शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १६४ | शुक्रनीतिः |
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विनोद में भी दुखी करनेवाले वचन बोलने का निषेध—जिस वचन से मित्र लज्जित हो जाय या उसके मनमें फर्क पड़ जाय किंवा दुःखित चित्त हो जाय, वैसे वचनों को विनोद में भी बुद्धिमान व्यक्ति को थोड़ा भी नहीं कहना चाहिये ।
यस्मिन् सूक्तं दुरुक्तं च समं स्याद्वा निरर्थकम् ॥ २३० ॥
न तत्र प्रलपेत् प्राज्ञो वधिरेष्विव गायनः ।
अच्छा-बुरा कहने का असर न होने वाले से कुछ भी न कहने का निर्देश—जिस व्यक्ति के सामने अच्छा या बुरा कहना दोनों ही यदि बराबर या निरर्थक हो तो उसके समक्ष बुद्धिमान व्यक्ति प्रलाप ( व्यर्थ बात ) न करे क्योंकि उसका बात करना बहरे के सामने गाने के समान है ।
व्यसने सज्जमानं हि यो मित्रं नाभिपद्यते ॥ २३१ ॥
अनुनीय यथाशक्ति तं नृशंसं विदुर्बुधाः ।
बुरे व्यसनों से अलग न करनेवाले मित्र की नृशंसता का निर्देश—जो लोग द्यूत आदि बुरे व्यसनों में पड़े हुये अपने मित्र को यथाशक्ति समझा बुझाकर उससे अलग नहीं करते हैं अथवा उसके लिये यत्न नहीं करते हैं उन्हें पण्डित लोग नृशंस ( निष्ठुर ) समझते हैं ।
ज्ञातीनां हि मिथो भेदे यन्मित्रं नाभिपद्यते ॥ २३२ ॥
सर्वयत्नेन माध्यस्थ्यं न तन्मित्रं विदुर्बुधाः ।
कुमित्र के लक्षण—भाई आदियों का परस्पर भेद होने पर (दिल में फर्क आ जाने पर ) यदि कोई मित्र होकर भी उन लोगों का मध्यस्थ बनकर मनमुटाव नहीं दूर करता है तो उस ( मित्र ) को पण्डित लोग मित्र नहीं मानते हैं अर्थात् उसे कुमित्र मानते हैं ।
आजन्मसेवितं दानैर्मानैश्च परितोषितम् ॥ २३३ ॥
तीक्ष्णवाक्यानमित्रमपि तत्कालं याति शत्रुताम् ।
वक्रोक्तिशल्यमुद्धर्तुं न शक्यं मानसं यतः ॥ २३४ ॥
कठोर वचन से मित्र के शत्रु बन जाने का निर्देश—जिसकी जन्म से ही सेवा की गई हो और दान तथा मान से पोषण किया गया हो ऐसा मित्र भी तीक्ष्ण वाक्यों के कहने से तत्काल ही शत्रु बन जाता है क्योंकि चित्त में चुभे हुये कटु-वचनरूपी कांटों को निकालफर दूर करने में वह समर्थ नहीं होता है। अतः मित्रों को भी तीक्ष्ण बातें नहीं सुनानी चाहिये ।
वहेदमित्रं स्कन्धेन यावत्स्यात् स्वबलाधिकः ।
ज्ञात्वा नष्टबलं तं तु भिन्द्याद् घटमिवाश्मनि ॥ २३५ ॥
स्वबलाधिक शत्रु को कन्धे पर भी ले चलने का निर्देश—जब तक शत्रु