भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 265

तृतीयोऽध्यायः १७६

वदेद् वृद्धानुकूलं यन्न बालसदृशं क्वचित् ॥ ३१७ ॥ परवेश्मगतस्तत्स्त्रीवीक्षणं न च कारयेत् ।

**वृद्धजनों के अनुकूल वचन-बोलने का एवं किसी की स्त्री को घूर कर न देखने का निर्देश—**वृद्धजनों के अनुकूल वचन बोलना चाहिये, कहीं पर बच्चों की-सी बातें नहीं करनी चाहिये । और किसी के घर में पहुँचने पर उसकी स्त्री की तरफ घूर कर नहीं देखना चाहिये (बल्कि देखकर नीची निगाह कर लेना चाहिये) ।

अधनादननुज्ञातान्न गृह्णीयात्तु स्वामिताम् ॥ ३१८ ॥ स्वशिशुं शिक्षयेदन्यशिशुं नाप्यपराधिनम् ।

**अन्य के अपराधी बालक को दण्ड न देने का निषेध—**किसी गरीब के अधीन किसी अधिकार को बिना उसकी अनुमति के प्रमुख न स्वीकार करे । अपने बच्चों का शासन करे किन्तु दूसरे के बच्चों को अपराध करने पर भी दण्ड न दे ।

अधर्मनिरतो यस्तु नीतिहीनश्चलान्तरः ॥ ३१९ ॥ संकर्षकोऽतिदण्डी तद्ग्रामं त्यक्त्वाऽन्यतो वसेत् ।

**ग्राम को छोड़कर अन्यत्र वास करने की अवस्थाओं का निर्देश—**यदि ग्राम का स्वामी अधर्म में निरत, नीति पर नहीं चलनेवाला, अव्यवस्थित चित्तवाला, धन का शोषण करनेवाला और अधिक तीक्ष्ण दण्ड देनेवाला हो तो उस (ग्राम) को छोड़कर अन्यत्र निवास करना चाहिये ।

यथार्थमपि विज्ञातमुभयोर्वादिनोर्मतम् ॥ ३२० ॥ अनियुक्तो न वै ब्रूयाद्धीनशत्रुर्भवेद्यतः ।

**बिना जज की आज्ञा के वादी-प्रतिवादी के विषय में सत्यासत्यादि बातें न कहने का निर्देश—**वादी और प्रतिवादी उन दोनों के मत को यथार्थ रूप से जान कर भी अर्थात् ‘किसका सत्य है और किसका झूठ है’ यह जानकर भी बिना राजा या जज के द्वारा नियुक्त किये स्वयं चलकर न कहे क्योंकि जो हारेगा वह शत्रु हो जायगा अतः न कहे । और इससे मनुष्य किसी का शत्रु नहीं हो सकता है ।

गृहीत्वाऽन्यविवादं तु विवदेन्नैव केनचित् ॥ ३२१ ॥ मिलित्वा सङ्घशो राजमन्त्रं नैव तु तर्कयेत् ।

**अन्य के विवाद को ग्रहण कर किसी के संग विवाद न करने का निर्देश—**दूसरे के झगड़े में पड़कर किसी के साथ झगड़ा न करे । और किसी के दल में मिलकर राजा के द्वारा की हुई किसी मन्त्रणा के विषय में तर्क-वितर्क नहीं करना चाहिये ।