शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४४ | शुक्रनीतिः
दाता आदि की कीर्त्ति सुनने का निर्देश—दाता, धार्मिक और शूर पुरुषों का गुण-कीर्त्तन ( प्रशंसा ) सदा प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिये, और इन सबों के दोष की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिये ।
काले हितमिताहारविहारी विघसाशनः ।
अदीनात्मा च सुस्वप्नः शुचिः स्यात्सर्वदा नरः ॥ १११ ॥
समय आदि पर परिमित भोजन आदि करने का निर्देश—मनुष्यों को सदा समय पर हितकर तथा उचित मात्रा के साथ आहार तथा विहार, देवादि को भोग लगाकर प्रसाद-भोजन, अकातर-स्वभाव, अच्छी तरह से सोना तथा शरीर एवं मन से पवित्र रहना । इन सब विषयों को सदा करना चाहिये ।
कुर्याद्विहारमाहारं निर्हारं विजने सदा ।
व्यवसायी सदा च स्यात् सुखं व्यायाममभ्यसेत् ॥ ११२ ॥
स्त्री-संभोगादि का एकान्त में करने का निर्देश—और सदा स्त्री-संभोग, भोजन तथा मल-मूत्रादि का त्याग एकान्त में करना चाहिये । एवं सदा उद्योग करने में निरत रहना और सुखपूर्वक व्यायाम ( कसरत ) करना चाहिये ।
अन्नं न निन्द्यात् सुस्वस्थः स्वीकुर्यात् प्रीतिभोजनम् ।
आहारं प्रवरं विद्यात् षड्रसं मधुरोत्तरम् ॥ ११३ ॥
मधुरादि षड्रस अन्न को प्रीतिपूर्वक भोजन का निर्देश—अन्न की निन्दा नहीं करनी चाहिये एवं स्वस्थ रहने पर किसी के द्वारा आमन्त्रित प्रीतिभोज में भोजन करना स्वीकार करना चाहिये । तिक्त, कटु, अम्ल, लवण, कषाय ( कसैला ), मधुर इन ६ रसों से युक्त एवं प्रधान रूप से मधुरान्न ( मिठाई ) युक्त जो भोजन होता है उसे सर्वोत्तम समझना चाहिये ।
विहारं चैव स्वस्त्रीभिर्भेश्याभिर्न कदाचन ।
नियुद्धं कुशलैः सार्धं व्यायामं नतिभिर्वरम् ॥ ११४ ॥
स्व-स्त्री के साथ विहार करने का निर्देश—और अपनी स्त्री के साथ विहार करना उचित है वेश्याओं के साथ कदापि नहीं उचित है । और निपुण ( मल्ल-विद्या में निपुण ) लोगों के साथ प्रणत होकर कुश्ती लड़ना उत्तम व्यायाम है अतः इसे करना चाहिये ।
हित्वा प्राक्पश्चिमौ यामौ निशि स्वापो वरो मतः ।
दीनान्धपङ्गुबधिरा नोपहास्याः कदाचन ॥ ११५ ॥
रात्रि में सोने के समय का एवं दीनादिक उपहास के निषेध का निर्देश—रात्रि में प्रथम तथा चतुर्थ प्रहरों को छोड़कर मध्य के द्वितीय तथा तृतीय प्रहरों में सोना उत्तम होता है । दीन, अन्धा, पङ्गु तथा बहरा ऐसे लोगों का कभी उपहास ( हंसी ) नहीं करना चाहिये ।