शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम्
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जिस प्रकार से उपाय द्वारा सर्प, हाथी तथा सिंह को अपने वश में किया जाता है उसी प्रकार से यथायोग्य उपायों से मित्र तथा शत्रु को अपना वशवर्ती बनाना चाहिये ।
भूमिष्ठाः स्वर्गमायान्ति वज्रं भिन्दन्त्युपायतः ॥ २५ ॥
क्योंकि उपाय से मनुष्य भूमि में रहकर स्वर्ग पहुँच जाता है और वज्र को भी विदीर्ण कर देता है ।
सुहृत्संबन्धिस्त्रीपुत्रप्रजाशत्रुषु ते पृथक् ।
सामदानभेददण्डाश्चिन्तनीयाः स्वयुक्तितः ॥ २६ ॥
मित्रादि के प्रति सामादिकों का विचार स्वयुक्तियों से करने का निर्देश—
मित्र, संबन्धी, पुत्र, प्रजा और शत्रु इन सबों के विषय में उक्त साम, दान, तथा दण्ड का अपनी युक्ति से पृथक् २ विचार करना चाहिये ।
एकशीलवयोविद्याजातिव्यसनवृत्तयः ।
साहचर्ये भवेन्मित्रमेभिर्यदि तु सार्जवैः ॥ २७ ॥
मित्रता होने के कारणों का निर्देश— जिनके परस्पर स्वभाव, अवस्था, विद्या ( ज्ञान ), जाति, व्यसन ( आदत ), आजीविका ये सब समान हैं वे यदि निष्कपट भाववाले सरल होकर एक जगह मिलते हैं तो मित्र हो जाते हैं ।
त्वत्समस्तु सखा नास्ति मित्रे साम इदं स्मृतम् ।
मम सर्वं तवैवास्ति दानं मित्रे सजीवितम् ॥ २८ ॥
मित्र के लिये साम तथा दान वाक्यों के लक्षण— तुम्हारे समान मेरा दूसरा कोई मित्र नहीं है' ऐसा मित्र के लिये कहना 'साम वाक्य' कहलाता है । और 'जीवन के सहित मेरी सभी वस्तुयें तुम्हारी ही हैं' यह मित्र के लिये कहना 'दान वाक्य' कहलाता है ।
मित्रेऽन्यमित्रसुगुणान् कीर्तयेद् भेदनं हि तत् ।
मित्रे दण्डो न करिष्ये मैत्रीमेवंविधोऽसि चेत् ॥ २६ ॥
भेद तथा दण्ड-वाक्यों के लक्षण— 'मित्र के सामने अन्य मित्र के सुन्दर गुणों की प्रशंसा करना' यह मित्र के लिये 'भेद-वाक्य' और 'तुम यदि ऐसे हो तो मैं तुम्हारे साथ मित्रता नहीं रक्खूंगा' यह कहना मित्र के लिये 'दण्ड-वाक्य' कहलाता है ।
यो न संयोजयेदिष्टमन्यानिष्टमुपेक्षते ।
उदासीनः स न कथं भवेच्छत्रुः सुसान्ध्विकः ॥ ३० ॥
उदासीन के शत्रु बनने का निर्देश— जो स्वयं अभीष्ट कार्य की सिद्धि