शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३८ शुक्रनीतिः
महत्कालेनाल्पकर्म चिरकारी करोति च ।
स शोचत्यल्पफलतो दीर्घदर्शी भवेदतः ॥ ७४ ॥
**चिरकारी मनुष्य के लक्षण—**जो चिरकारी (देरी तक कार्य करनेवाला) होता है वह थोड़े से कार्य को बहुत देर में धीरे २ करता हुआ समाप्त करता है वह थोड़ा फल होने से अनुताप करता है अतः दीर्घदर्शी (दूर तक परिणाम पर करनेवाली) होना चाहिये।
सुफलं तु भवेत्कर्म कदाचित् सहसाकृतम् ।
निष्फलं वापि प्रभवेत् कदाचित् सुविचारितम् ॥ ७५ ॥
तथापि नैव कुर्वीत सहसानर्थकारि तत् ।
कदाचिदपि सञ्जातमकार्यादिष्टसाधनम् ॥ ७६ ॥
यदनिष्टं तु सत्कार्यान्नाकार्यप्रेरकं हि तत् ।
**सहसा कार्य करने का निषेध—**सहसा किया हुआ भी कर्म कभी २ सुन्दर फल देनेवाला हो जाता है कभी २ भलीभांति विचार कर भी किया हुआ कर्म निष्फल हो जाता है। तथापि (कदाचित् कार्य सफलता होने पर भी) सहसा (बिना विचारे एकाएक) कार्य नहीं करना चाहिये, क्योंकि वह अनर्थ पैदा करनेवाला होता है। और कदाचित् अकार्य (नहीं करने योग्य कार्य) से भी जो इष्टसिद्धि होती है और सत् (अच्छे) कार्य से जो अनिष्ट फल होता है, इससे वह अकार्य को करने के लिये प्रेरणा करनेवाला नहीं हो सकता है।
भृत्यो भ्राताऽपि वा पुत्रः पत्नी कुर्यान्न चैव यत् ॥ ७७ ॥
विधास्यन्ति च मित्राणि तत्कार्यमविशङ्कितम् ।
**मित्र की विशेषता—**भृत्य, भाई, पुत्र और पत्नी भी जिस कार्य को पूर्ण नहीं कर सकते, उसीको उसके मित्र-गण निःसन्देह पूर्ण कर देते हैं।
यो हि मित्रमविज्ञाय याथातथ्येन मन्दधीः ॥ ७८ ॥
मित्रार्थे योजयत्येनं तस्य सोऽर्थोऽवसीदति ।
**बिना समझे किसी को मित्र बनाने का निषेध—**जो मन्दबुद्धि यथार्थ रूप से मित्र के भीतरी (अच्छे-बुरे) भाव को बिना समझे मित्रता के लिये उसे नियुक्त करता है उसका वह मैत्रीरूप अर्थ नष्ट हो जाता है।
न हि मानसिको धर्मः कस्यचिज्ज्ञायतेऽञ्जसा ॥ ७९ ॥
अतो यतेत तत्प्राप्त्यै मित्रलब्धिर्वरा नृणाम् ।
**मित्र की प्राप्ति के लिये यत्न करने का निर्देश—**किसी के मानसिक भाव को वस्तुतः नहीं जाना जा सकता है। इससे उसकी (अच्छे मित्र की) प्राप्ति