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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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१८४ | शुक्रनीतिः

दुष्टानां नृपतिः शत्रुः कुलटानां पतिव्रता ।
साधुः खलानां शत्रुः स्यान्मूर्खाणां बोधको रिपुः ॥ १८ ॥
दुष्टों के लिये राजा, कुलटाओं के लिये पतिव्रता स्त्री, दुर्जनों के लिये सज्जन और मूर्खों के लिये उपदेश देनेवाला शत्रु होता है ।

उपदेशो हि मूर्खाणां क्रोधायैव शमाय न ।
पयः पानं भुजङ्गानां विषायैवामृताय न ॥ १९ ॥
मूर्खों के लिए उपदेश देने का निषेध—क्योंकि—मूर्खों के लिये उपदेश देना केवल क्रोधजनक होता है उससे उसे शान्ति नहीं मिलती है । और सर्पों के लिये दूध पिलाना केवल विषवर्द्धक होता है उससे अमृत नहीं होता है अर्थात् विष के बदले अमृत नहीं निकलता ।

आसमन्ताच्चतुर्दिक्षु सन्निकृष्टाश्च ये नृपाः ।
तत्परास्तत्परा येऽन्ये क्रमाद्धीनबलारयः ॥ २० ॥
शत्रूदासीनमित्राणि क्रमात्ते स्युस्तु प्राकृताः ।
अरिर्मित्रमुदासीनोऽनन्तरस्तत्परः परः ॥ २१ ॥
क्रमशो वा नृपा ज्ञेयाश्चतुर्दिक्षु तथाऽरयः ।
स्वसमीपतरा भृत्या ह्यमात्याद्याश्च कीर्तिताः ॥ २२ ॥
राजाओं के स्वाभाविक शत्रु-उदासीन-मित्र राजाओं के लक्षण—राजा के राज्य के सब तरफ चारों दिशाओं में समीपवर्त्ती एवं उनके बाद पुनः उनके बाद के जो अन्य राजा लोग हैं वे क्रम से स्वाभाविक पास के शत्रु, उसके बाद के उदासीन और पुनः उसके बाद के मित्र होते हैं । और हीन बलवाले शत्रु भी पास के, उसके बाद के पुनः उसके बाद के इस क्रम से शत्रु, उदासीन तथा मित्र होते हैं । और अरि, मित्र और उदासीन राजाओं के भी चारों दिशाओं में पास के, उसके बाद के पुनः उसके बाद के इस क्रम से उनके भी शत्रु, मित्र और उदासीन होते हैं । और अपने अत्यन्त समीपवर्त्ती भृत्य तथा अमात्य (मन्त्री) आदि भी राजा के द्वारा कष्ट दिये जाने पर शत्रु हो जाते हैं ।

बृंहयेत् कर्षयेन्मित्रं हीनाधिकबलं क्रमात् ।
भेदनीयाः कर्षणीयाः पीडनीयाश्च शत्रवः ॥ २३ ॥
विनाशनीयास्ते सर्वे सामादिभिरुपक्रमैः ।
मित्र और शत्रु राजाओं के प्रति राजाओं के आचरण का निर्देश—हीनबल और अधिक बलवाले मित्र राजाओं की भी क्रम से वृद्धि तथा क्षीणता करे। और जो शत्रु राजा लोग हैं उनमें सामादि उपायों से भेद डालना तथा उन्हें क्षीण, पीडित एवं नष्ट करना चाहिये ।

मित्रं शत्रुं यथायोग्यैः कुर्यात् स्ववशवर्तिनम् ॥ २४ ॥
उपायेन यथा व्यालो गजः सिंहोऽपि साध्यते ।