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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 294

२०८ | शुक्रनीतिः

अतः राजा स्वयं परीक्षकों (रत्नपारखियों) के द्वारा परीक्षा करके रत्नों का संग्रह करे।

वज्रं मुक्ता प्रबालं च गोमेदश्चेन्द्रनीलकः ।
वैदूर्यः पुष्परागश्च पाचिर्माणिक्यमेव च ॥ ४१ ॥
महारत्नानि चैतानि नव प्रोक्तानि सूरिभिः ।

हीरा आदि नव महारत्नों का निर्देश— हीरा, मोती, मूंगा, गोमेद (लहसुनिया), नीलम, वैदूर्य, पुखराज, पन्ना, लाल (मानिक), ये ९ महारत्न विद्वानों द्वारा कहे गये हैं।

रवेः प्रियं रक्तवर्णं माणिक्यं त्विन्द्रगोपरुक् ॥ ४२ ॥
रक्तपीतसितश्यामच्छविर्मुक्ता प्रिया विधोः ।
सपीतरक्तरुग्भौमप्रियं विद्रुममुत्तमम् ॥ ४३ ॥
मयूरचाषपत्राभा पाचिर्बुधहिता हरित् ।

नवरत्नों के वर्ण और नवग्रहों का निर्देश— बीरबहूटी कीड़े की भांति लाल रंग का माणिक (लाल) होता है जो सूर्य को प्रिय है। लाल, पीली, श्वेत तथा श्याम वर्ण की कान्तिवाली मोती होती है जो चन्द्रमा को प्रिय है। पीली तथा लालकान्ति से युक्त उत्तम मूंगा होता है जो मंगलग्रह को प्रिय है। मयूर तथा चास पक्षी के पंख के समान कान्तिवाला पन्ना हरा रङ्ग का होता है जो बुधग्रह को प्रिय होता है।

स्वर्णच्छविः पुष्परागः पीतवर्णो गुरुप्रियः ॥ ४४ ॥
अत्यन्तविशदं वज्रं तारकाभं कवेः प्रियम् ।
हितः शनेरिन्द्रनीलो ह्यसितो घनमेघरुक् ॥ ४५ ॥
गोमेदः प्रियकृद्राहोरीषत्पीतारुणप्रभः ।
ओतवद्याभश्चलत्तन्तुर्वैदूर्यः केतुप्रीतिकृत् ॥ ४६ ॥

सोना के समान कान्तिवाला पीले वर्ण का पुखराज होता है जो गुरुग्रह को प्रिय होता है। अत्यन्त स्वच्छ तारा की भांति चमकनेवाला हीरा होता है जो शुक्रग्रह को प्रिय है। घने बादल के समान कान्तिवाला नीले रङ्ग का नीलम होता है जो शनिग्रह को प्रिय है। कुछ पीली तथा लाल कान्ति से युक्त लहसुनिया होता है जो राहु को प्रिय है। बिलाव की आंखों के समान जिसकी कान्ति हो तथा जो किरणों से युक्त हो उसे वैदूर्य कहते हैं। यह केतु को प्रिय है।

रत्नश्रेष्ठतरं वज्रं नीचे गोमेदविद्रुमम् ।
गारुत्मतं च माणिक्यं मौक्तिकं श्रेष्ठमेव हि ॥ ४७ ॥
इन्द्रनीलं पुष्परागो वैदूर्यं मध्यमं स्मृतम् ।