शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 266, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें१८० | शुक्रनीतिः
अज्ञातशास्त्रो न ब्रूयाज्ज्योतिषं धर्मनिर्णयम् ॥ ३२२ ॥
नीतिदण्डं चिकित्सां च प्रायश्चित्तं क्रियाफलम् ।
बिना शास्त्रज्ञान के न करने योग्य विषयों का निर्देश— बिना शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किये हुये (मूर्ख) पुरुष को ज्योतिष, धर्म का निर्णय, दण्डनीति या नीति एवं दण्डविषयक विवरण, चिकित्सा, प्रायश्चित्त और किसी कार्य का परिणाम (नतीजा) के विषय में कुछ न करे या न कहे ।
पारतन्त्र्यात्परन्दुःखं न स्वातन्त्र्यात्परं सुखम् ॥ ३२३ ॥
अप्रवासी गृही नित्यं स्वतन्त्रः सुखमेधते ।
पारतन्त्र्य से बढ़कर दुःख और स्वतन्त्रता से बढ़कर सुख न होने का निर्देश— परतन्त्रता (पराधीनता) से बढ़कर दूसरा कोई दुःख और स्वाधीनता से बढ़कर दूसरा कोई सुख नहीं है। एवं प्रवास नहीं करनेवाला तथा स्वाधीन होकर अपने ही घर में रहनेवाला पुरुष सुख प्राप्त करता है।
नूतनप्राक्तनानां च व्यवहारविदां धिया ॥ ३२४ ॥
प्रतिक्षणं चाभिनवो व्यवहारो भवेद्यतः ।
वक्तुं न शक्यते प्रायः प्रत्यक्षादनुमानतः ॥ ३२५ ॥
उपमानेन तज्ज्ञानं भवेदाप्तोपदेशतः ।
प्रत्यक्षादि ४ प्रमाणों से व्यवहार-ज्ञान होने का निर्देश— नवीन तथा प्राचीन व्यवहार में चतुर लोगों की बुद्धि से प्रतिक्षण नये-नये व्यवहार होते रहते हैं अतः प्रायः करके उन सबों का कहना कठिन है इसीसे प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा आप्त पुरुषों के उपदेश (शब्द प्रमाण) से उन सबों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।
कथितं तु समासेन सामान्यं नृपराष्ट्रयोः ॥ ३२६ ॥
नीतिशास्त्रं हितायालं यद्विशिष्टं नृपे स्मृतम् ।
इति शुक्रनीतौ नृपराष्ट्रसामान्यलक्षणं नाम तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ।
इस प्रकार से संक्षेपरूप में सामान्यतः (साधारणतया) राजा तथा राष्ट्र (प्रजाजन) दोनों के सम्बन्ध में और विशेषतः केवल राजा के लिये जो नीतिशास्त्र पर्याप्त हितकारक है उसे कहा गया ।
इति शुक्रनीति में नृप-राष्ट्र-सामान्य-लक्षणनामक तृतीय अध्याय समाप्त हुआ ।