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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

तृतीयोऽध्यायः [१४३]

तदीयकुशलप्रश्नैः शक्त्या दानैर्जलादिभिः ।
अपने गृह में आये हुये किसी भी तुच्छ व्यक्ति का उसके साथ कुशल-प्रश्न पूँछने से तथा यथाशक्ति उसे जलादि देने से यथायोग्य आदर-संमान करना चाहिये ।

सपुत्रस्तु गृहे कन्यां सपुत्रां वासयेन्नहि ॥ १०५ ॥
सभर्तृकां च भगिनीमनाथे ते तु पालयेत् ।
सपुत्र के लिये सपुत्र कन्या आदि को लाकर गृह में बसाने का निषेध—
जिसके पुत्र हो वह अपने गृह में पुत्रयुक्त कन्या एवं पतियुक्त बहन को लाकर सदा के लिये न रखे क्योंकि इससे कलह होने की संभावना रहती है और यदि कन्या तथा बहन अनाथ अवस्था में हों तो अवश्य लाकर उनका पालन करना चाहिये ।

'सर्पोऽग्निर्दुर्जनो राजा जामाता भगिनीसुतः ॥ १०६ ॥
रोगः शत्रुर्नावमान्योऽप्यल्प इत्युपचारितः ।
**सर्पादि को तुच्छ समझकर अपमान करने का निषेध—**सर्प, अग्नि, दुर्जन, राजा, जामाता (दामाद), भानजा, रोग, शत्रु ये सब छोटे अर्थात् बालक या हीन हैं इस ख्याल से कभी उनका तिरस्कार या उपेक्षा नहीं करनी चाहिये ।

क्रौर्यात्तैक्ष्ण्याद् दुःस्वभावात् स्वामित्वात् पुत्रिकामयात् ॥१०७॥
स्वपूर्वजपिण्डदत्वाद् वृद्धिभीत्या उपचारयेत् ।
ऋणशेषं रोगशेषं शत्रुशेषं न रक्षयेत् ॥ १०८ ॥
**सर्पादि से संभल कर व्यवहार करने का तथा ऋणादिका समूल नाश करने का निर्देश—**किन्तु क्रूर होने से सर्प से, तीक्ष्ण होने से अग्नि से, दुष्ट स्वभाव होने से दुर्जन से, स्वामी होने से राजा से, कन्या को क्लेश पहुँचाने के भय से जामाता से, अपने पूर्वजों को पिण्ड देनेवाला होने से भानजा से, बढ़ जाने से रोग से, भय होने से शत्रु से संभल कर ऐसा व्यवहार करना चाहिये जिससे ये हानि न पहुँचा सकें। और ऋण, रोग तथा शत्रु इनका शेष नहीं रखना चाहिये अर्थात् इन्हें समूल नष्ट कर देना चाहिये ।

याचकाद्यैः प्रार्थितः सन्न तीक्ष्णं चोत्तरं वदेत् ।
तत्कार्यं तु समर्थश्चेत् कुर्याद्वा कारयीत च ॥ १०९ ॥
**याचकादि के साथ व्यवहार का प्रकार—**याचक आदि से प्रार्थना किये जाने (मांगने) पर तीक्ष्ण उत्तर नहीं देना चाहिये । और यदि सामर्थ्य हो तो स्वयं उसके कार्य को कर दे या दूसरे से करा दे ।

दातॄणां धार्मिकाणां च शूराणां कीर्तनं सदा ।
शृणुयात्तु प्रयत्नेन तच्छिद्रं नैव लक्षयेत् ॥ ११० ॥