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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 282

१६६ | शुक्रनीतिः

बन्धन तथा ताडन योग्य के लक्षण— जो सहायकों की श्रेष्ठता से पूर्व विद्या या बल के अहङ्कार से पाप (अपराध) करता है उसे सदा कैद में बन्द रखे तथा मारे-पीटे।

भार्या पुत्रश्च भगिनी शिष्यो दासः स्नुषाऽनुजः ।
कृतापराधास्ताड्यास्ते तनुरज्जुसुवेणुभिः ॥ ८९ ॥
पृष्ठतस्तु शरीरस्य नोत्तमाङ्गे कथञ्चन ।
अतोऽन्यथा तु प्रहरेच्चोरवद्दण्डमर्हति ॥ ९० ॥

पतली रस्सी या छड़ी आदि से मारने योग्य के लक्षण— अपनी स्त्री, पुत्र, बहन (छोटी), शिष्य (छात्र), दास, पुत्रवधू (पतोहू), छोटा भाई यदि अपराध करे तो इन्हें पतली रस्सी या छड़ी से अथवा पतली रस्सी वाले चाबुक से शरीर पर पीठ में मारना चाहिये किन्तु कभी भी शिर में नहीं मारना चाहिये, इससे अन्यथा यदि कोई मारता है तो उसे चोर की भांति दण्ड देना चाहिये ।

नीचकर्मकरं कुर्याद् बन्धयित्वा तु पापिनम् ।
मासमात्रं त्रिमासं वा षण्मासं वाऽपि वत्सरम् ॥ ९१ ॥
यावज्जीवं तु वा कश्चिन्न कश्चिद्वधमर्हति ।

नीच कर्म कराने योग्य अपराधी का निर्देश— किसी भी अपराधी (हत्या करनेवाले को छोड़कर) को एक मास, तीन मास, छ मास, १ वर्ष या आजीवन भर कैद रखकर नीच कर्म (मल-मूत्रादि फिकवाना आदि) का दण्ड देना चाहिये किन्तु किसी को वध का दण्ड नहीं देना चाहिये ।

न हिंस्याच्च भूतानि त्विति जागर्ति वै श्रुतिः ॥ ९२ ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वधदण्डं त्यजेन्नृपः ।

वध की शिक्षा कदापि न देने का निर्देश— क्योंकि 'प्राणियों का वध नहीं करना चाहिये' ऐसी श्रुति का वचन (वेद का वचन) है। अतः राजा को अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक वध का दण्ड देना त्याग देना चाहिये ।

अवरोधाद् बन्धनेन ताडनेन च कर्षयेत् ॥ ९३ ॥
लोभान्न कर्षयेद्राजा धनं दण्डेन वै प्रजाम् ।

बल्कि वध दण्ड के बदले, हथकड़ी-बेड़ी के साथ कैद रखना, मारना-पीटना, पीड़ा पहुंचाना उचित है । और राजा को लोभवश धनदण्ड (जुर्माना करने) से प्रजा को पीड़ा न पहुँचानी चाहिये ।

नासहायास्तु पित्राद्या दण्ड्याः स्युरपराधिनः ॥ ९४ ॥
क्षमाशीलस्य वै राज्ञो दण्डग्रहणमीदृशम् ।

सहायहीन अपराधी के माता-पिता आदि को दण्ड न देने का निर्देश—