शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः
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अपने से बल में अधिक रहे तब तक उसे कन्धे पर रखे अर्थात् उसका आदर करे और जब समझ ले कि वह हीनबल हो गया तब उसे घड़े के समान पत्थर पर पटक कर नष्ट कर दे ।
न भूषयत्यलंकारो न राज्यं न च पौरुषम् ।
न विद्या न धनं तादृग् यादृक्सौजन्यभूषणम् ॥ २३६ ॥
'मनुष्य का भूषण सुजनता है' इसका निर्देश— जैसा सुजनतारूपी भूषण मनुष्य को भूषित करता है वैसा अलङ्कार, राज्य, पौरुष (पराक्रम), विद्या या धन नहीं भूषित करता है ।
अश्वे जवो वृषे धैर्य्यं मणौ कान्तिः क्षमा नृपे ।
हावभावौ च वेश्यायां गायके मधुरस्वरः ॥ २३७ ॥
दातृत्वं धनिके शौर्यं सैनिके बहुदुग्धता ।
गोषु दमस्तपस्विषु विद्वत्सु वाषदूकता ॥ २३८ ॥
सभ्येष्व पक्षपातस्तु तथा साक्षिषु सत्यवाक् ।
अनन्यभक्तिर्भृत्येषु सुहितोक्तिश्च मन्त्रिषु ॥ २३९ ॥
मौनं मूर्खेषु च स्त्रीषु पातिव्रत्यं सुभूषणम् ।
महादुभूषणं चैतद्विपरीतममीषु च ॥ २४० ॥
अश्वादिकों में वेगादिक गुणों की भूषणता तथा अन्यथा (विपरीत) होने पर दुभूषणता का निर्देश— घोड़े में अधिक वेग, बैल में अधिक भारवहन की सामर्थ्य, मणि में चमक, राजा में क्षमा, वेश्या में हाव-भाव, गानेवाले में मधुर स्वर, धनी में दान देने की शक्ति, सैनिक में शूरता, गायों में बहुत दुग्ध देना, तपस्वियों में इन्द्रियों का दमन करना, विद्वानों में बोलने की अच्छी शक्ति, सभासदों में किसी का पक्षपात न करना, साक्षियों (गवाहों) में सत्य बोलना (सच्ची गवाही देना), भृत्यों में स्वामी की अनन्य भक्ति, मन्त्रियों में राजा के लिये सुन्दर हितकर वचन बोलना, मूर्खों में मौन रहना, स्त्रियों में पतिव्रताधर्म का पालन करना ही सुन्दर भूषण कहलाता है अर्थात् अन्यभूषण इन लोगों के लिये भूषण नहीं है। यदि इन सब घोड़े आदियों में वेगादि गुणों का अभाव हो तो उनकी सुन्दरता को अत्यन्त नष्ट करनेवाले होते हैं ।
गृहं बहुकुटुम्बेन दीपैर्गोभिः सुबालकैः ।
भात्येकनायकं नित्यं नैव निर्बहुनायकम् ॥ २४१ ॥
एक ही नायक आदि से ही परिवार आदि की शोभा का निर्देश— गृह में जब अधिक परिवार, बहुत से दीपकों का प्रकाश, बहुतसी गायें और बहुत से बालक सुन्दर हों तब उसकी नित्य शोभा होती है और जब तक गृह का