शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 278, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें१९२ शुक्रनीतिः
कोमलता रखते हुये ऊपर से क्रूर (तीक्ष्ण) होकर अपनी प्रजा को दण्ड देना चाहिये। अर्थात् ऊपर से अत्यन्त कठोर दण्ड देनेवाले के समान और स्वभाव से हितकारी होना चाहिये।
राष्ट्रं कर्णेजपैर्नित्यं हन्यते च स्वभावतः ॥ ६६ ॥
अतो नृपः सूचितोऽपि विमृशेत् कार्यमादरात् ।
चुगुलखोरों से देश नष्ट होने का निर्देश— स्वभावतः चुगुलखोर लोग चुगुलखोरी से परस्पर बिगाड़ कराकर राज्य को नष्ट करने की चेष्टा करते हैं, अतः राजा किसी की चुगुली सुनने पर यत्नपूर्वक विचार कर तदनुसार कार्य करे।
आत्मनश्च प्रजायाश्च दोषदर्शद्युत्तमो नृपः ॥ ६७ ॥
विनियच्छति चात्मानमादौ भृत्यांस्ततः प्रजाः ।
उत्तम राजा के लक्षण तथा स्वयं दोषमुक्त होने का निर्देश— अपने तथा प्रजाओं के दोषों को देखनेवाला राजा उत्तम कहलाता है और वह प्रथम अपने को दोषमुक्त बनाता है पश्चात् भृत्यों को, उसके बाद प्रजाओं को दोषमुक्त बनाता है।
कायिको वाचिको मानसिकः सांसर्गिकस्तथा ॥ ६८ ॥
चतुर्विधोऽपराधः स बुद्धयबुद्धिकृतो द्विधा ।
अपराध के ४ भेद पुनः प्रत्येक के दो-दो भेदों का निर्देश— कायिक (शरीर से होनेवाला), वाचिक (वाणी से होनेवाला), मानसिक (मनसे होनेवाला), सांसर्गिक (संसर्ग से होनेवाला), इस प्रकार से अपराध ४ प्रकार का होता है। और उसमें प्रत्येक बुद्धिकृत (जानबूझ कर होनेवाला) एवं अबुद्धिकृत (बिना जाने होनेवाला) भेद से दो-दो प्रकार का होता है।
पुनर्द्विधा कारितश्च तथा ज्ञेयोऽनुमोदितः ॥ ६९ ॥
सकृदसकृदभ्यस्तस्वभावैः स चतुर्विधः ।
पुनः उक्त अपराधों के २ भेद एवं सभी अपराधों के पुनः ४ भेदों का निर्देश— वह अपराध पुनः दो प्रकार का होता है एक कारित (कराया हुआ) दूसरा अनुमोदित (अनुमोदन किया हुआ) और वह अपराध सकृत्कृत (एक बार किया हुआ), असकृत्कृत (बार-बार किया हुआ), अभ्यस्तकृत (निरन्तर किया हुआ), स्वभावकृत (स्वभाव से किया हुआ) इस प्रकार से ४ प्रकार का होता है।
नेत्रवक्त्रविकाराद्यैर्भावैर्मानसिकं तथा ॥ ७० ॥
क्रियया कायिकं वीक्ष्य वाचिकं क्रूरशब्दतः ।
सांसर्गिकं साहचर्यैर्ज्ञात्वा गौरवलाघवम् ॥ ७१ ॥