शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् १६५
(अपराध) करे तो इस भांति से दण्ड देना चाहिये कि—प्रथम मध्यम साहस दण्ड (५०० पैसों का), तदनन्तर दुगुना (१००० पैसों का), तिगुना (१५००), पश्चात् आजीवन बांधकर रखना। ये सब योग्यतानुसार करने चाहिये।
प्रथमं साहसं कुर्वन्नधमो दण्डमर्हति ।
अर्धं यथोक्तं द्विगुणं त्रिगुणं बन्धनं ततः ॥ ८३ ॥
अधम पुरुष यदि प्रथम साहस (अपराध) करे तो आधा प्रथम साहस दण्ड (१२५ पैसों का जुर्माना) उसके बाद पूर्ण दण्ड (२५०) पुनः द्विगुण (५०० पैसों का), पुनः त्रिगुण (७५० पैसों का) दण्ड उसके बाद जेल का दण्ड देना चाहिये।
मध्यमं साहसं कुर्वन्नधमो दण्डमर्हति ।
पूर्वसाहसमादौ तु यथोक्तं द्विगुणं ततः ॥ ८४ ॥
ततः संरोधनं नित्यं मार्गसंस्करणार्थकम् ।
मार्गों पर झाडू लगाने योग्य पुरुष के लक्षण— अधम पुरुष यदि मध्यम साहस (अपराध) करे तो उसे पहले प्रथम साहस दण्ड (२५० पैसों का), उसके बाद द्विगुण (५०० पैसों का) दण्ड, उसके बाद कैद तथा नित्य सड़क पर झाडू दिलाने का दण्ड देना चाहिये।
उत्तमं साहसं कुर्वन्नधमो दण्डमर्हति ॥ ८५ ॥
मध्यमं साहसं चादौ यथोक्तं द्विगुणं ततः ।
यावज्जीवं बन्धनं च नीचकर्मैव केवलम् ॥ ८६ ॥
अधम पुरुषों के बारम्बार अपराध करने पर दण्ड का प्रकार— अधम पुरुष यदि उत्तम साहस (अपराध) करे तो उसे प्रथम मध्यम साहस दण्ड (५०० पैसों का) देना चाहिये। उसके बाद द्विगुण दण्ड (२०० पैसों का) उसके बाद आजीवन जेल एवं केवल नीच कार्य (मल-मूत्रादि साफ कराने) का दण्ड देना चाहिये।
हरेत् पादं धनात्तस्य यः कुर्याद्धनगर्वतः ।
पूर्वं ततोऽर्धमखिलं यावज्जीवं तु बन्धनम् ॥ ८७ ॥
धनगर्व से अपराध करने पर दण्ड का निर्देश— जो धन के गर्व से अपराध करे उसे प्रथम बार उसके पास के धन से चौथाई धन दण्ड रूप में ले ले, उसके बाद यदि अपराध करे तो आधा उसके बाद सम्पूर्ण धन छीन ले, उसके बाद आजीवन जेल का दण्ड दे।
सहायगौरवाद् विद्यामदाच्च बलदर्पतः ।
पापं करोति यस्तं तु बन्धयेत् ताडयेत्सदा ॥ ८८ ॥