावेन मान ले।

चतुःषष्टितमांशं तन्नाशितं क्षमयेदथ ॥ ८३ ॥ स्वधर्मनीतिबलवांस्तेन मैत्रीं प्रधारयेत् । और यदि उक्त विश्वासपात्र व्यक्ति के द्वारा कार्य का ६४ वां भाग (यत्किञ्चित् भाग) नष्ट हो जाय तो भी उसे क्षमा कर दे (उसका विचार न करे) और वह अपने धर्म तथा नीति में बलवान् है अतः उसके साथ मैत्री रखे।

दानैर्मानैश्च सत्कारैः सुपूज्यान् पूजयेत् सदा ॥ ८४ ॥ दान, मान और सेवा से अत्यन्त पूज्यों की सदा पूजा करे।

कदापि नोग्रदण्डः स्यात् कटुभाषणतत्परः । भार्या पुत्रोऽप्युद्विजते कटुवाक्यादुग्रदण्डतः ॥ ८५ ॥ उग्र दण्ड और कटु वचन का निषेध—कभी भी उग्र दण्ड देनेवाला एवं कटु-भाषण करने में तत्पर नहीं होना चाहिये, क्योंकि स्त्री तथा पुत्र भी कटु-भाषण करने एवं उग्र दण्ड करने से उद्विग्न हो उठते हैं।

पशवोऽपि वशं यान्ति दानैश्च मृदुभाषणैः ।

: शुक्रनीतिः

१४०

और पशु भी चारा देने एवं पुचकार कर बुलाने से वश में हो जाते हैं। फिर मनुष्यों के विषय में क्या कहना है ?।

न विद्यया न शौर्येण धनेनाभिजनेन च ॥ ८६ ॥
न बलेन प्रमत्तः स्यान्नातिमानी कदाचन ।

विद्यादिकों से प्रमत्त होने का निषेध— विद्या, शूरता, धन, कुल और बल के मद से मतवाला एवं अत्यन्त मानी कभी नहीं होना चाहिये ।

नाप्तोपदेशं संवेत्ति विद्यामत्तः स्वहेतुभिः ॥ ८७ ॥
अनर्थमप्यभिप्रेतं मन्यते परमार्थवत् ।
महाजनैर्धृतः पन्था येन संत्यज्यते बलात् ॥ ८८ ॥

विद्यामत्तता के अनर्थकारी फल— विद्या के मद से उन्मत्त पुरुष अपने तर्कों से आप्त (परमहितैषी) जनों के उपदेश-वचनों को कुछ भी नहीं समझता है और अनर्थकारी भी अपने अभीष्ट विचार को परमार्थ-युक्त (उचित कर्तव्य) समझता है। और जिससे वह अच्छे पुरुषों से स्वीकृत मार्ग का भी हठात् परित्याग कर देता है।

शौर्यमत्तस्तु सहसा युद्धं कृत्वा जहात्यसून् ।
व्यूहादियुद्धकौशल्यं तिरस्कृत्य च शात्रवान् ॥ ८९ ॥

शौर्यमत्तता के अनर्थकारी फल— और जो व्यक्ति शूरता से मत्त होता है वह सहसा (बिना विचारे) शस्त्रों को धारण किये हुये व्यूह-रचना आदि युद्धसंबन्धी कौशल का भी तिरस्कार करके युद्ध करता हुआ अपने प्राणों का परित्याग कर देता है।

श्रीमत्तः पुरुषो वेत्ति न दुष्कीर्तिमजो यथा ।
स्वमूत्रगन्धं मूत्रेण मुखमासिञ्चते स्वकम् ॥ ९० ॥

धनमत्त पुरुष की स्थिति का वर्णन— जैसे बकरा अपने मूत्र के गन्ध को नहीं जानता है बल्कि उसी मूत्र से अपने मुख को सींचता रहता है उसी भांति धन के मद से मत्त पुरुष अपने मुख को दुष्कीर्ति से नीचे करवाता है तो भी दुष्कीर्ति का नहीं ख्याल करता है।

तथाभिजनमत्तस्तु सर्वान्नैवावमन्यते ।
श्रेष्ठानपीतरान्सम्यगकार्ये कुरुते मतिम् ॥ ९१ ॥

कुलीनता के मद से मत्त की स्थिति का वर्णन— तथा कुलीनता के मद से मत्त पुरुष श्रेष्ठ तथा नीच सभी लोगों का तिरस्कार करता रहता है। और नहीं करने योग्य बुरे कार्यों में अपनी बुद्धि अच्छी तरह से करता है अर्थात् बुरे कार्य करने का विचार रखता है और सदा करता भी है।

बलमत्तस्तु सहसा युद्धे विदधते मनः ।

तृतीयोऽध्यायः १४९

तृतीयोऽध्यायः १४९

बलेन बाधते सर्वानश्वादीनपि हान्यथा ॥ ६२ ॥ बलमत्त की स्थिति का वर्णन— बल के मद से मत्त पुरुष एकाएक बिना समझे-बूझे युद्ध करने में मन लगाता है, और मनके विरुद्ध चलने पर अपने बल से सबों को कष्ट पहुँचाता है यहां तक अश्वादियों को भी पीडित करता है।

मानमत्तो मन्यतेस्म तृणवच्चाखिलं जगत् ।
अनर्होपि च सर्वेभ्यस्त्वत्यर्थासनमिच्छति ॥ ६३ ॥
मानमत्त की स्थिति का वर्णन— अभिमान से मतवाला पुरुष सम्पूर्ण जगत् के लोगों को तृण के समान तुच्छ समझता है और स्वयं अयोग्य होकर भी सबों से अधिक श्रेष्ठ आसन पाने की इच्छा करता है।

मदा एतेऽवलिप्तानां सतामेते दमाः स्मृताः ।
विद्यादि से सज्जनों को विनयी बनने का निर्देश— गर्वयुक्त लोगों के लिये ही पूर्वोक्त विद्या, शौर्य आदि ये सब मद (उन्मत्त बनानेवाले) होते हैं किन्तु सज्जनों के लिये ये ही दम (विनय लानेवाले) होते हैं।

विद्यायाश्च फलं ज्ञानं विनयश्च फलं श्रियः ॥ ६४ ॥
यज्ञदाने बलफलं सद्रक्षणमुदाहृतम् ।
विद्यादिकों के फल— जैसे विद्या का फल ज्ञान और विनय है। लक्ष्मी (धन) का फल यज्ञ तथा दान करना है। बल का फल सज्जनों की रक्षा करना कहा है।

नामिताः शत्रवः शौर्यफलं च करदीकृताः ॥ ६५ ॥
शमो दमश्चार्जवं चाभिजनस्य फलं त्विदम् ।
मानस्य तु फलं चैतत्सर्वे स्वसदृशा इति ॥ ६६ ॥
शूरतादि के फलों का निर्देश— शूरता का फल शत्रुओं को सिर झुकाना तथा उनको कर देनेवाली प्रजा बनाना है। और अभिजन (कुलीनता) का फल यह है कि मनको शान्त रखना, इन्द्रियों का दमन करना एवं सरलता रखना। मान का फल तो यह है कि—सब को अपने सदृश संमान-योग्य समझना।

सुविद्यामन्त्रभैषज्यस्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ।
गृह्णीयात् सुप्रयत्नेन मानमुत्सृज्य साधकः ॥ ६७ ॥
सुन्दर विद्यादि को नीच से भी ग्रहण करने का निर्देश— अपने कार्य को सिद्ध करनेवाला पुरुष अपने गौरव को त्यागकर अत्यन्त प्रयत्न के साथ सुन्दर विद्या, मन्त्र, औषध तथा स्त्रीरत्न (उत्तम गुणयुक्त सुन्दर स्त्री) यदि नीच-कुलवाले के पास हो तो भी उसे ग्रहण करे।

उपेक्षेत प्रनष्टं यत्प्राप्तं यत्तदुपाहरेत् ।

१४२ शुक्रनीतिः

न बालं न स्त्रियं चातिलालयेत्ताडयेन्न च ॥ ९८ ॥
विद्याभ्यासे गृहकृत्ये तावुभौ योजयेत्क्रमात् ।
नष्टवस्तु की उपेक्षा करने का निर्देश— जो वस्तु नष्ट हो गई हो उसकी उपेक्षा कर दे और जो उपस्थित हुई हो उसे ग्रहण करे। तथा बालक या स्त्री का अत्यन्त लाड-प्यार करना या अधिक ताडन करना उचित नहीं है। बल्कि उन (बालक तथा स्त्री) को क्रम से विद्याभ्यास तथा गृह-संबन्धी कार्यों में नियुक्त करना उचित है।

परद्रव्यं क्षुद्रमपि नादत्तं स हरेदणु ॥ ९९ ॥
नोच्चारयेदघं कस्य स्त्रियं नैव च दूषयेत् ।
परद्रव्यहरणादि का निषेध— बिना दिये तुच्छ भी दूसरे के द्रव्य (वस्तु) को न ग्रहण करे और दूसरे के छोटे भी पाप को किसी से या पापकर्त्ताओं से न कहे। और किसी स्त्री को दूषित न करे या दोष न लगावे।

न ब्रूयादनृतं साक्ष्यं कृतं साक्ष्यं न लोपयेत् ॥ १०० ॥
प्राणात्ययेऽनृतं ब्रूयात् सुमहत्कार्यसाधने ।
प्राणनाशादि की संभावनामें झूठ बोलने का निर्देश— झूठी गवाही न दे और दी हुई गवाही से पलट न जावे। और जब बहुत बड़ा कार्य सिद्ध करना हो या प्राण-सङ्कट उपस्थित हो तभी झूठ बोले अन्यथा झूठ न बोले।

कन्यादात्रे तु ह्यधनं दस्यवे सधनं नरम् ॥ १०१ ॥
गुप्तं जिघांसवे नैव विज्ञातमपि दर्शयेत् ।
जानकर भी कभी कन्या देनेवाले को 'तुम्हारा यह जामाता (दामाद) दरिद्र है' तथा डाकू को 'यह धनी है' एवं मारनेवाले को 'यह यहां मारने के भय से छिपा हुआ है' ऐसा किसी भी व्यक्ति के बारे में न कहे।

जायापत्योश्च पित्रोश्च भ्रात्रोश्च स्वामिभृत्ययोः ॥ १०२ ॥
भगिन्योर्मित्रयोर्भेदं न कुर्याद् गुरुशिष्ययोः ।
स्त्री-पुरुषादि में भेद डालने का निषेध— स्त्री-पुरुष, माता-पिता, भाई-भाई, स्वामी-भृत्य, बहिन-बहिन, मित्र-मित्र, गुरु-शिष्य इन सबों के बीच परस्पर भेद न डलावे।

न मध्याद् गमनं भाषाशालिनोः स्थितयोरपि ॥ १०३ ॥
सुहृदं भ्रातरं बन्धुमुपचर्य्यात् सदात्मवत् ।
वार्त्ता करते हुये पुरुषों के बीच जाने का निषेध— और परस्पर बात-चीत करते हुये दो व्यक्तियों के बीच में से न निकले। और मित्र, भाई, बन्धु (स्वजन), इन सबों के साथ सदा अपने समान व्यवहार करना चाहिये।

गृहागतं क्षुद्रमपि यथार्हं पूजयेत् सदा ॥ १०४ ॥

तृतीयोऽध्यायः [१४३]

तदीयकुशलप्रश्नैः शक्त्या दानैर्जलादिभिः ।
अपने गृह में आये हुये किसी भी तुच्छ व्यक्ति का उसके साथ कुशल-प्रश्न पूँछने से तथा यथाशक्ति उसे जलादि देने से यथायोग्य आदर-संमान करना चाहिये ।

सपुत्रस्तु गृहे कन्यां सपुत्रां वासयेन्नहि ॥ १०५ ॥
सभर्तृकां च भगिनीमनाथे ते तु पालयेत् ।
सपुत्र के लिये सपुत्र कन्या आदि को लाकर गृह में बसाने का निषेध—
जिसके पुत्र हो वह अपने गृह में पुत्रयुक्त कन्या एवं पतियुक्त बहन को लाकर सदा के लिये न रखे क्योंकि इससे कलह होने की संभावना रहती है और यदि कन्या तथा बहन अनाथ अवस्था में हों तो अवश्य लाकर उनका पालन करना चाहिये ।

'सर्पोऽग्निर्दुर्जनो राजा जामाता भगिनीसुतः ॥ १०६ ॥
रोगः शत्रुर्नावमान्योऽप्यल्प इत्युपचारितः ।
**सर्पादि को तुच्छ समझकर अपमान करने का निषेध—**सर्प, अग्नि, दुर्जन, राजा, जामाता (दामाद), भानजा, रोग, शत्रु ये सब छोटे अर्थात् बालक या हीन हैं इस ख्याल से कभी उनका तिरस्कार या उपेक्षा नहीं करनी चाहिये ।

क्रौर्यात्तैक्ष्ण्याद् दुःस्वभावात् स्वामित्वात् पुत्रिकामयात् ॥१०७॥
स्वपूर्वजपिण्डदत्वाद् वृद्धिभीत्या उपचारयेत् ।
ऋणशेषं रोगशेषं शत्रुशेषं न रक्षयेत् ॥ १०८ ॥
**सर्पादि से संभल कर व्यवहार करने का तथा ऋणादिका समूल नाश करने का निर्देश—**किन्तु क्रूर होने से सर्प से, तीक्ष्ण होने से अग्नि से, दुष्ट स्वभाव होने से दुर्जन से, स्वामी होने से राजा से, कन्या को क्लेश पहुँचाने के भय से जामाता से, अपने पूर्वजों को पिण्ड देनेवाला होने से भानजा से, बढ़ जाने से रोग से, भय होने से शत्रु से संभल कर ऐसा व्यवहार करना चाहिये जिससे ये हानि न पहुँचा सकें। और ऋण, रोग तथा शत्रु इनका शेष नहीं रखना चाहिये अर्थात् इन्हें समूल नष्ट कर देना चाहिये ।

याचकाद्यैः प्रार्थितः सन्न तीक्ष्णं चोत्तरं वदेत् ।
तत्कार्यं तु समर्थश्चेत् कुर्याद्वा कारयीत च ॥ १०९ ॥
**याचकादि के साथ व्यवहार का प्रकार—**याचक आदि से प्रार्थना किये जाने (मांगने) पर तीक्ष्ण उत्तर नहीं देना चाहिये । और यदि सामर्थ्य हो तो स्वयं उसके कार्य को कर दे या दूसरे से करा दे ।

दातॄणां धार्मिकाणां च शूराणां कीर्तनं सदा ।
शृणुयात्तु प्रयत्नेन तच्छिद्रं नैव लक्षयेत् ॥ ११० ॥

१४४ | शुक्रनीतिः

दाता आदि की कीर्त्ति सुनने का निर्देश—दाता, धार्मिक और शूर पुरुषों का गुण-कीर्त्तन ( प्रशंसा ) सदा प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिये, और इन सबों के दोष की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिये ।

काले हितमिताहारविहारी विघसाशनः ।
अदीनात्मा च सुस्वप्नः शुचिः स्यात्सर्वदा नरः ॥ १११ ॥

समय आदि पर परिमित भोजन आदि करने का निर्देश—मनुष्यों को सदा समय पर हितकर तथा उचित मात्रा के साथ आहार तथा विहार, देवादि को भोग लगाकर प्रसाद-भोजन, अकातर-स्वभाव, अच्छी तरह से सोना तथा शरीर एवं मन से पवित्र रहना । इन सब विषयों को सदा करना चाहिये ।

कुर्याद्विहारमाहारं निर्हारं विजने सदा ।
व्यवसायी सदा च स्यात् सुखं व्यायाममभ्यसेत् ॥ ११२ ॥

स्त्री-संभोगादि का एकान्त में करने का निर्देश—और सदा स्त्री-संभोग, भोजन तथा मल-मूत्रादि का त्याग एकान्त में करना चाहिये । एवं सदा उद्योग करने में निरत रहना और सुखपूर्वक व्यायाम ( कसरत ) करना चाहिये ।

अन्नं न निन्द्यात् सुस्वस्थः स्वीकुर्यात् प्रीतिभोजनम् ।
आहारं प्रवरं विद्यात् षड्रसं मधुरोत्तरम् ॥ ११३ ॥

मधुरादि षड्रस अन्न को प्रीतिपूर्वक भोजन का निर्देश—अन्न की निन्दा नहीं करनी चाहिये एवं स्वस्थ रहने पर किसी के द्वारा आमन्त्रित प्रीतिभोज में भोजन करना स्वीकार करना चाहिये । तिक्त, कटु, अम्ल, लवण, कषाय ( कसैला ), मधुर इन ६ रसों से युक्त एवं प्रधान रूप से मधुरान्न ( मिठाई ) युक्त जो भोजन होता है उसे सर्वोत्तम समझना चाहिये ।

विहारं चैव स्वस्त्रीभिर्भेश्याभिर्न कदाचन ।
नियुद्धं कुशलैः सार्धं व्यायामं नतिभिर्वरम् ॥ ११४ ॥

स्व-स्त्री के साथ विहार करने का निर्देश—और अपनी स्त्री के साथ विहार करना उचित है वेश्याओं के साथ कदापि नहीं उचित है । और निपुण ( मल्ल-विद्या में निपुण ) लोगों के साथ प्रणत होकर कुश्ती लड़ना उत्तम व्यायाम है अतः इसे करना चाहिये ।

हित्वा प्राक्पश्चिमौ यामौ निशि स्वापो वरो मतः ।
दीनान्धपङ्गुबधिरा नोपहास्याः कदाचन ॥ ११५ ॥

रात्रि में सोने के समय का एवं दीनादिक उपहास के निषेध का निर्देश—रात्रि में प्रथम तथा चतुर्थ प्रहरों को छोड़कर मध्य के द्वितीय तथा तृतीय प्रहरों में सोना उत्तम होता है । दीन, अन्धा, पङ्गु तथा बहरा ऐसे लोगों का कभी उपहास ( हंसी ) नहीं करना चाहिये ।

तृतीयोऽध्यायः | १४५

तृतीयोऽध्यायः | १४५

नाकार्ये तु मतिं कुर्याद् द्राक्स्वकार्यं प्रसाधयेत्।
उद्योगेन बलेनैव बुद्ध्या धैर्येण साहसात् ॥ ११६ ॥
पराक्रमेणार्जवेन मानमुत्सृज्य साधकः।
**कार्य-साधक के कृत्यों का वर्णन—**करने के लिये अयोग्य कार्य के विषय में बुद्धि नहीं करनी चाहिये। और अपने कार्य को सिद्ध करनेवाले के लिये उचित है कि वह मान (गौरव) छोड़कर उद्योग, बल, बुद्धि, धैर्य, साहस, पराक्रम और सरलता के द्वारा यथासंभव शीघ्र अपने कार्य को सिद्ध करे।

यदि सिद्ध्यति येनार्थः कलहेन वरस्तु सः ॥ ११७ ॥
अन्यथाऽऽयुर्धनसुहृद्यशःसुखहरः स्मृतः ।
यदि कलह करने से अपना कार्य सिद्ध हो तो वह कलह अच्छा कहलाता है अन्यथा (यदि कार्य सिद्ध न हो तो) वह कलह केवल आयु, धन, मित्र, यश तथा सुख को हरण करनेवाला कहा है।

नानिष्टं प्रवदेत् कस्मिन्न छिद्रं कस्य लक्षयेत् ॥ ११८ ॥
आज्ञाभङ्गस्तु महतां राज्ञः कार्यो न वै क्वचित्।
**दुर्वचन का एवं गुरुजनादि की आज्ञा के उल्लङ्घन का निषेध—**किसी के लिये दुर्वचन न कहे और न किसी के छिद्र (दोष) को देखे। बड़े लोगों एवं राजा की आज्ञा का कभी उल्लङ्घन न करे।

असत्कार्यनियोक्तारं गुरुं वापि प्रबोधयेत् ॥ ११९ ॥
नातिक्रामेदपि लघुं क्वचित् सत्कार्यबोधकम्।
**असत् कार्य करानेवाले गुरु को भी बोध कराने का एवं छोटे के भी समुचित बात मानने का निर्देश—**बुरे कार्य में नियुक्त करनेवाले गुरु को भी समझावे कि आपने यह अनुचित आज्ञा दी है अतः मैं नहीं करूँगा। और सत्कार्य का उपदेश करनेवाले छोटे लोगों के भी वचनों का कभी उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। अर्थात् उसे अवश्य करना चाहिये।

कृत्वा स्वतन्त्रां तरुणीं स्त्रियं गच्छेन्न वै क्वचित् ॥ १२० ॥
स्त्रियो मूलमनर्थस्य तरुण्यः किं परैः सह।
**तरुणी स्त्री को स्वतन्त्र छोड़ कर जाने का निषेध—**और अपनी तरुणी स्त्री को स्वतन्त्र करके (इच्छानुसार रहने की आज्ञा देकर) अन्यत्र कहीं नहीं जाना चाहिये। क्योंकि पर पुरुषों के साथ रहने से साधारण भी स्त्रियां अनर्थ का कारण होती हैं फिर तरुणी स्त्रियों के विषय में क्या कहना है अर्थात् वे सबसे अधिक अनर्थ का कारण हैं।

न प्रमाद्येन्मदद्रव्यैर्न विमुह्येत् कुसन्ततौ ॥ १२१ ॥
मद पैदा करनेवाले द्रव्यों से (भांग आदि अथवा ऐश्वर्य से) अधिक:
१० शु०

१४६ शुक्रनीतिः

मतवाला नहीं होना चाहिये। और नालायक सन्तान पर 'यह मेरा पुत्र है' ऐसी ममता नहीं करनी चाहिये ।

साध्वी भार्या पितृपत्नी माता बालः पिता स्नुषा । अभर्तृकाऽनपत्या या साध्वी कन्या स्वसापि च ॥ १२२ ॥ मातुलानी भ्रातृभार्या पितृमातृस्वसा तथा । मातामहोऽनपत्यश्च गुरुश्वशुरमातुलाः ॥ १२३ ॥ बालोऽपिता च दौहित्रो भ्राता च भगिनीसुतः । एतेऽवश्यं पालनीयाः प्रयत्नेन स्वशक्तितः ॥ १२४ ॥ अविभवेऽपि विभवे पितृमातृकुलं सुहृत् । पत्न्याः कुलं दासदासीभृत्यवर्गांश्च पोषयेत् ॥ १२५ ॥ बिकलाङ्गान् प्रव्रजितान् दीनानाथांश्च पालयेत् ।

**साध्वी भार्यादिका यत्नपूर्वक पालने का निर्देश—**सुशीला स्त्री, विमाता, माता, अविवाहिता कन्या, पिता, पुत्रवधू, बिना पति और पुत्र की कन्या या बहन, मामी, भाई की वधू, पिता की बहन (फूआ), मां की बहन (मौसी), निःसन्तान नाना, गुरु, श्वशुर या मामा, बिना पिता का पुत्र, लड़की का लड़का (नाती), भाई या भानजा इन सबों का धन न रहने पर भी यथाशक्ति यत्नपूर्वक अवश्य पालन करना चाहिये। और यदि धन हो तो पिता तथा माता के कुलवाले एवं मित्र, पत्नी के कुल (ससुराल) वाले, दास, दासी और भृत्य वर्गों का पालन-पोषण करना चाहिये और विकलाङ्ग (काने, लंगड़े आदि), संन्यासी, दीन और अनाथ लोगों का पालन करना चाहिये ।

कुटुम्बभरणार्थेषु यत्नवान्न भवेच्च यः ॥ १२६ ॥ तस्य सर्वगुणैः किन्तु जीवन्नेव मृतश्च सः ।

**जीवन्मृत पुरुषों का निर्देश—**जो कुटुम्ब-पालन के विषय में प्रयत्नशील नहीं होता है वह सर्वगुण-संपन्न होते हुये भी जीवित रहकर मरे हुये के समान है अर्थात् उसका जीवन व्यर्थ है।

न कुटुम्बं भृतं येन नाशिताः शत्रवोपि न ॥ १२७ ॥ प्राप्तं संरक्षितं नैव तस्य किं जीवितेन वै ।

जिसने कुटुम्ब का भरण-पोषण नहीं किया और शत्रुओं को नष्ट नहीं किया एवं प्राप्त वस्तु की भलीभांति रक्षा नहीं की, उसके जीने से क्या अर्थात् उसका जीवन वृथा है।

स्त्रीनिर्जितो ऋणी नित्यं सुदरिद्रश्च याचकः ॥ १२८ ॥ गुणहीनोऽर्थहीनः सन् मृता एते सजीवकाः

तृतीयोऽध्यायः [१४७]

जो स्त्रियों के वशीभूत रहनेवाला, नित्य ऋण लेनेवाला, अत्यन्त दरिद्र, मांगनेवाला, गुण से हीन और धन से रहित है, ऐसे लोग जीवित रहकर मरे हुये के तुल्य हैं।

आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमैथुनभेषजम् ॥ १२९॥ दानमानापमानं च नवैतानि सुगोपयेत् ।

**गुप्त रखने योग्य बातों का निर्देश—**आयु, धन, गृह के दोष, मन्त्र, मैथुन, औषध, दान, मान, अपमान इन ९ विषयों को अत्यन्त गुप्त रखना चाहिये (किसी से नहीं कहना चाहिये)।

देशाटनं राजसभावेशनं शास्त्रचिन्तनम् ॥ १३०॥ वेश्यादिदर्शनं विद्वन्मैत्रीं कुर्यादतन्द्रितः ।

**देशाटनादि की कर्त्तव्यता—**आलस्यरहित होकर देशभ्रमण, राजसभा में प्रवेश, शास्त्रों का चिन्तन, वेश्या आदि का दर्शन, विद्वानों के साथ मैत्री करनी चाहिये।

अनेकाश्च तथा धर्माः पदार्थाः पशवो नराः ॥ १३१॥ देशाटनात् स्वानुभूताः प्रभवन्ति च पर्व्वताः ।

**देशाटन के लाभ—**इनमें से देशाटन करने से मनुष्यों को अनेक प्रकार के धर्म, पदार्थ, पशु, मनुष्य और पर्व्वतों का अनुभव साक्षात् प्राप्त होता है।

कीदृशा राजपुरुषा न्यायान्यायं च कीदृशम् ॥ १३२॥ मिथ्याविवादिनः के च के वै सत्यविवादिनः । कीदृशी व्यवहारस्य प्रवृत्तिः शास्त्रलोकतः ॥ १३३॥ सभागमनशीलस्य तद्विज्ञानं प्रजायते ।

**सभा में बैठने से लाभ का वर्णन—**सभा में प्रवेश करने से मनुष्यों को राजपुरुष किस प्रकार के होते हैं ? न्याय-अन्याय कैसा होता है ? झूठा विवाद और सच्चा विवाद उपस्थित करनेवाले कैसे होते हैं ? शास्त्र और लोक के अनुसार ऋण देने आदि रूप विवाद-विषय का कैसा निर्णय होता है ? इत्यादि विषयों का विशिष्ट ज्ञान होता है।

नाहङ्कारो च धर्मान्धः शास्त्राणां तत्त्वचिन्तनैः ॥ १३४॥ एकं शास्त्रमधीयानो न विन्द्यात् कार्य्यनिर्णयम् । स्याद्बह्वागमसंदर्शी व्यवहारो महानतः ॥ १३५॥ बुद्धिमानभ्यसेन्नित्यं बहुशास्त्राण्यतन्द्रितः ।

**बहुत से शास्त्रों के अध्ययन के फल—**बहुत से शास्त्रों के तत्त्वों का चिन्तन करने से अहङ्कार तथा धर्मान्धता से युक्त नहीं होना चाहिये। और एक शास्त्र का केवल अध्ययन करके किसी कार्य (तत्त्व) का निर्णय नहीं करना

१४८ | शुक्रनीतिः

चाहिये। क्योंकि बहुत शास्त्रों को जिसने अच्छी तरह से देखा है वही महान् लौकिक व्यवहार का ज्ञाता हो सकता है अतः बुद्धिमान् मनुष्य आलस्य-रहित होकर बहुत से शास्त्रों का नित्य अभ्यास करे।

तदर्थं तु गृहीत्वापि तदधीना न जायते ॥ १३६ ॥
वेश्या तथाविधा वापि वशीकर्तुं नरं क्षमा ।
नेयात् कस्य वशं तद्वत् स्वाधीनं कारयेज्जगत् ॥ १३७ ॥

**वेश्यादर्शन के फल—**जैसे वेश्या किसी मनुष्य के धन को ग्रहण करके भी उसके अधीन नहीं हो जाती है और स्वयं अधीन न होते हुये भी उस मनुष्य को अपने वश में करने के लिये समर्थ होती है किन्तु स्वयं किसी के वश में नहीं होती है, वैसे ही जगत् के लोगों को अपने अधीन बनाये किन्तु स्वयं किसी के अधीन न हो। इसे वेश्या-दर्शन का फल समझना चाहिये।

श्रुतिस्मृतिपुराणानामर्थविज्ञानमेव च ।
सहवासात्पण्डितानां बुद्धिः पण्ढा प्रजायते ॥ १३८ ॥

**पण्डितों के साथ मैत्री के फल—**पण्डितों के साथ संगति करने से श्रुति, स्मृति तथा पुराणों के अर्थों का विशेष ज्ञान तथा सत्-असत् का विचार करनेवाली पण्ढा बुद्धि होती है। यह विद्वन्मैत्री का फल है।

देवपित्रतिथिभ्योऽन्नमदत्त्वा नाश्नीयात् क्वचित् ।
आत्मार्थं यः पचेन्मोहान्नरकार्थं स जीवति ॥ १३९ ॥

**अपने लिये केवल भोजन बनाकर खाने का निषेध—**देवता, पितृगण तथा अतिथियों को बिना दिये कभी भोजन नहीं करना चाहिये, क्योंकि जो मोहवश केवल अपने लिये भोजन बनाता है और देवादि को बिना दिये भोजन करता है उसका जीवन नरक के लिये होता है।

मार्गं गुरुभ्यो बलिने व्याधिताय शवाय च ।
राज्ञे श्रेष्ठाय व्रतिने यानगाय समुत्सृजेत् ॥ १४० ॥

**गुरुजनादि के लिये मार्ग देने का निर्देश—**गुरुजन, बलवान्, रोगी, शव (मुर्दा ले जाने के लिये), राजा, माननीय व्यक्ति, व्रतधारी, वाहन (सवारी) पर चढ़े हुए, ऐसे लोगों को जाने के लिये स्वयं हटकर मार्ग दे देना चाहिये।

शकटात्पञ्चहस्तं तु दशहस्तं तु वाजिनः ।
दूरतः शतहस्तं च तिष्ठेन्नागाद् वृषाद्दश ॥ १४१ ॥

**शकटादिकों से दूर रहकर चलने का निर्देश—**बैलगाड़ी आदि से ५ हाथ, घोड़े से १० हाथ, हाथी से १०० हाथ, बैल से १० हाथ की दूरी पर रहना चाहिये।

तृतीयोऽध्यायः १४६

तृतीयोऽध्यायः १४६

शृङ्गिणां नखिनां चैव दंष्ट्रिणां दुर्जनस्य च । नदीनां बसतौ स्त्रीणां विश्वासं नैव कारयेत् ॥ १४२ ॥ श्रृङ्गी आदि का विश्वास करने का निषेध— सींगवाले पशु-बैल आदि, नख से प्रहार करनेवाले भालू आदि, दाढ़ीवाले व्याघ्रादि, दुर्जन, नदी और स्त्री इनके समीप में रहने पर विश्वास नहीं करना चाहिये ।

खादन्न गच्छेदध्वानं न च हास्येन भाषणम् । शोकं न कुर्यान्नष्टस्य स्वकृतेरपि जल्पनम् ॥ १४३ ॥ गमनादि के निषेध के विषय— भोजन करते हुये रास्ता चलना, हंसते हुये बात करना, नष्ट हुई वस्तु या बीती हुई बात या मरे हुये व्यक्ति के विषय में शोक करना, अपने किये हुये कार्य की स्वयं प्रशंसा रूप में वर्णन इन सबों को नहीं करना चाहिये ।

स्वशङ्कितानां सामीप्यं त्यजेद्वै नीचसेवनम् । सँल्लापं नैव शृणुयाद् गुप्तः कस्यापि सर्वदा ॥ १४४ ॥ अपने ऊपर शंका रखनेवालों तथा दुर्जनों के समीप में रहना एवं नीचों की सेवा त्याग देनी चाहिये । और सर्वदा छिपकर किसी की बातें नहीं सुननी चाहिये ।

उत्तमैरननुज्ञातं कार्यं नेच्छेद्रुच तैः सह । देवैः सार्कं सुधापानाद्राहोश्छिन्नं शिरो यतः ॥ १४५ ॥ बड़ों की आज्ञा के बिना उनके साथ कार्य करने का निषेध— यदि श्रेष्ठ लोगों की अपने साथ कार्य करने की अनुमति न हो तो उनके साथ उस कार्य की करने की इच्छा न करे, क्योंकि देवताओं के साथ बिना अनुमति के अमृत-पान करने से राहु का शिर काटा गया ।

महतोऽसत्कृतमपि भवेत्तद् भूषणाय वै । विषपानं शिवस्यैव त्वन्येषां मृत्युकारकम् ॥ १४६ ॥ तेजस्वी क्षमते सर्वं भोक्तुं बह्निरिवानघः । निन्दित भी कार्यों का बड़ों के लिये भूषण होने का निर्देश— सर्व साधारण के लिये प्रसिद्ध नहीं करने योग्य कार्य भी बड़े लोगों के लिये भूषण होता है । जैसे विषपान शिवजी के लिये ही भूषण हुआ किन्तु अन्यों के लिये वही मृत्यु का कारण होता है, क्योंकि निष्पाप तेजस्वी व्यक्ति अग्नि के समान सब कुछ भोजन करने के लिये समर्थ होता है ।

न साम्मुख्ये गुरोः स्थेयं राज्ञः श्रेष्ठस्य कस्यचित् ॥ १४७ ॥ राजा मित्रमिति ज्ञात्वा न कार्यं मानसेप्सितम् । बिना अनुमति के श्रेष्ठ के संमुख बैठने का निषेध— गुरुजन, राजा या किसी

१५० | शुक्रनीतिः

श्रेष्ठ व्यक्ति के संमुख बिना अनुमति के नहीं बैठना चाहिये। और 'राजा हमारा मित्र है' यह समझ कर मनमाना कार्य नहीं करना चाहिये।

नेच्छेन्मूर्खस्य स्वामित्वं दास्यमिच्छेन्महात्मनाम् ॥ १४८ ॥
विरोधं न ज्ञानलवदुर्विदग्धस्य रञ्जनम् ।

मूर्ख का स्वामी बनने की इच्छा का निषेध— मूर्ख जनका स्वामी बनने की इच्छा न करे किन्तु महान् आत्मा (उच्च विचार) वालों का दास भी बनने की इच्छा करे अथवा मूर्खों का स्वामी या दास कुछ भी बनने की इच्छा न करे और महात्माओं के साथ विरोध करने की इच्छा न करे। एवं थोड़े से ज्ञान से ही अपने को बहुत बड़ा चतुर माननेवाले व्यक्ति को खुश करने की इच्छा न करे अथवा उन्हें विरुद्ध या खुश करने की इच्छा न करे।

अत्यावश्यमनावश्यं क्रमात् कार्यं समाचरेत् ॥ १४९ ॥
प्राक्पश्चाद्वाऽत्विलम्बेन प्राप्तं कार्यं तु बुद्धिमान् ।

आवश्यक कार्य को सर्वप्रथम करने का निर्देश— बुद्धिमान मनुष्यों को बहुत से कार्य हाथ में आ जाने पर उनमें से अत्यावश्यक और अनावश्यक कार्यों को छाटकर क्रम से अत्यावश्यक कार्य को प्रथम एवं शीघ्रता से करना चाहिये और अनावश्यक को पीछे तथा विलम्ब से करना चाहिये।

पित्राज्ञप्तेनापि मातृवधरूपे सुपुजिता ॥ १५० ॥
धृता गोतमपुत्रेण ह्यकार्ये चिरकारिता ।

बुरे कार्य में देरी करने का निर्देश— और न करने योग्य बुरे कार्य के करने में देरी करना अत्यन्त उचित होता है जैसे इन्द्र के साथ व्यभिचार कराने के दोष से कुपित हुये गोतम के द्वारा अपनी स्त्री अहल्या का वध करने की आज्ञा पाने पर भी उनके पुत्र शतानन्द का मातृवध में देरी करना उचित हुआ।

प्रेम्णा समीपवासेन स्तुत्या नत्या च सेवया ॥ १५१ ॥
कौशल्येन कलामिश्च कथाभिर्ज्ञानतोऽपि च ।
आदरेणार्जवेनैव शौर्याद्वानेन विद्यया ॥ १५२ ॥
प्रत्युत्थानाभिगमनैरानन्दस्मितभाषणैः ।
उपकारैः स्वाशयेन वशीकुर्याज्जगत् सदा ॥ १५३ ॥

जगत् को वश में करने के उपाय— सदा प्रेम, समीप में रहना, स्तुति, नमस्कार, सेवा, चतुरता, कलाओं (गाना-बजाना आदि ६४ प्रकार की), कथा कहना, ज्ञानोपदेश, आदर, सरलता, शूरता, दान, विद्या, सामने आने पर अपने आसन से उठना या आगे जाकर लिवालाना, आनन्द तथा मुस्कुराहट