शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६४ | शुक्रनीतिः
करने पर उससे दूना ( १००० पैसों का जुर्माना ) करना चाहिये उसके बाद जेल भेज देना चाहिये । बुद्धिपूर्वनृघातेन विनैतद्दण्डकल्पनम् । उपरि लिखित दण्ड की व्यवस्था बुद्धिपूर्वक नरहत्या नहीं करनेवालो के लिये ही है, अन्य के लिये नहीं समझनी चाहिये । उत्तमत्वं मध्यमत्वं नीचत्वं चात्र कीर्त्यते ॥ ७७ ॥ गुणेनैव तु मुख्यं हि कुलेनापि धनेन च । यहाँ पर उत्तम, मध्यम तथा अधम की व्याख्या मुख्य रूपसे, अपराधी के गुण, कुल तथा धन के अनुसार ही समझनी चाहिये । प्रथमं साहसं कुर्वन् मध्यमो दण्डमर्हति ॥ ७८ ॥ धिग्दण्डमर्थदण्डं च पूर्णदण्डमनुक्रमात् । मध्यम पुरुष यदि प्रथम साहस ( अपराध ) करे तो उसे धिग्दण्ड ( तुम्हें धिक्कार है ऐसा वचन दण्ड ) देना चाहिये, उसके बाद प्रथम साहस दण्ड ( २५० पैसों का जुर्माना ) का आधा दण्ड ( १२५ पैसों का ) करना चाहिये । उसके बाद पूर्ण दण्ड ( २५० पैसों का ) अनुक्रम से अर्थात् अपराध के बारं बार करने या गौरव-लाघव के क्रम से करना चाहिये । द्विगुणं त्रिगुणं पश्चात् संरोधं नीचकर्म च ॥ ७६ ॥ संरोध और नीच कर्म के योग्य पुरुष के लक्षण—उसके बाद प्रथम साहस दण्ड ( २५० पैसों का ), दुगुना ( ५०० ) तिगुना ( ७५० ) उसके बाद कैद और नीच कर्म ( मल-मूत्रादि साफ करना आदि ) का अपराध के न्यूनाधिक्य के अनुसार दण्ड देना चाहिये । मध्यमं साहसं कुर्वन्मध्यमो दण्डमर्हति । पूर्वं साहसमादौ तु यथोक्तं द्विगुणं ततः ॥ ८० ॥ ताडनं बन्धनं पश्चात्पुरान्निर्वासनाङ्कने । शास्त्रोक्त दण्डनीय पुरुषों के लक्षण—मध्यम पुरुष यदि मध्यम साहस ( अपराध ) करे तो उसे प्रथम साहस दण्ड ( २५० पैसों का ) पुनः करने पर दूना ( ५०० पैसों का ) उसके बाद मारना-पीटना उसके बाद बांध रखना, पीछे से शहर से या राज्य से निकाल देना, दाग देना इस प्रकार से योग्यतानुसार दण्ड देना चाहिये । उत्तमं साहसं कुर्वन् मध्यमो दण्डमर्हति ॥ ८१ ॥ मध्यमं साहसं चादौ यथोक्तं तदनन्तरम् । द्विगुणं त्रिगुणं पश्चाद्यावज्जीवं तु बन्धनम् ॥ ८२ ॥ आजीवन बन्धन योग्य पुरुष के लक्षण—मध्यम पुरुष यदि उत्तम साहस