शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 245, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः १५६
अधमर्णस्थितं चापि यद् देयं चौत्तमर्णिकम्।
**ब्याजी धन या दिये ऋण धन का विभाग करने का निषेध—**गृहपति के पुत्र लोग पिता के उस धन का परस्पर विभाग न करें जो कि सूद पर दिया हुआ अधमर्ण ( ऋण लेनेवाले ) के पास हो अथवा उत्तमर्ण ( सूद पर द्रव्य देनेवाला महाजन ) को देने के लिये जो धन हो।
यस्येच्छेदुत्तमां मैत्रीं कुर्यान्नाभिलाषकम् ॥ २०१ ॥
परोक्षे तद्गृहद्वारं तत्स्त्रीसम्भाषणं तथा ।
तन्न्यूनदर्शनं नैव तत्प्रतीपविवादनम् ॥ २०२ ॥
असाहाय्यं च तत्कार्ये ह्यनिष्टोपेक्षणं न च ।
**शाश्वत मैत्री रखने के लिये त्याज्य कर्मों का निर्देश—**जिसके साथ उत्तम मैत्री रखना चाहे उससे धन का अभिलाषा न रखे अर्थात् ऋणादि न ले। और परोक्ष में उसके अन्तःपुर में न जाय और न उसकी स्त्री से बातचीत करे। एवं उसकी त्रुटि को न देखे अर्थात् दोष के तरफ ध्यान न दे। और उसके प्रतिकूल विवाद न करे। तथा उसके कार्य में असहायता और अनिष्ट देखकर उसकी उपेक्षा न करे।
सकुसीदमकुसीदं धनं यच्चौत्तमर्णिकम् ॥ २०३ ॥
दद्यादगृहीतमिव नोभयोः क्लेशकृद्यथा ।
नासाक्षिकमचालित्खितमृणपत्रस्य पृष्ठतः ॥ २०४ ॥
**बिना साक्षी या ऋणपत्र लेख के ऋण न देने का निर्देश—**और सूद पर या बिना सूद का जो महाजनी ( ऋण देनेवाला ) का धन हो वह जिस प्रकार से दोनों मित्रों को परस्पर क्लेश न पहुंचे तथा बिना साक्षी बिना ऋणपत्र पर लिखाये न दे।
आत्मपितृमातृगुणैः प्रख्यातश्चोत्तमोत्तमः ।
गुणैरात्मभवैः ख्यातः पैतृकैर्मातृकैः पृथक् ॥ २०५ ॥
उत्तमो मध्यमो नीचोऽधमो भ्रातृगुणैर्नरः ।
कन्यास्त्रीभगिनीभाग्यो नरोऽधमतमो मतः ॥ २०६ ॥
**उत्तमोत्तमादिक पुरुषों के लक्षण—**जो मनुष्य अपने, पिता तथा माता इन तीनों के गुणों से प्रख्यात होता है वह उत्तमोत्तम कहलाता है, जो केवल अपने ही गुणों से प्रख्यात होता है वह उत्तम, पिता के गुणों से मध्यम एवं माता के गुणों से प्रख्यात नीच कहलाता है। और भाई के गुणों से प्रख्यात पुरुष अधम कहलाता है। तथा जो कन्या, स्त्री या बहन के भाग्य से उन्हीं के सहारे गलग्रह होकर जीवन व्यतीत करता है वह अधमतम कहलाता है।
भूत्वा महाधनः सम्यक् पोष्यवर्गं तु पोषयेत् ।