शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः १३७
**प्रारब्धवश धनी-निर्धन होने का निर्देश—**उत्कर्ष (सुख की अवस्था) या अपकर्ष (दुःखावस्थ।) नित्य नहीं बना रहता है। प्राक्तन कर्मवश मनुष्य धनवान या निर्धन सदा होता है। अतः एक सी अवस्था सदा न रहने से सभी प्राणियों में मैत्रीभाव (सुख-से सुखी-दुःख से दुःखी होना) रखना न छोड़े ऐसा करने से सभी लोग सन्तुष्ट रहकर दुःख नहीं पहुँचायेंगे।
दीर्घदर्शी सदा च स्यात् प्रत्युत्पन्नमतिः क्वचित् ।
साहसी सालसो चैव चिरकारी भवेन्न हि ॥ ६९ ॥
**दीर्घदर्शी के लक्षण—**सदा दूर तक सोचनेवाला तथा क्वचित् समयानुसार तत्काल कर्त्तव्य स्थिर करनेवाला होना चाहिये, और सहसा कार्य करनेवाला, आलसी तथा देरी से धीरे-धीरे कार्य समाप्त करनेवाला नहीं होना चाहिये।
यः सुदुर्निष्फलं कर्म ज्ञात्वा कर्तुं व्यवस्यति ।
द्रागादौ दीर्घदर्शी स्यात् स चिरं सुखमश्नुते ॥ ७० ॥
जो व्यक्ति किसी कार्य के अच्छे-बुरे फल या निष्फलता को विचार कर तदनुसार कार्य करने की चेष्टा करता है और जो कार्य करने के प्रथम शीघ्र ही दूर तक उसके परिणाम (फल) को जाननेवाला होता है वह चिरकाल तक सुख भोगता है। अतः दीर्घदर्शी होना उचित है।
प्रत्युत्पन्नमतिः प्राप्तां क्रियां कर्तुं व्यवस्यति ।
सिद्धिः सांशायिकी तत्र चापल्यात् कार्यगौरवात् ॥ ७१ ॥
**प्रत्युत्पन्नमति के लक्षण—**जो प्रत्युत्पन्नमति (समयानुसार सूझवाला) व्यक्ति तत्काल में उपस्थित कार्य करने की चेष्टा करता है उसके कार्य में जल्द-बाजी तथा कार्य की गुरुता से सिद्धि के विषय में सन्देह बना रहता है अर्थात् वह कार्य हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है।
यतते नैव कालेऽपि क्रियां कर्तुं च सालसः ।
न सिद्धिस्तस्य कुत्रापि स नश्यति च सान्वयः ॥ ७२ ॥
**आलसी मनुष्य के लक्षण—**जो आलसी होता है वह समय उपस्थित होने पर भी करने योग्य कार्य के करने में प्रयत्नशील नहीं होता है, उसके कार्य की सिद्धि कभी भी नहीं होती है और वह वंश-सहित या साथी-सहित नष्ट हो जाता है।
क्रियाफलमविज्ञाय यतते साहसी च सः ।
दुःखभागी भवत्येव क्रियया तत्फलेन वा ॥ ७३ ॥
**साहसी के लक्षण व दोष—**जो साहसी व्यक्ति क्रिया के फल का बिना विचार किये हुये सहसा (एकाएक) कार्य करने का प्रयत्न करता है वह क्रिया या उसके फल के कारण से केवल दुःखभागी ही होता है।