भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 295

चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २०६.

सम्पूर्ण रत्नों में वज्र (हीरा) रत्न की श्रेष्ठता का निर्देश—रत्नों में अत्यन्त श्रेष्ठ हीरा होता है, और लहसुनिया तथा मूंगा रत्नों में नीच (निकृष्ट) होते हैं। पन्ना, माणिक तथा मोती रत्नों में श्रेष्ठ हैं। नीलम, पुखराज और वैदूर्य रत्नों में मध्यम हैं।

रत्नश्रेष्ठो दुर्लभश्च महाद्युतिरहेर्मणिः ॥ ४८ ॥

सर्पमणि—रत्नों में श्रेष्ठ, दुर्लभ एवं अत्यन्त उज्ज्वल कान्तिवाला होता है।

अजालगर्भं सद्रूपं रेखाबिन्दुविवर्जितम् ।
सत्कोणं सुप्रभं रत्नं श्रेष्ठं रत्नविदो विदुः ॥ ४९ ॥

श्रेष्ठ रत्नों के लक्षण—'जिसके भीतर जाली न हो और वर्ण अच्छा हो एवं रेखा तथा बिन्दु से रहित, अच्छे कोणों से युक्त तथा अच्छी कान्तिवाला रत्न श्रेष्ठ होता है'—ऐसा रत्नपारखी लोग कहते हैं।

शर्कराभं दलाभं च चिपिटं वर्तुलं हि तत् ।
वर्णाः प्रभाः सिता रक्ताः पीतकृष्णास्तु रत्नजाः ॥ ५० ॥

और वह रत्न कोई बालू और कोई पत्तों के समान कान्ति का तथा कोई चिपटा या कोई गोल आकार का होता है। और रत्नों के वर्ण की कान्ति श्वेत, रक्त, पीत या कृष्ण होती है।

यथावर्णं यथाच्छायं रत्नं यद्दोषवर्जितम् ।
श्रीपुष्टिकीर्तिशौर्यायुःकरमन्यदसत् स्मृतम् ॥ ५१ ॥

असत् रत्न के लक्षण—अपने २ वर्ण तथा कान्ति से युक्त और दोषों से रहित जो रत्न होता है वह लक्ष्मी, पुष्टि, कीर्ति, शूरता तथा आयु को करनेवाला होता है इससे अन्य प्रकार का रत्न बुरा फल देनेवाला होने से बुरा कहलाता है।

वर्णमाक्रमते छाया प्रभा वर्णप्रकाशिनी ।
कान्ति वर्ण को उज्ज्वल करती है, और प्रभा उसे प्रकाशित करती है।

पद्मरागस्तु माणिक्यभेदः कोकनदच्छविः ॥ ५२ ॥
न धारयेत् पुत्रकामा नारी वज्रं कदाचन ।
कालेन हीनं भवति मौक्तिकं विद्रुमं घृतम् ॥ ५३ ॥

पुत्रार्थिनी को वज्र धारण करने का निषेध तथा बहुत दिन धारण किये मोती और मूंगा के हीन होने का निर्देश—पद्मरागमणि माणिक्य (माणिक) का ही भेद है। यह रक्तकमल के समान कान्तियुक्त होता है। और पुत्रार्थिनी स्त्री को कभी भी हीरा धारण नहीं करना चाहिये। मूंगा और मोती बहुत दिन तक धारण करने पर (खराब) हो जाता है।

गुरुत्वात् प्रभया वर्णाद्विस्तारादाश्रयादपि ।

१४ शु०