शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० | शुक्रनीतिः
अदत्त्वा यत्किञ्चिदपि न नयेद्दिवसं बुधः ॥ २०७ ॥
बिना दान किये कभी कोई दिन व्यतीत न करने का निर्देश— विपुल धन से सम्पन्न होते हुए भी जो पालन करने के योग्य हैं उन्हीं का पालन करना चाहिये। बुद्धिमान को बिना कुछ दिये हुये कोई भी दिन व्यतीत नहीं करना चाहिये।
स्थितो मृत्युमुखे चाहं क्षणमायुर्ममास्ति न ।
इति मत्वा दानधर्मौ यथेष्टौ तु समाचरेत् ॥ २०८ ॥
न तौ बिना मे परत्र सहायाः सन्ति चेतरे ।
दानशीलाश्रयाल्लोको वर्तते न शठाश्रयात् ॥ २०९ ॥
यथेष्ट दान-धर्म करने का निर्देश— 'मैं मृत्यु के मुख में स्थित हूँ, मेरी क्षणभर की भी आयु नहीं है। और दान और धर्म इन दोनों को छोड़कर परलोक में अन्य कोई मेरा सहायक नहीं है। तथा दानशील व्यक्तियों के आश्रय से यह जगत् ठहरा हुआ है। शठों के आश्रय से नहीं।' ऐसा समझकर यथेष्ट दान तथा धर्म करना चाहिये।
भवन्ति मित्रा दानेन द्विषन्तोपि च किं पुनः।
दान से शत्रु को भी मित्र बन जाने का निर्देश— जब शत्रु लोग भी दान से मित्र बन जाते हैं तब औरों के लिये क्या कहना है अर्थात् अन्य तो मित्र बन ही जाते हैं।
देवतार्थं च यज्ञार्थं ब्राह्मणार्थं गवार्थकम् ॥ २१० ॥
यद्दत्तं तत्पारलौक्यं संविदत्तं तदुच्यते ।
परलोक-सुखसाधन 'संविद्' दान के लक्षण— देवता, यज्ञ, ब्राह्मण, गौ, इनके लिये जो दिया जाता है वह परलोक-सुख-साधन के लिये होता है और उसी को 'संविद्' दान अर्थात् 'अवश्य देना चाहिये' इस बुद्धि से दिया हुआ कहते हैं।
बन्दिमागधमल्लादिनटनार्थं च दीयते ॥ २११ ॥
पारितोष्यं यशोर्थं तु श्रिया दत्तं तदुच्यते ।
पारितोष्य, श्रियादत्त या यशोऽर्थक दान के लक्षण— बन्दी, मागध तथा मल्ल आदि लोगों को अपना २ कार्य दिखाने के लिये जो पुरस्कार रूप में दिया जाता है उसे 'पारितोष्य' कहते हैं। और जो यश के लिये दिया जाता है उसे 'श्रियादत्त' (लक्ष्मी से दिया हुआ) कहते हैं अथवा उसे यशोऽर्थक और श्रियादत्त कहते हैं।
उपायनीकृतं यत्तु सुहृत्संबन्धिबन्धुषु ॥ २१२ ॥
विवाहादिषु चाचारदत्तं ह्रीदत्तमेव तत् ।