भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 284
१६८शुक्रनीतिः

देश-निष्कासन योग्य अपराधियों के लक्षण—मद्यप (शराबी), धूर्त, चोर, जार (परस्त्रीगामी), अत्यन्त क्रोधी, हिंसा करनेवाला (खूनी), वर्ण (ब्राह्मणादि ४ वर्ण) तथा आश्रम (ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, संन्यास) के अनुकूल आचारों का त्याग करनेवाला, नास्तिक (परलोकादि को नहीं माननेवाला), खल, झूठा दोषारोप करनेवाला, एक को-दूसरे से आपस में कह सुनकर विरोध करानेवाला, अच्छे साधु पुरुषों को दोष लगानेवाला एवं देवताओं को अपवित्र करनेवाला अथवा मूर्त्ति को तोड़नेवाला, झूठ बोलनेवाला, धरोहर को हजम करनेवाला, किसी की जीविका को नष्ट करनेवाला, दूसरी की उन्नति को नहीं सहन करनेवाला, घूस लेने में तत्पर, नहीं करने योग्य बुरे कार्यों को करनेवाला, किसी के गुप्त विचार को प्रकट करनेवाला, किसी के कार्यों को नष्ट करनेवाला, अप्रिय (अनुचित) वचन बोलनेवाला, कठोरभाषी, जलाशय या बगीचे को हानि पहुँचानेवाला, झूठ-मूठ का बना हुआ ज्योतिषी (भाग्य फल बतानेवाला), राजद्रोही, बुरी सलाह देनेवाला (दुष्टमन्त्री), कूट कार्य (जालसाजी) जाननेवाला, कुवैद्य (अनाड़ी वैद्य), अभद्र तथा अपवित्र आचार तथा वेश भूषा रखनेवाला, रास्ता रूधनेवाला, ठीक २ गवाही नहीं देनेवाला, उद्धत वेश रखनेवाला, अपने स्वामी के साथ द्रोह रखनेवाला, अनाप-शनाप व्यय करनेवाला, आग लगानेवाला, विष देनेवाला, वेश्या में आसक्त, अत्यन्त उग्र दंड देनेवाला, अफसर, न्यायालय में सदस्य (जूरी) होकर पक्षपात करनेवाला, बलपूर्वक लिखित पत्र को अन्याय से ग्रहण करनेवाला, अन्याय करनेवाला, झगड़ालू, युद्ध से भाग आनेवाला, गवाही को नहीं माननेवाला या उचित गवाही नहीं देनेवाला, पिता-माता-सती स्त्री-मित्र इनके साथ द्रोह करनेवाला, दूसरे के गुणों में भी दोषारोप करनेवाला, राजा के शत्रुओं की सेवा करनेवाला, मर्मान्तक पीड़ा पहुँचानेवाले वचनों को बोलनेवाला या कार्यों को करनेवाला, ठगनेवाला, आत्मीयों के साथ द्वेष करनेवाला, गुप्त व्यापार (ब्लैक मार्केटिंग-चोर बाजारी) करनेवाला, वृषल (किसी भी धर्म पर आघात पहुँचानेवाला), ग्रामवासियों को पीड़ा पहुंचानेवाला अर्थात् उनके कार्यों में बाधा पहुँचानेवाला, गृहस्थ होकर भी कुटुम्ब का भरण-पोषण न करके सदा तपस्या या विद्या पढ़नेवाला, तृण (घास), काष्ठ आदि लाकर आजीविका चलाने की सामर्थ्य रहने पर भी भिक्षा वृत्ति से पेट पालनेवाला, कन्या को भी बेचनेवाला, कुटुम्ब की आजीविका को घटानेवाला, अधार्मिक (अपने धर्म पर नहीं चलनेवाला), चुगुली करनेवाला अथवा अधर्म की सूचना देनेवाला (पापवार्त्ता करनेवाला), राजा के अनिष्ट की पर्वाह नहीं करनेवाला, ऐसे पुरुषों एवं कुलटा, पति पुत्र की हत्या करनेवाली,