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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

चतुर्थाध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् १६५

(अपराध) करे तो इस भांति से दण्ड देना चाहिये कि—प्रथम मध्यम साहस दण्ड (५०० पैसों का), तदनन्तर दुगुना (१००० पैसों का), तिगुना (१५००), पश्चात् आजीवन बांधकर रखना। ये सब योग्यतानुसार करने चाहिये।

प्रथमं साहसं कुर्वन्नधमो दण्डमर्हति ।
अर्धं यथोक्तं द्विगुणं त्रिगुणं बन्धनं ततः ॥ ८३ ॥

अधम पुरुष यदि प्रथम साहस (अपराध) करे तो आधा प्रथम साहस दण्ड (१२५ पैसों का जुर्माना) उसके बाद पूर्ण दण्ड (२५०) पुनः द्विगुण (५०० पैसों का), पुनः त्रिगुण (७५० पैसों का) दण्ड उसके बाद जेल का दण्ड देना चाहिये।

मध्यमं साहसं कुर्वन्नधमो दण्डमर्हति ।
पूर्वसाहसमादौ तु यथोक्तं द्विगुणं ततः ॥ ८४ ॥
ततः संरोधनं नित्यं मार्गसंस्करणार्थकम् ।

मार्गों पर झाडू लगाने योग्य पुरुष के लक्षण— अधम पुरुष यदि मध्यम साहस (अपराध) करे तो उसे पहले प्रथम साहस दण्ड (२५० पैसों का), उसके बाद द्विगुण (५०० पैसों का) दण्ड, उसके बाद कैद तथा नित्य सड़क पर झाडू दिलाने का दण्ड देना चाहिये।

उत्तमं साहसं कुर्वन्नधमो दण्डमर्हति ॥ ८५ ॥
मध्यमं साहसं चादौ यथोक्तं द्विगुणं ततः ।
यावज्जीवं बन्धनं च नीचकर्मैव केवलम् ॥ ८६ ॥

अधम पुरुषों के बारम्बार अपराध करने पर दण्ड का प्रकार— अधम पुरुष यदि उत्तम साहस (अपराध) करे तो उसे प्रथम मध्यम साहस दण्ड (५०० पैसों का) देना चाहिये। उसके बाद द्विगुण दण्ड (२०० पैसों का) उसके बाद आजीवन जेल एवं केवल नीच कार्य (मल-मूत्रादि साफ कराने) का दण्ड देना चाहिये।

हरेत् पादं धनात्तस्य यः कुर्याद्धनगर्वतः ।
पूर्वं ततोऽर्धमखिलं यावज्जीवं तु बन्धनम् ॥ ८७ ॥

धनगर्व से अपराध करने पर दण्ड का निर्देश— जो धन के गर्व से अपराध करे उसे प्रथम बार उसके पास के धन से चौथाई धन दण्ड रूप में ले ले, उसके बाद यदि अपराध करे तो आधा उसके बाद सम्पूर्ण धन छीन ले, उसके बाद आजीवन जेल का दण्ड दे।

सहायगौरवाद् विद्यामदाच्च बलदर्पतः ।
पापं करोति यस्तं तु बन्धयेत् ताडयेत्सदा ॥ ८८ ॥

१६६ | शुक्रनीतिः

बन्धन तथा ताडन योग्य के लक्षण— जो सहायकों की श्रेष्ठता से पूर्व विद्या या बल के अहङ्कार से पाप (अपराध) करता है उसे सदा कैद में बन्द रखे तथा मारे-पीटे।

भार्या पुत्रश्च भगिनी शिष्यो दासः स्नुषाऽनुजः ।
कृतापराधास्ताड्यास्ते तनुरज्जुसुवेणुभिः ॥ ८९ ॥
पृष्ठतस्तु शरीरस्य नोत्तमाङ्गे कथञ्चन ।
अतोऽन्यथा तु प्रहरेच्चोरवद्दण्डमर्हति ॥ ९० ॥

पतली रस्सी या छड़ी आदि से मारने योग्य के लक्षण— अपनी स्त्री, पुत्र, बहन (छोटी), शिष्य (छात्र), दास, पुत्रवधू (पतोहू), छोटा भाई यदि अपराध करे तो इन्हें पतली रस्सी या छड़ी से अथवा पतली रस्सी वाले चाबुक से शरीर पर पीठ में मारना चाहिये किन्तु कभी भी शिर में नहीं मारना चाहिये, इससे अन्यथा यदि कोई मारता है तो उसे चोर की भांति दण्ड देना चाहिये ।

नीचकर्मकरं कुर्याद् बन्धयित्वा तु पापिनम् ।
मासमात्रं त्रिमासं वा षण्मासं वाऽपि वत्सरम् ॥ ९१ ॥
यावज्जीवं तु वा कश्चिन्न कश्चिद्वधमर्हति ।

नीच कर्म कराने योग्य अपराधी का निर्देश— किसी भी अपराधी (हत्या करनेवाले को छोड़कर) को एक मास, तीन मास, छ मास, १ वर्ष या आजीवन भर कैद रखकर नीच कर्म (मल-मूत्रादि फिकवाना आदि) का दण्ड देना चाहिये किन्तु किसी को वध का दण्ड नहीं देना चाहिये ।

न हिंस्याच्च भूतानि त्विति जागर्ति वै श्रुतिः ॥ ९२ ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वधदण्डं त्यजेन्नृपः ।

वध की शिक्षा कदापि न देने का निर्देश— क्योंकि 'प्राणियों का वध नहीं करना चाहिये' ऐसी श्रुति का वचन (वेद का वचन) है। अतः राजा को अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक वध का दण्ड देना त्याग देना चाहिये ।

अवरोधाद् बन्धनेन ताडनेन च कर्षयेत् ॥ ९३ ॥
लोभान्न कर्षयेद्राजा धनं दण्डेन वै प्रजाम् ।

बल्कि वध दण्ड के बदले, हथकड़ी-बेड़ी के साथ कैद रखना, मारना-पीटना, पीड़ा पहुंचाना उचित है । और राजा को लोभवश धनदण्ड (जुर्माना करने) से प्रजा को पीड़ा न पहुँचानी चाहिये ।

नासहायास्तु पित्राद्या दण्ड्याः स्युरपराधिनः ॥ ९४ ॥
क्षमाशीलस्य वै राज्ञो दण्डग्रहणमीदृशम् ।

सहायहीन अपराधी के माता-पिता आदि को दण्ड न देने का निर्देश—

चतुर्थोऽध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् १६७

अपराधी के सहायहीन पिता आदि को दण्ड नहीं देना चाहिये। क्षमाशील राजा को इसी प्रकार से अपराधी के लिये दण्ड देना उचित है।

नापराधं तु क्षमते प्रचण्डो धनहारकः ॥ ६५ ॥
नृपो यदा तदा लोकः क्षुभ्यते भिद्यते परैः।
अतः सुभागदण्डी स्यात् क्षमावान् रञ्जको नृपः ॥ ६६ ॥

राजा जब अपराधी को तीक्ष्ण दण्ड देनेवाला एवं धन हरण करनेवाला होकर अपराध को नहीं क्षमा करता है अर्थात् अनुचित दण्ड देता है तब प्रजा क्षुभित हो उठती है और उसे शत्रु लोग फोड़कर अपनी ओर कर लेते हैं, अतः राजा को जितना अपराध हो उतना ही विचार कर दंड देना चाहिये एवं क्षमाशील तथा प्रजा का अनुरञ्जन करनेवाला होना चाहिये ।

मद्यपः कितवः स्तेनो जारश्चण्डश्च हिंसकः ।
त्यक्तवर्णाश्रमाचारो नास्तिकः शठ एव हि ॥ ६७ ॥
मिथ्याभिशापकः कर्णेजपाथैदेशदूषकौ ।
असत्यवाङ् न्यासहारी तथा वृत्तिविघातकः ॥ ६८ ॥
अन्योदयासहिष्णुश्च ह्युत्कोचग्रहणे रतः ।
अकार्यकृतमित्राणां कार्याणां भेदकस्तथा ॥ ९९ ॥
अनिष्टवाक् परुषवाग् जलारामप्रबाधकः ।
नक्षत्रसूची राजद्विट् कुमन्त्री कूटकार्यवित् ॥ १०० ॥
कुवैद्यामङ्गलाशौचशीलो मार्गनिरोधकः ।
कुसाद्यूद्धतवेशश्च स्वामिद्रोही व्ययाधिकः ॥ १०१ ॥
अग्निदो गरदो वेश्यासक्तः प्रबलदण्डकृत् ।
तथा पाक्षिकसभ्यश्च बलाल्लिखितग्राहकः ॥ १०२ ॥
अन्यायकारी कलहशीले युद्धे पराङ्मुखः ।
साक्ष्यलोपी पितृमातृसतीस्त्रीमित्रद्रोहकः ॥ १०३ ॥
असूयकः शत्रुसेवी मर्मभेदी च वञ्चकः ।
स्वकीयद्विङ्गुप्तवृत्तिर्बुधलो ग्रामकण्टकः ॥ १०४ ॥
बिना कुटुम्बभरणात्तपोविद्यार्थिनः सदा ।
तृणकाष्ठादिहरणे शक्तः सन् भैक्ष्यभोजकः ॥ १०५ ॥
कन्याया अपि विक्रेता कुटुम्बवृत्तिहिंसकः ।
अधर्मा सूचकश्चापि राजानिष्टमुपेक्षकः ॥ १०६ ॥
कुलटा पतिपुत्रघ्नी स्वतन्त्रा वृद्धनिन्दिता ।
गृहकृत्योझिता नित्यं दुष्टाचारा प्रियस्नुषा ॥ १०७ ॥
स्वभावदुष्टानेतान् हि ज्ञात्वा राष्ट्राद् विवासयेत् ।

१६८शुक्रनीतिः

देश-निष्कासन योग्य अपराधियों के लक्षण—मद्यप (शराबी), धूर्त, चोर, जार (परस्त्रीगामी), अत्यन्त क्रोधी, हिंसा करनेवाला (खूनी), वर्ण (ब्राह्मणादि ४ वर्ण) तथा आश्रम (ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, संन्यास) के अनुकूल आचारों का त्याग करनेवाला, नास्तिक (परलोकादि को नहीं माननेवाला), खल, झूठा दोषारोप करनेवाला, एक को-दूसरे से आपस में कह सुनकर विरोध करानेवाला, अच्छे साधु पुरुषों को दोष लगानेवाला एवं देवताओं को अपवित्र करनेवाला अथवा मूर्त्ति को तोड़नेवाला, झूठ बोलनेवाला, धरोहर को हजम करनेवाला, किसी की जीविका को नष्ट करनेवाला, दूसरी की उन्नति को नहीं सहन करनेवाला, घूस लेने में तत्पर, नहीं करने योग्य बुरे कार्यों को करनेवाला, किसी के गुप्त विचार को प्रकट करनेवाला, किसी के कार्यों को नष्ट करनेवाला, अप्रिय (अनुचित) वचन बोलनेवाला, कठोरभाषी, जलाशय या बगीचे को हानि पहुँचानेवाला, झूठ-मूठ का बना हुआ ज्योतिषी (भाग्य फल बतानेवाला), राजद्रोही, बुरी सलाह देनेवाला (दुष्टमन्त्री), कूट कार्य (जालसाजी) जाननेवाला, कुवैद्य (अनाड़ी वैद्य), अभद्र तथा अपवित्र आचार तथा वेश भूषा रखनेवाला, रास्ता रूधनेवाला, ठीक २ गवाही नहीं देनेवाला, उद्धत वेश रखनेवाला, अपने स्वामी के साथ द्रोह रखनेवाला, अनाप-शनाप व्यय करनेवाला, आग लगानेवाला, विष देनेवाला, वेश्या में आसक्त, अत्यन्त उग्र दंड देनेवाला, अफसर, न्यायालय में सदस्य (जूरी) होकर पक्षपात करनेवाला, बलपूर्वक लिखित पत्र को अन्याय से ग्रहण करनेवाला, अन्याय करनेवाला, झगड़ालू, युद्ध से भाग आनेवाला, गवाही को नहीं माननेवाला या उचित गवाही नहीं देनेवाला, पिता-माता-सती स्त्री-मित्र इनके साथ द्रोह करनेवाला, दूसरे के गुणों में भी दोषारोप करनेवाला, राजा के शत्रुओं की सेवा करनेवाला, मर्मान्तक पीड़ा पहुँचानेवाले वचनों को बोलनेवाला या कार्यों को करनेवाला, ठगनेवाला, आत्मीयों के साथ द्वेष करनेवाला, गुप्त व्यापार (ब्लैक मार्केटिंग-चोर बाजारी) करनेवाला, वृषल (किसी भी धर्म पर आघात पहुँचानेवाला), ग्रामवासियों को पीड़ा पहुंचानेवाला अर्थात् उनके कार्यों में बाधा पहुँचानेवाला, गृहस्थ होकर भी कुटुम्ब का भरण-पोषण न करके सदा तपस्या या विद्या पढ़नेवाला, तृण (घास), काष्ठ आदि लाकर आजीविका चलाने की सामर्थ्य रहने पर भी भिक्षा वृत्ति से पेट पालनेवाला, कन्या को भी बेचनेवाला, कुटुम्ब की आजीविका को घटानेवाला, अधार्मिक (अपने धर्म पर नहीं चलनेवाला), चुगुली करनेवाला अथवा अधर्म की सूचना देनेवाला (पापवार्त्ता करनेवाला), राजा के अनिष्ट की पर्वाह नहीं करनेवाला, ऐसे पुरुषों एवं कुलटा, पति पुत्र की हत्या करनेवाली,

चतुर्थोऽध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् १६६

स्वतन्त्र होकर घूमनेवाली, वृद्धजनों से निन्दिता, गृह के कार्यों को छोड़ देनेवाली (न करनेवाली), नित्य दुष्ट आचरण करनेवाली, गुरुजनों के साथ अप्रिय व्यवहार करनेवाली, पतोहू या पतोहुओं के साथ अप्रिय व्यवहार करनेवाली ऐसी स्त्रियों को स्वभावतः दुष्ट जानकर राजा अपने राज्य से निकाल दे।

द्वीपे निर्वासितव्यास्ते बद्धा दुर्गोदरेऽथवा ॥ १०८ ॥
मार्गसंस्करणे योज्याः कदन्नन्यूनभोजनाः।
तत्तज्जात्युक्तकर्माणि कारयीत च तैनृपः ॥ १०९ ॥

मार्ग संरक्षण योग्य का निर्देश— अथवा उक्त मद्यप आदि लोगों को किसी टापू में ले जाकर रखना चाहिये किंवा किसी—किले के भीतर कैद करके रखना चाहिये और वहां पर उन सबों से रास्ता साफ कराना चाहिये एवं खराब अन्न तथा थोड़ी मात्रा में उन्हें भोजन देना चाहिये। और उन सबों से उनके जाति के अनुकूल कर्म राजा को कराना चाहिये।

एवंविधानसाधूंश्च संसर्गेण च दूषितान्।
दण्डयित्वा च सन्मार्गे शिक्षयेत्तान्नृपः सदा ॥ ११० ॥

संसर्ग से दूषित को दण्ड देकर सन्मार्ग की शिक्षा देने का निर्देश— और राजा सदा इस प्रकार से पूर्वोक्त दुष्ट पुरुषों को एवं उनके साथ संसर्ग करने से दुष्ट हुये पुरुषों को दण्ड देकर सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा दे।

राज्ञो राष्ट्रस्य विकृतिं तथा मन्त्रिगणस्य च।
इच्छन्ति शत्रुसम्बन्धाद्ये तान् हन्याद्धि द्राङ्नृपः ॥ १११ ॥

राजादिकों से बिगाड़ करवानेवाले को शीघ्र नष्ट कर देने का निर्देश— और जो राजा राज्य या मन्त्री लोगों को शत्रु से मिलकर हानि पहुंचाना चाहते हों उन्हें राजा शीघ्र वध करने का दण्ड दे।

नेच्छेच्च युगपद्ध्वंसं गणदौष्ट्ये गणस्य च।
एकैकं घातयेद्राजा वत्सोऽश्नाति यथा स्तनम् ॥ ११२ ॥

गणों की दुष्टता करने पर उपाय का निर्देश— यदि बहुत से गण (समूह) दुष्ट हो गये हों तो प्रत्येक गण का एक साथ ही नाश करने की इच्छा राजा को नहीं करनी चाहिये बल्कि उनमें से एक-एक को क्रम से नष्ट करना चाहिये। जैसे बछड़ा एक-एक करके क्रम से स्तनों को पीता है न कि एक साथ ही।

अधर्मशीलो नृपतिर्यदा तं भीषयेज्जनः।
धर्मशीलातिबलवद्रिपोराश्रयतः सदा ॥ ११३ ॥

अधर्मशील राजा को सदैव भय दिलाने को प्रजा के लिये निर्देश— जब राजा अधर्म पर चलनेवाला हो जाय तो प्रजा 'धर्मशील, बलवान् उस राजा

२०० शुक्रनीतिः

के शत्रु का आश्रय लेने' का भय उसे दिखा कर सदा डराना चाहिये। अर्थात् यदि आप अधर्म पर चलना नहीं छोड़ेंगे तो हम सब प्रजा आपका साथ छोड़कर आपके शत्रु धर्मशील बलवान् से मिल जायँगे ऐसा कहकर उस राजा को डराना चाहिये।

यावत्तु धर्मशीलः स्यात् स नृपस्तावदेव हि । अन्यथा नश्यते लोको द्राङ्नृपोऽपि विनश्यति ॥ ११४ ॥

अधर्मशील राजा और प्रजा के तत्काल नष्ट हो जाने का निर्देश—जब तक राजा धर्मशील बना रहता है अर्थात् प्रजा के साथ धर्मपूर्वक व्यवहार करता है तभी तक वह राजा बना रहता है। अन्यथा (यदि ऐसा न हो तो) राजा के अधर्मशील होने पर उसकी प्रजा एवं स्वयं राजा भी शीघ्र नष्ट हो जाता है अर्थात् उसका राज्य नष्ट हो जाता है।

मातरं पितरं भार्यां यः संत्यज्य विवर्त्तते । निगडैर्बन्धयित्वा तं योजयेन्मार्गसंस्कृतौ ॥ ११५ ॥ तद्भृत्यथं तु सन्दद्यात्तेभ्यो राजा प्रयत्नतः ।

माता आदि के भरण-पोषण त्याग करनेवाले के लिये दण्ड का निर्देश— जो कर्मचारी माता, पिता और स्त्री (पत्नी) इनका भरण-पोषण करना छोड़कर मनमाना अपना व्यवहार रखता है, उसे हथकड़ी-बेड़ी डालकर कैद रखना चाहिये एवं उससे रास्ता साफ़ करने या बनाने का कार्य कराना चाहिये। और उसके तनख्वाह का आधा द्रव्य उन सबों को प्रयत्नपूर्वक राजा को देना चाहिये।

विद्यात् पणसहस्रं तु दण्ड उत्तमसाहसः ॥ ११६ ॥ दशमाषमितं ताम्रं तत्पणो राजमुद्रितम् । वराटिसार्धशतकमूल्यः कार्षापणश्च सः ॥ ११७ ॥

उत्तमादि साहस दण्ड के लक्षण एवं पण आदि के लक्षण—१००० पणों (पैसों) का जुर्माना उत्तम साहस दण्ड कहलाता है। राजा के द्वारा स्वीकृत चिह्न से अंकित १० मासे भर तांबे के सिक्के को 'पण' (पैसा) कहते हैं। और १५० कौड़ियों के मूल्य के उसी (पण) को 'कार्षापण' भी कहते हैं।

तदर्धश्च तदर्धश्च मध्यमः प्रथमः क्रमात् । प्रथमे साहसे दण्डः प्रथमश्च क्रमात् परौ ॥ ११८ ॥ मध्यमे मध्यमो धार्य्यश्चोत्तमे तूत्तमो नृपैः ।

और क्रम से उसके (१०००) आधे (५००) पणों के जुर्माने को मध्यम तथा उसके आधे (२५०) पणों के जुर्माने को प्रथम साहस दण्ड कहते हैं। प्रथम श्रेणी के साहसों (अपराधों) में प्रथम साहसदण्ड (२५०

चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०१

पणों का), मध्यम साहसों में मध्यमसाहस दण्ड (५०० पणों का) एवं उत्तम साहसों में उत्तम साहस दण्ड (१००० पणों का) विधान अपराधियों के लिये राजा को देना चाहिये।

सोपायाः कथिता मिश्रे मित्रोदासीनशत्रवः ॥ ११६ ॥
इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य सुहृदादिलक्षणप्रकरणम्।

इस प्रकार से इस मिश्र अध्याय में सामादिक उपायों के साथ मित्र, उदासीन तथा शत्रु के विषय में कहा गया।

इस प्रकार हिन्दीव्याख्या में चतुर्थाध्याय का सुहृदादिप्रकरण समाप्त।


अथ चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम्

अथ कोशप्रकरणं ब्रूवे मिश्रे द्वितीयकम्।
एकार्थसमुदायो यः स कोशः स्यात् पृथक् पृथक् ॥ १ ॥
कोश के लक्षण— अब 'मिश्र' अध्याय के अन्तर्गत दूसरा 'कोशप्रकरण' का वर्णन करता हूँ। किसी भी एक (समान) वस्तुओं के समूह को 'कोश' कहते हैं वह पृथक् २ अनेक प्रकार का होता है।

येन केन प्रकारेण धनं सञ्चिनुयान्नृपः।
तेन संरक्षयेद्राष्ट्रं बलं यज्ञादिकाः क्रियाः ॥ २ ॥
राजा को जिस किसी भी प्रकार से धन एकत्र करना चाहिये। और उस धन से राष्ट्र (राज्य), सेना तथा यज्ञादि कर्मों की रक्षा करनी चाहिये।

बलप्रजारक्षणार्थं यज्ञार्थं कोशसंग्रहः।
परत्रेह च सुखदो नृपस्यान्यश्च दुःखदः ॥ ३ ॥
सुखप्रद कोश का निर्देश— अतः सेना तथा प्रजा की रक्षा के लिये एवं यज्ञ के लिये जो कोश का संग्रह किया जाता है वह राजा के लिये इस लोक तथा परलोक दोनों के लिये सुखप्रद होता है, इससे भिन्न कार्य के लिये किया हुआ कोशसंग्रह दुःखप्रद होता है।

स्त्रीपुत्रार्थं कृतो यश्च स्वोपभोगाय केवलम्।
नरकायैव स ज्ञेयो न परत्र सुखप्रदः ॥ ४ ॥
दुःखप्रद कोश का निर्देश— जो कोशसंग्रह स्त्री-पुत्र के लिये तथा केवल अपने उपभोग के लिये किया जाता है उसे केवल नरक देनेवाला ही समझना चाहिये क्योंकि वह परलोक में सुखप्रद नहीं होता है।

२०२शुक्रनीतिः

अन्यायेनार्जितो यस्माद् येन तत्पापभाक् च सः।
सुपात्रतो गृहीतं यद्दत्तं वा वर्धते च यत् ॥ ५ ॥
**अन्यायोपार्जित कोष के दुष्टफलों का निर्देश—**जिसने अन्याय से धन उपार्जन किया है अतः वह उस (अन्यायोपार्जन) के पाप का फल भोगने-वाला होता है और जो धन सुपात्र से लिया जाता है या सुपात्र को दिया जाता है वह धन बढ़ता है।

स्वागमी सद्व्ययी पात्रमपात्रं विपरीतकम्।
अपात्रस्य हरेत् सर्वं धनं राजा न दोषभाक् ॥ ६ ॥
**सुपात्र तथा अपात्र के लक्षणादि का निर्देश—**जो न्याय से धन का उपार्जन करनेवाला तथा सत्कार्य में व्यय करनेवाला होता है वह 'सुपात्र' कहलाता है। इससे विपरीत अर्थात् अन्याय से धनोपार्जन तथा कुमार्ग में धन व्यय करनेवाला 'अपात्र' कहलाता है अतः यदि अपात्र के सम्पूर्ण धन को हरण करनेवाला राजा हो तो दोषभागी नहीं होता है।

अधर्मशीलनृपतेः सर्वतः संहरेद्धनम्।
छलाद् बलाद्दस्युवृत्त्या परराष्ट्राद्धरेत्तथा ॥ ७ ॥
**अधर्मशील राजा के धन को हर लेने का निर्देश—**राजा को अधर्मशील राजा के पास से सभी प्रकारों से अर्थात् चाहे छल, बल या डाकुओं की वृत्ति (डाका डालने) से धन हरण करना चाहिये। तथा इसी तरह शत्रु के राज्य से भी धनहरण करना चाहिये।

त्यक्त्वा नीतिबलं स्वीयप्रजापीडनतो धनम्।
सञ्चितं येन तत्तस्य सराज्यं शत्रुसाद्भवेत् ॥ ८ ॥
**शत्रु के अधीन राज्य होने के कारणों का निर्देश—**जिसने नीति-बल का परित्याग करके अर्थात् अन्याय से अपनी प्रजा को पीड़ा पहुँचाकर धन संचय किया है उसका वह धन राज्य के साथ साथ शत्रु के अधीन हो जाता है।

दण्डभूभागशुल्कनामाधिक्यात् कोशवर्धनम्।
अनापदि न कुर्यात् तीर्थदेवकरग्रहात् ॥ ९ ॥
**देवोत्तर संपत्ति पर कर लगाकर धन न बढ़ाने का निर्देश—**बिना विशेष आपत्ति पड़े प्रजा के ऊपर अधिक जुर्माना, मालगुजारी या चुंगी बढ़ाकर एवं तीर्थ स्थान तथा देवोत्तर संपत्ति पर कर लगाकर राजा को अपना कोश (खजाना) नहीं बढ़ाना चाहिए।

यदा शत्रुविनाशार्थं बलसंरक्षणोद्यतः।
विशिष्टदण्डशुल्कादि धनं लोकात्तदा हरेत् ॥ १० ॥
**आपत्ति में अधिक कर बढ़ाने का निर्देश—**जिस समय राजा शत्रु का

चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०३

चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०३

विनाश करने के लिये सेना की रक्षा करने में तत्पर हो उस समय विशेष प्रकार का अधिक जुर्माना या चुंगी लगाकर प्रजा से धन का हरण करे तो उचित है।

धनिकेभ्यो भृतिं दत्त्वा स्वापत्तौ तद्धनं हरेत्। राजा स्वापत्समुत्तीर्णस्तत् स्वं दद्यात् सवृद्धिकम् ॥ ११ ॥ आपत्तिरहित होने पर सूद सहित धन वापस करने का निर्देश—और अपने ऊपर आपत्ति आ पड़ने पर 'मैं सूद दूंगा' ऐसी प्रतिज्ञा कर धनिकों से उसके धन को जबरदस्ती राजा को ले लेना चाहिये। तथा जब वह आई हुई अपनी आपत्ति को पार कर जाय तब उस लिये हुये धन को सूदसहित उस (धनिक) को लौटा देना चाहिये।

प्रजाऽन्यथा हीयते च राज्यं कोशो नृपस्तथा । हीनाः प्रबलदण्डेन सुरथाद्या नृपा यतः ॥ १२ ॥ प्रबल दण्ड से अनिष्ट फल—अन्यथा अर्थात् धनाभाव से सेना की रक्षा न कर सकने से प्रजा, राज्य, कोश तथा राजा क्षीण हो जाता है। क्योंकि प्रबल दंड के करने से सुरथ आदि राजा लोग हीन अर्थात् राज्यच्युत हो गये।

दण्डभूभागशुल्कैस्तु बिना कोशाद् बलस्य च । संरक्षणं भवेत् सम्यग् यावद्विंशतिवत्सरम् ॥ १३ ॥ तथा कोशस्तु संधायैः स्वप्रजारक्षणक्षमः । कोश संग्रह करने का प्रमाण—बिना जुर्माना, मालगुजारी तथा चुंगी से प्राप्त धन के भी केवल राजा के कोश से ही २० वर्ष तक सेना की रक्षा भली भांति जितने से हो सकता है उतने कोश का तथा अपनी प्रजा की रक्षा के लिये उपयुक्त संग्रह करना उचित है।

बलमूलो भवेत् कोशः कोशमूलं बलं स्मृतम् ॥ १४ ॥ बलसंरक्षणात् कोशराष्ट्रवृद्धिरिरिक्षयः । जायते तत्त्रयं स्वर्गः प्रजासंरक्षणेन वै ॥ १५ ॥ प्रजा-संरक्षण के फल—कोश का मूल सेना है अर्थात् सेना के द्वारा कोश का संग्रह होता है, और सेना का मूल कोश है अर्थात् कोश के द्वारा सेना का संग्रह होता है, और सेना तथा कोश की रक्षा करने से कोश तथा राष्ट्र (राज्य) की वृद्धि एवं शत्रुओं का नाश होता है और प्रजा की रक्षा करने से पूर्वोक्त कोश तथा राष्ट्र की वृद्धि एवं शत्रु नाश ये तीनों होते हैं और अन्त में स्वर्ग भी मिलता है।

यज्ञार्थं द्रव्यमुत्पन्नं यज्ञः स्वर्गसुखायुषे ।

२०४शुक्रनीतिः

अर्यंभावो बलं कोशो राष्ट्रवृद्धयै त्रयं स्त्रिदम् ॥ १६ ॥
**राष्ट्रवृद्धि के तीन कारण—**यज्ञ के लिये द्रव्य (धन) उत्पन्न हुआ है और यज्ञ स्वर्ग सुख एवं आयु की वृद्धि के लिये है, और शत्रु का अभाव, सेना, कोष ये तीनों राष्ट्र की वृद्धि के लिये हैं।

तद्बुद्धिर्नीतिनैपुण्यात् क्षमाशीलनृपस्य च ।
जायतेऽतो यतेतैव यावद्बुद्धिबलोदयम् ॥ १७ ॥
**नीति-निपुणता से कोशवृद्धि का यत्न करने का निर्देश—**क्षमाशील राजा की नीतिसंबन्धी निपुणता से ही उपर्युक्त विषयों की वृद्धि होती है अतः जितना बुद्धिबल हो उतना लगाकर वृद्धि के लिये प्रयत्न करना चाहिये।

मालाकारस्य वृत्त्यैव स्वप्रजारक्षणेन च ।
शत्रुं हि करदीकृत्य तद्धनैः कोशवर्धनम् ॥ १८ ॥
करोति स नृपः श्रेष्ठो मध्यमो वैश्यवृत्तितः ।
अधमः सेवया दण्डतीर्थदेवकरग्रहैः ॥ १९ ॥
**श्रेष्ठादिनृप के ३ लक्षण—**जो माली की भांति व्यवहार रखकर अर्थात् अपने बाग के वृक्षों को सींच कर जैसे माली उसकी रक्षा करता है उसी भांति प्रजा की रक्षा करने के साथ-साथ शत्रु को कर (मालगुजारी) देनेवाला बना-कर उनके धनों से कोश को बढ़ाता है वह नृप श्रेष्ठ कहलाता है, जो वैश्य-वृत्ति व्यवसाय आदि से कोश बढ़ाता है वह मध्यम, एवम् सेवा से तथा जुर्माना, तीर्थ स्थान तथा देवमन्दिरों पर कर लगाकर जो कोश बढ़ाता है वह अधम राजा कहलाता है।

प्रजा हीनधना रक्ष्या भृत्या मध्यधनाः सदा ।
यथाधिकम् प्रतिभुवोऽधिकद्रव्यास्तथोत्त्माः ॥ २० ॥
हीन धन तथा मध्यम धनवाली प्रजा की रक्षा वेतन देकर राजा को स्वामी की भांति करनी चाहिये। तथा अधिक धनवाली उत्तम प्रजा की रक्षा जामिनदार होकर करनी चाहिये।

धनिकाश्चोत्तमधना न हीना नाधिका नृपैः ।
क्योंकि उत्तम धनवाली धनिक प्रजा राजा से न हीन और न अधिक अर्थात् राजतुल्य होती हैं।

द्वादशाब्दप्रपूरं यद्धनं तन्नीचसंज्ञकम् ॥ २१ ॥
पर्याप्तं षोडशाब्दानां मध्यमं तद्धनं स्मृतम् ।
त्रिंशदब्दप्रपूरं स्यात् कुटुम्बस्योत्तमं धनम् ॥ २२ ॥
**नीचादि धन के लक्षण—**जो धन १२ वर्ष तक परिवार की रक्षा करने लायक होता है वह 'नीच' संज्ञक, जो १६ वर्ष तक रक्षा करने योग्य होता है

चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २०५

चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २०५

वह 'मध्यम' एवं जो १० वर्ष तक परिवार की रक्षा करने योग्य होता है वह 'उत्तम' संज्ञक धन होता है ।

क्रमादर्धं रक्षेद्येद्वा स्वापत्तौ नृप एषु वै ।

अपने ऊपर आपत्ति आने पर राजा नीचादि क्रम से अपने धन को इन सबों के पास रक्षार्थ रख दे ।

मूलैरर्थ्यं वहन्त्यन्यैर्धनं बुद्ध्या वणिजः क्वचित् ॥ २३ ॥
विक्रीणन्ति महार्घे तु हीनार्घे सञ्चयन्ति हि ।

व्यवसायी ( व्यापारी ) लोग मुख्यभूत मूल धन से व्यापार करते हैं अर्थात् वस्तुओं का खरीदना-बेचना रूप व्यापार करते हैं केवल सूद पर अपना सारा मूलधन नहीं लगाते हैं और वे महंगी होने पर खरीदी वस्तु को बेचते हैं तथा सस्ती होने पर वस्तु खरीद कर संचय करते हैं ।

व्यवहारे धृतं वैश्यैस्तद्धनेन विना सदा ॥ २४ ॥
अन्यथा स्वप्रजातापो नृपं दहति सान्वयम् ।

प्रजा के सन्ताप से सवंश राजा के नाश का निर्देश— और व्यवहार ( क्रय-विक्रय ) के लिये रखी हुई वस्तुओं को धन ( मूल्य ) बिना दिये वैश्यों से सदा राजा को जबर्दस्ती नहीं लेना चाहिये । यदि राजा बिना मूल्य दिये ले लेता है तो उससे उत्पन्न हुई प्रजा की सन्तापरूपी अग्नि वंश के सहित उस राजा को जला देती है ।

धान्यानां संग्रहः कार्यो वत्सरत्रयपूर्तिदः ॥ २५ ॥
तत्तत्काले स्वराष्ट्रार्थं नृपेणात्महिताय च ।
चिरस्थायी समृद्धानामधिको वाऽपि चेष्यते ॥ २६ ॥

धान्य-संग्रह करने के प्रमाण का निर्देश— राजा को अपने कल्याण के लिये और राज्य की रक्षा के लिये समय-समय पर तीन वर्ष तक खाने के लिये पर्याप्त धान्यों का संग्रह कर लेना चाहिये । और ऐश्वर्यशाली लोगों के लिये उससे भी अधिक कालतक कार्य चलने लायक अधिक धान्य का संग्रह करना उचित होता है ।

सुपुष्टं कान्तिमज्जातिश्रेष्ठं शुष्कं नवीनकम् ।
ससुगन्धवर्णरसं धान्यं संवीक्ष्य रक्षयेत् ॥ २७ ॥
सुसमृद्धं चिरस्थायी महार्घमपि नान्यथा ।

संग्रह योग्य धान्य आदि की परीक्षा का निर्देश— अच्छी तरह से पका हुआ, उज्ज्वल, अच्छी जाति का, सूखा हुआ, नवीन, सुगन्ध, वर्ण तथा रस ( स्वाद ) से युक्त, सुन्दर एवं बहुत कालतक ठहरनेवाला, ऐसे धान्य को अच्छी तरह से देखकर यदि अधिक मूल्य का भी हो तो लेकर रखना उचित है । यदि इससे अन्यथा हो तो उस धान्य का संग्रह नहीं करना चाहिये ।

२०६ | शुक्रनीतिः

विषवह्निहिमव्याप्तं कीटजुष्टं न धारयेत् ॥ २८ ॥ निःसारतां न हि प्राप्तं व्यये तावन्नियोजयेत् ।

जो विष, अग्नि तथा पाला से खराब हो गया हो एवं जिसमें कीड़ा पड़ा हो ऐसे धान्यों का संग्रह नहीं करना चाहिये और जब तक निःसार नहीं हो तभी तक धान्यों का व्यय करना चाहिये अर्थात् निःसार होने पर उसे फेंक देना चाहिये ।

व्ययीभूतं तु यद् दृष्ट्वा तत्तुल्यं तु नवीनकम् ॥ २९ ॥ गृह्णीयात् सुप्रयत्नेन वत्सरे वत्सरे नृपः ।

राजा प्रति वर्ष जो धान्य व्यय करने से चुक जाय उनके स्थान पर उसी जाति के दूसरे नये धान्य यत्नपूर्वक लाकर रख दे ।

ओषधीनां च धातूनां तृणकाष्ठादिकस्य च ॥ ३० ॥ यन्त्रशस्त्राग्नचूर्णभाण्डादेर्वाससां तथा । यद्यच्च साधकं द्रव्यं यद्यत्कार्ये भवेत् सदा ॥ ३१ ॥ संग्रहस्तस्य तस्यापि कर्तव्यः कार्यसिद्धयेः ।

ओषधि आदि सब वस्तुओं को संचय करने का निर्देश—ओषधि ( धान्यादि ), धातु ( खान से उत्पन्न पदार्थ ), तृणकाष्ठ आदि, यन्त्र ( मशीन ), अस्त्र, शस्त्र, बारूद, बर्तन, वस्त्र इन सबों के मध्य में जिन २ कार्यों के लिये जो २ द्रव्य उपयोगी हों उनका संग्रह करना राजा के लिये उचित है क्योंकि उनसे समय पर कार्य की सिद्धि होती है ।

संरक्षयेत् प्रयत्नेन संगृहीतं धनादिकम् ॥ ३२ ॥ अर्जने तु महद् दुःखं रक्षणे तच्चतुर्गुणम् ।

संगृहीत धन की यत्न से रक्षा करने का निर्देश—संग्रह किये हुये धान्यादि की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये । क्योंकि इनके संग्रह करने में बहुत दुःख उठाना पड़ता है और उससे चौगुना दुःख उनकी रक्षा करने में उठाना पड़ता है ।

क्षणं चोपेक्षितं यत्तद्विनाशं द्राक् समाप्नुयात् ॥ ३३ ॥

क्षणभर भी रक्षा करने में जिसकी उपेक्षा की जाती है वह शीघ्र नष्ट हो जाता है ।

आर्जकस्यैव दुःखं स्यात्तथाऽर्जितविनाशने । स्त्रीपुत्राणामपि तथा नान्येषां तु कथं भवेत् ॥ ३४ ॥

और अर्जित ( संगृहीत ) वस्तु के नष्ट हो जाने पर उपार्जन ( संग्रह ) करनेवाले को ही दुःख होता है स्त्री-पुत्रादिकों को वैसा नहीं होता है फिर अन्य लोगों को क्यों दुःख होगा ?

चतुर्थोऽध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०७

स्वकार्ये शिथिलो यः स्यात् किमन्ये न भवन्ति हि ।
जागरूकः स्वकार्ये यस्तत्सहायाश्च तत्समाः ॥ ३५ ॥

स्वकार्य में सदा सजग रहने का निर्देश— जो अपने ही कार्य में स्वयं शिथिल (पूर्ण रूप से नहीं तत्पर) रहता है तो उसके सहायक अन्य लोग उस कार्य में क्यों नहीं शिथिल होंगे ? अर्थात् अवश्य होंगे। क्योंकि अपने कार्य में जो जागरूक (दृढ़ तत्पर) रहता है तो उसके सहायक भी उसी के समान उस कार्य में जागरूक रहते हैं।

यो जानात्यर्जितुं सम्यगर्जितं न हि रक्षितुम् ।
नातः परतरो मूर्खो वृथा तस्यार्जनश्रमः ॥ ३६ ॥

संचय की रक्षा न कर सकने पर मूर्खता होने का निर्देश— जो उपार्जन करना तो अच्छी तरह से जानता है किन्तु उसकी अच्छी तरह रक्षा करना नहीं जानता है। उससे बढ़कर मूर्ख कोई दूसरा नहीं है क्योंकि उसका उपार्जन करने का श्रम वृथा हो जाता है।

एकस्मिन्नधिकारे तु यो द्वावधिकरोति सः ।
मूर्खो जीवद्-द्विभार्यश्च ह्यतिविश्रम्भवांस्तथा ॥ ३७ ॥
महाधनाशो रचलसः स्त्रीभिनिर्जित एव हि ।
तथा यः साक्षितां पृच्छेच्चौरजाराततायिषु ॥ ३८ ॥

मूर्ख के लक्षण— जो एक अधिकार (कार्यभार) रहने हुये भी दो अधिकारों पर अधिकार रखता है, जो स्त्री के जीते रहते दूसरी शादी करता है, जो अत्यन्त दूसरे पर विश्वास रखता है, जो महान् धन की आशा रखते हुये आलसी रहता है, जो स्त्री के अधीन रहता है, तथा जो चोर, परस्त्रीगामी, आततायी के विषय में साक्षी (गवाही) मानता है अथवा उनसे गवाह मांगता है वह मूर्ख है।

संरक्षयेत् कृपणवत् काले दद्याद्विरक्तवत् ।
मूर्खत्वमन्यथा याति स्वधनव्ययतोऽपि च ॥ ३९ ॥

कृपण की भांति धन की रक्षा करे और समय आने पर विरक्त की भांति उसे दे देवे, अन्यथा (इससे विपरीत होने पर) अपने धन के व्यय करने पर मूर्खता को प्राप्त होता है।

वस्तुयाथात्म्यविज्ञाने स्वयमेव यतेत् सदा ।
परीक्षकैः स्वयं राजा रत्नादीन् वीक्ष्य रक्षयेत् ॥ ४० ॥

राजा को परीक्षकों से स्वयं रत्न की परीक्षा कराने का निर्देश— प्रत्येक वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप जानने के लिये स्वयं सदा यत्न करना चाहिये।

२०८ | शुक्रनीतिः

अतः राजा स्वयं परीक्षकों (रत्नपारखियों) के द्वारा परीक्षा करके रत्नों का संग्रह करे।

वज्रं मुक्ता प्रबालं च गोमेदश्चेन्द्रनीलकः ।
वैदूर्यः पुष्परागश्च पाचिर्माणिक्यमेव च ॥ ४१ ॥
महारत्नानि चैतानि नव प्रोक्तानि सूरिभिः ।

हीरा आदि नव महारत्नों का निर्देश— हीरा, मोती, मूंगा, गोमेद (लहसुनिया), नीलम, वैदूर्य, पुखराज, पन्ना, लाल (मानिक), ये ९ महारत्न विद्वानों द्वारा कहे गये हैं।

रवेः प्रियं रक्तवर्णं माणिक्यं त्विन्द्रगोपरुक् ॥ ४२ ॥
रक्तपीतसितश्यामच्छविर्मुक्ता प्रिया विधोः ।
सपीतरक्तरुग्भौमप्रियं विद्रुममुत्तमम् ॥ ४३ ॥
मयूरचाषपत्राभा पाचिर्बुधहिता हरित् ।

नवरत्नों के वर्ण और नवग्रहों का निर्देश— बीरबहूटी कीड़े की भांति लाल रंग का माणिक (लाल) होता है जो सूर्य को प्रिय है। लाल, पीली, श्वेत तथा श्याम वर्ण की कान्तिवाली मोती होती है जो चन्द्रमा को प्रिय है। पीली तथा लालकान्ति से युक्त उत्तम मूंगा होता है जो मंगलग्रह को प्रिय है। मयूर तथा चास पक्षी के पंख के समान कान्तिवाला पन्ना हरा रङ्ग का होता है जो बुधग्रह को प्रिय होता है।

स्वर्णच्छविः पुष्परागः पीतवर्णो गुरुप्रियः ॥ ४४ ॥
अत्यन्तविशदं वज्रं तारकाभं कवेः प्रियम् ।
हितः शनेरिन्द्रनीलो ह्यसितो घनमेघरुक् ॥ ४५ ॥
गोमेदः प्रियकृद्राहोरीषत्पीतारुणप्रभः ।
ओतवद्याभश्चलत्तन्तुर्वैदूर्यः केतुप्रीतिकृत् ॥ ४६ ॥

सोना के समान कान्तिवाला पीले वर्ण का पुखराज होता है जो गुरुग्रह को प्रिय होता है। अत्यन्त स्वच्छ तारा की भांति चमकनेवाला हीरा होता है जो शुक्रग्रह को प्रिय है। घने बादल के समान कान्तिवाला नीले रङ्ग का नीलम होता है जो शनिग्रह को प्रिय है। कुछ पीली तथा लाल कान्ति से युक्त लहसुनिया होता है जो राहु को प्रिय है। बिलाव की आंखों के समान जिसकी कान्ति हो तथा जो किरणों से युक्त हो उसे वैदूर्य कहते हैं। यह केतु को प्रिय है।

रत्नश्रेष्ठतरं वज्रं नीचे गोमेदविद्रुमम् ।
गारुत्मतं च माणिक्यं मौक्तिकं श्रेष्ठमेव हि ॥ ४७ ॥
इन्द्रनीलं पुष्परागो वैदूर्यं मध्यमं स्मृतम् ।

चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २०६.

सम्पूर्ण रत्नों में वज्र (हीरा) रत्न की श्रेष्ठता का निर्देश—रत्नों में अत्यन्त श्रेष्ठ हीरा होता है, और लहसुनिया तथा मूंगा रत्नों में नीच (निकृष्ट) होते हैं। पन्ना, माणिक तथा मोती रत्नों में श्रेष्ठ हैं। नीलम, पुखराज और वैदूर्य रत्नों में मध्यम हैं।

रत्नश्रेष्ठो दुर्लभश्च महाद्युतिरहेर्मणिः ॥ ४८ ॥

सर्पमणि—रत्नों में श्रेष्ठ, दुर्लभ एवं अत्यन्त उज्ज्वल कान्तिवाला होता है।

अजालगर्भं सद्रूपं रेखाबिन्दुविवर्जितम् ।
सत्कोणं सुप्रभं रत्नं श्रेष्ठं रत्नविदो विदुः ॥ ४९ ॥

श्रेष्ठ रत्नों के लक्षण—'जिसके भीतर जाली न हो और वर्ण अच्छा हो एवं रेखा तथा बिन्दु से रहित, अच्छे कोणों से युक्त तथा अच्छी कान्तिवाला रत्न श्रेष्ठ होता है'—ऐसा रत्नपारखी लोग कहते हैं।

शर्कराभं दलाभं च चिपिटं वर्तुलं हि तत् ।
वर्णाः प्रभाः सिता रक्ताः पीतकृष्णास्तु रत्नजाः ॥ ५० ॥

और वह रत्न कोई बालू और कोई पत्तों के समान कान्ति का तथा कोई चिपटा या कोई गोल आकार का होता है। और रत्नों के वर्ण की कान्ति श्वेत, रक्त, पीत या कृष्ण होती है।

यथावर्णं यथाच्छायं रत्नं यद्दोषवर्जितम् ।
श्रीपुष्टिकीर्तिशौर्यायुःकरमन्यदसत् स्मृतम् ॥ ५१ ॥

असत् रत्न के लक्षण—अपने २ वर्ण तथा कान्ति से युक्त और दोषों से रहित जो रत्न होता है वह लक्ष्मी, पुष्टि, कीर्ति, शूरता तथा आयु को करनेवाला होता है इससे अन्य प्रकार का रत्न बुरा फल देनेवाला होने से बुरा कहलाता है।

वर्णमाक्रमते छाया प्रभा वर्णप्रकाशिनी ।
कान्ति वर्ण को उज्ज्वल करती है, और प्रभा उसे प्रकाशित करती है।

पद्मरागस्तु माणिक्यभेदः कोकनदच्छविः ॥ ५२ ॥
न धारयेत् पुत्रकामा नारी वज्रं कदाचन ।
कालेन हीनं भवति मौक्तिकं विद्रुमं घृतम् ॥ ५३ ॥

पुत्रार्थिनी को वज्र धारण करने का निषेध तथा बहुत दिन धारण किये मोती और मूंगा के हीन होने का निर्देश—पद्मरागमणि माणिक्य (माणिक) का ही भेद है। यह रक्तकमल के समान कान्तियुक्त होता है। और पुत्रार्थिनी स्त्री को कभी भी हीरा धारण नहीं करना चाहिये। मूंगा और मोती बहुत दिन तक धारण करने पर (खराब) हो जाता है।

गुरुत्वात् प्रभया वर्णाद्विस्तारादाश्रयादपि ।

१४ शु०

२१० : शुक्रनीतिः

आकृत्या चाधिमूल्यं स्याद्रत्नं यद्दोषवर्जितम् ॥ ५४ ॥
दोष वर्जित रत्न के लक्षण— जो रत्न दोषरहित होता है उसका वजन, कान्ति, रङ्ग, आकार का विस्तार, उत्पत्तिस्थान तथा आकार के आधार पर मूल्य अधिक हो जाता है ।

नायसोल्लिख्यते रत्नं विना मौक्तिकविद्रुमात् ।
पाषाणेनापि च प्राय इति रत्नविदो विदुः ॥ ५५ ॥
'मूंगा और मोती को छोड़कर अन्य रत्नों पर लोहे और पत्थर से घिसने पर प्रायः लकीर नहीं पड़ती है' ऐसा रत्न के पारखी लोग कहते हैं ।

मूल्याधिक्याय भवति यद्रत्नं लघु विस्तृतम् ।
गुर्वल्पं हीनमौल्याय स्याद्रत्नं त्वपि सद्गुणम् ॥ ५६ ॥
मूल्य अधिक और कम होने के कारण— जो रत्न दोष से रहित उत्तम होते हुये भी तौल में हल्के किन्तु आकार में बड़े हों तो वे अधिक मूल्य के होते हैं । और जो तौल में भारी किन्तु आकार में छोटे होते हैं वे मूल्य में हीन होते हैं ।

शर्कराभं हीनमौल्यं चिपिटं मध्यमं स्मृतम् ।
दलाभं श्रेष्ठमूल्यं स्याद्यथाकामात्तु वर्तुलम् ॥ ५७ ॥
बालू के समान आकारवाला रत्न हीन मूल्य का होता है । चिपटा रत्न मध्यम मूल्य का और टुकड़ेवाला श्रेष्ठ मूल्य का होता है, और गोल रत्न लेने और बेचनेवाले की आवश्यकता के अनुसार कम या अधिक मूल्यवाले हो जाते हैं ।

न जरां यान्ति रत्नानि विद्रुमं मौक्तिकं विना ।
राजद्रौष्ट्याश्च रत्नानां मूल्यं हीनाधिकं भवेत् ॥ ५८ ॥
मूंगा और मोती को छोड़कर शेष रत्नों के ऊपर पुराना होने का दोष नहीं होता है । राजा की दुष्टता से रत्नों के मूल्य कम या अधिक हो जाते हैं ।

मत्स्या-ऽहि-शङ्ख-वाराह-वेणु-जीमूत-शुक्तितः ।
जायते मौक्तिकं तेषु भूरि शुक्त्युद्भवं स्मृतम् ॥ ५६ ॥
मौक्तिक की उत्पत्ति के स्थानों का निर्देश— मछली, सर्प, शङ्ख, सूअर, बांस, मेघ तथा सीप से मोती उत्पन्न होती है, किन्तु अधिकतर सीप से ही मोती निकलती है ।

कृष्णं सितं पीतरक्तं द्विचतुःसप्तकञ्चुकम् ।
त्रि-पञ्च-सप्तावरण-मुत्तरोत्तरमुत्तमम् ॥ ६० ॥
मोती के रंग और भेद का निर्देश— मोती कृष्ण, श्वेत, पीतयुक्त रक्तवर्ण तथा क्रम से २ कञ्चुक ( परत ), ४ कञ्चुक, ७ कञ्चुकवाली उत्तरोत्तर उत्तम समझी जाती है ।

चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २११

कृष्णं सितं क्रमाद् रक्तं पीतन्तु जरठं विदुः।
कनिष्ठं मध्यमं श्रेष्ठं क्रमाच्छुक्त्युद्भवं विदुः ॥ ६१ ॥

'कृष्ण वर्ण की मोती कनिष्ठ, श्वेतवर्ण की मध्यम, रक्तवर्ण की श्रेष्ठ तथा पीतवर्ण की पुरानी होती है' ऐसा सीप की मोती के विषय में समझना चाहिये।

तदेव हि भवेद् वेध्यमवेध्यानीतराणि तु।
कुर्वन्ति कृत्रिमं तद्वत्सिंहलद्वीपवासिनः ॥ ६२ ॥

**कृत्रिम मोती के निर्माण का स्थान—**सीप की मोती ही वेधी जा सकती है अन्य मोती नहीं वेधी जा सकती। सिंहल (सीलोन) देशवासी असली मोती के समान नकली मोती बनाते हैं।

तत्सन्देहविनाशार्थं मौक्तिकं सुपरीक्षयेत्।
उष्णे सलवणस्नेहे जले निश्युषितं हि तत् ॥ ६३ ॥
व्रीहिभिर्मर्दितं नेयाद्वैवर्ण्यं तदकृत्रिमम्।
श्रेष्ठाभं शुक्तिजं विद्यान्मध्यभां त्वितरद्विदुः ॥ ६४ ॥

**मोती की परीक्षाविधि-निर्देश—**अतः सन्देह दूर करने के लिये मोती की भलीभांति परीक्षा करनी चाहिये। परीक्षा विधि यह है कि—गर्म जल में नमक तथा तेल मिलाकर उसी में मोती को डालकर रातभर पड़ा रहने दे पश्चात् प्रातः मोती को निकाल कर धानों के बीच रख कर खूब रगड़े, इसके बाद यदि उसका रंग बदल जाय तो मोती को नकली यदि न बदले तो असली समझना चाहिये। उत्तम आभा (कान्ति) की मोती असली और मध्यम आभा की नकली समझी जाती है।

तुलाकल्पितमूल्यं स्याद्रत्नं गोमेदकं बिना।
क्षुर्माविंशतिभी रक्ती रत्नानां मौक्तिकं बिना ॥ ६५ ॥

गोमेदक रत्न को छोड़ कर शेष रत्नों का मूल्य तौल के अनुसार होता है। मोती को छोड़कर शेष रत्नों के लिये एक रत्ती २० अलसियों की मानी गई है।

रक्तित्रयं तु मुक्तायाश्चतुःकृष्णलकंर्भवेत्।
चतुर्विंशतिभिस्ताभी रत्नटङ्कस्तु रक्तिभिः ॥ ६६ ॥
टङ्कैश्चतुर्भिस्तोलः स्यात् स्वर्णविद्रुमयोः सदा।

**रत्नों का तुलामान निर्देश—**मोती के लिये ४ कृष्णलों (तौल विशेष) की ३ रत्ती, २४ रत्तियों का रत्नों के लिये १ टङ्क होता है। स्वर्ण तथा मूंगा तौलने के लिये ४ टङ्कों का १ तोला होता है।

एकस्यैव हि वज्रस्य त्वेकरक्तिमितस्य च ॥ ६७ ॥
सुविस्तृतदलस्यैव मूल्यं पञ्चसुवर्णकम्।

२१२शुक्रनीतिः

वज्र का मूल्य-विचार—यदि एक ही हीरा विस्तृत दलवाला तथा १ रत्ती तौल का हो तो उसका मूल्य ५ सुवर्ण (१० माशे तौल की १ स्वर्ण मुद्रा अशर्फी) होता है।

रक्तिकादलविस्ताराच्छ्रेष्ठं पञ्चगुणं यदि ॥ ६८ ॥
यथा यथा भवेन्न्यूनं हीनमौल्यं तथा तथा ।

जैसे २ रत्ती की संख्या एवं दल का विस्तार अधिक होता जायगा वैसे २ हीरे की श्रेष्ठता बढ़ती है, और प्रति रत्ती के अनुसार पूर्वोक्त मूल्य से पंचगुना अधिक होता जायगा। और जैसे २ रत्ती तथा दल के विस्तार में न्यूनता होगी वैसे २ मूल्य में कमी होगी।

अत्राष्टरक्तिको माषो दशमाषैः सुवर्णकः ॥ ६९ ॥
स्वर्णस्य तत् पञ्चमूल्यं राजताशीतिकर्षकम् ।

रत्न के तौलने में १ माशा ८ रत्ती का होता है। १० माशे का १ सुवर्ण होता है। ५ सुवर्णों का मूल्य ८० चांदी के कर्ष (१ रुपये) भर होते हैं।

यथा गुरुतरं वज्रं तन्मूल्यं रक्तिकवर्गः ॥ ७० ॥
तृतीयांशविहीनं तु चिपिटस्य प्रकीर्तितम् ।

हीरा चाहे जितना भारी हो किन्तु उसका मूल्य उसके रत्ती-समूह के अनुसार ही होगा, चिपटे हीरे का मूल्य तृतीयांश कम होता है।

अर्धं तु शर्कराभस्य चोत्तमं मूल्यमेरितम् ॥ ७१ ॥
रक्तिकायाश्च द्वे वज्रे तदर्धं मूल्यमर्हतः ।

उत्तम हीरे के मूल्य से आधा मूल्य शर्करा (बालू) के आकारवाले हीरे का होता है। २ हीरे यदि १ रत्ती के हों तो दोनों का मूल्य उत्तम हीरे का आधा होता है।

तदर्धं बहवोऽर्हन्ति मध्या हीना यथा गुणैः ॥ ७२ ॥
उत्तमार्धं तदर्धं हीरका गुणहीनतः ।

यदि गुणों के अनुसार मध्यम और हीन बहुत से हीरे १ रत्ती के बराबर हों तो उसके मूल्य उस से भी आधे हो जायेंगे। इसी प्रकार से हीरों के गुण की हीनता के अनुसार उसके मूल्य के आधे या उससे भी आधे होते हैं।

शतादूर्ध्वं रक्तिकवर्गाद्ध्रसेद् विंशतिरक्तिकाः ॥ ७३ ॥
प्रतिशतात्तु वज्रस्य सुविस्तृतदलस्य च ।
तथैव चिपिटस्यापि विस्तृतस्य च ह्रासयेत् ॥ ७४ ॥
शर्कराभस्य पञ्चाशच्चत्वारिंशच्च वैकतः ।

जो हीरा सुविस्तृत दलवाला या चिपटा होते हुये भी विस्तृत दलवाला हो और यदि १०० रत्ती से ऊपर तौलवाला हो तो प्रति सैकड़े २० रत्ती का

चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१३

चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१३

मूल्य घटाकर उसका मूल्य होगा। और शर्करा के समान हीरों के लिये प्रति सैकड़े ५० या ४० रत्ती का मूल्य घटाकर मूल्य होगा।

रत्नं न धारयेत् कृष्णं रक्तबिन्दुयुतं सदा ॥ ७५ ॥

**काले और रक्त बिन्दुवाले रत्न के न धारण का निर्देश—**और कृष्ण वर्ण के रत्नों पर यदि लाल रंग के बिन्दु हों तो उन्हें नहीं धारण करना चाहिये।

गारुत्मतं तूत्तमं चेन्माणिक्यं मूल्यमर्हतिः । सुवर्णं रक्तिमात्रं चेद् यथा रक्तिस्ततो गुरुः ॥ ७६ ॥

**माणिक्यादिकों का मूल्य-विचार—**यदि पन्ना और माणिक्य दोनों उत्तम हों तो उन दोनों के मूल्य समान होंगे अतः वे १ रत्ती के तौल के हों तो उनका १ सुवर्ण (१० माशे सोना) मूल्य होता है। और रत्ती के अनुसार मूल्य बढ़ता है।

रक्तिमात्रः पुष्परागो नीलः स्वर्णार्धमर्हतिः । चलत्रिसूत्रो वैदूर्यश्चोत्तमं मूल्यमर्हति ॥ ७७ ॥

१ रत्ती का पुखराज या नीलम का मूल्य आधा सुवर्ण (५ माशे सोना) होता है। और जिसमें चलते हुये ३ सूत्र दिखाई पड़े ऐसा वैदूर्यमणि उत्तम मूल्य का होता है।

प्रवालं तोलकमितं स्वर्णार्धं मूल्यमर्हति ।

१ तोले भर तौल के मूंगे का मूल्य आधा सुवर्ण (५ माशे सोना) होता है।

अत्यल्पमूल्यो गोमेदो नोन्मानं तु यतोऽर्हति ॥ ७८ ॥

**गोमेद के उन्मान के योग्य न होने का निर्देश—**गोमेद मणि अत्यन्त कम मूल्य का होता है। अतः उसका मूल्य तौल के ऊपर नहीं होता है।

संख्यातः स्वल्परत्नानां मूल्यं स्याद्धीरकाद्विना । अत्यन्तरमणीयानां दुर्लभानां च कामतः ॥ ७९ ॥ भवेन्मूल्यं मानेन तथातिगुणशालिनाम् ।

**अत्यन्त गुण वालों का मान से मूल्य न होने का निर्देश—**हीरे को छोड़कर क्षुद्र रत्नों का मूल्य संख्या से होता है। जो अत्यन्त सुन्दर तथा दुर्लभ हों उनका मूल्य आवश्यकतानुसार कम या अधिक होता है। और अत्यन्त गुण-शाली रत्नों का मूल्य तौल के अनुसार नहीं होता है।

व्यङ्घ्रिश्चतुर्दशहतो वर्गो मौक्तिकरक्तिजः ॥ ८० ॥ चतुर्विंशतिभिर्भक्तो लब्धान्मूल्यं प्रकल्पेत् । उत्तमं तु सुवर्णार्धमूनमूनं यथागुणम् ॥ ८१ ॥

**मोतियों की मूल्य-कल्पना—**मोती तौल में जितनी रत्तियों का हो,

२१४ | शुक्रनीतिः

उनकी संख्या को परस्पर गुणा करके वर्ग निकाल ले अर्थात् यदि ४ है, तो ४, ही से गुणा करके १६ वर्ग हुआ, इसे चौथाई से हीन करने पर १२ हुआ पुनः १४ से गुणा करने पर १६८ हुआ, इसको २१ से भाग देने पर लब्धि ८ हुई, इससे मूल्य की कल्पना करे। उत्तम मुक्ता का मूल्य आधा सुवर्ण होता है, उसके बाद गुणानुसार मध्यम तथा अधम होने से उत्तरोत्तर कम होता जाता है।

मुक्ताया रक्तिकौघस्य प्रतिरक्तौ कला नव ।
कल्पयेत्पञ्चभागान् हि त्रिंशद्भिः प्राग्भजेच्च तान् ॥ ८२ ॥
लब्धं कलासु संयोज्य कलाः षोडशभिर्भजेत् ।
मूल्यं तज्ज्ञन्विधीतो योज्यं मुक्ताया वा यथागुणम् ॥ ८३ ॥

मोती की रत्तियों के वर्ग में प्रत्येक रत्ती को नौ ९ कला समझनी चाहिये। फिर उन रत्तियों को पचगुना करके ३० से भाग दे। और जो लब्धि हो उसे कलाओं में जोड़ दे। फिर १६ का भाग दे, जो लब्धि हो उससे मोती का मूल्य समझना चाहिये। अथवा गुणानुसार मोती का मूल्य निश्चित करना चाहिये।

रक्तं पीतं वर्तुलं चेन्मौक्तिकं चोत्तमं सितम् ।
अधमं चिपिटं शर्कराभमन्यत्तु मध्यमम् ॥ ८४ ॥

मोती के भेद और लक्षण—लाल, पीला और श्वेत रंग की गोल मोती उत्तम होती है। और जो चिपटी तथा शर्करा के समान होती है वह अधम और इससे अन्य मोती मध्यम कहलाती है।

रत्ने स्वभाविका दोषाः सन्ति धातुषु कृत्रिमाः ।
अतो धातून् सम्परीक्ष्य तन्मूल्यं कल्पयेद् बुधः ॥ ८५ ॥

रत्नों में स्वाभाविक (स्वयम्) दोष उत्पन्न होते हैं। किन्तु धातुओं में (सुवर्णादि में) मिलाने से कृत्रिम दोष होते हैं। अतः धातुओं की भलीभांति परीक्षा करके बुद्धिमान को उनके मूल्य की कल्पना करनी चाहिये।

सुवर्णं रजतं ताम्रं वङ्गं सीसं च रङ्गकम् ।
लोहं च धातवः सप्त ह्येषामन्ये तु संकराः ॥ ८६ ॥

सुवर्णादि सात धातुओं का निर्देश—सोना, चांदी, तांबा, वंग, सीसा, रांगा, लोहा ये ७ शुद्ध धातुयें हैं, इनसे अन्य धातुयें इन सबों के मेल से बनती हैं अतः वे संकर (मिलावटी) धातु कहलाती हैं।

यथापूर्वं तु श्रेष्ठं स्यात्स्वर्णं श्रेष्ठतरं मतम् ।
वङ्गताम्रभवं कांस्यं पित्तलं ताम्ररङ्गजम् ॥ ८७ ॥

सुवर्णादि ७ धातुओं के तरतम भाव—उक्त ७ धातुओं में अन्तिम लोह से