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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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चतुर्थोऽध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् १६६

स्वतन्त्र होकर घूमनेवाली, वृद्धजनों से निन्दिता, गृह के कार्यों को छोड़ देनेवाली (न करनेवाली), नित्य दुष्ट आचरण करनेवाली, गुरुजनों के साथ अप्रिय व्यवहार करनेवाली, पतोहू या पतोहुओं के साथ अप्रिय व्यवहार करनेवाली ऐसी स्त्रियों को स्वभावतः दुष्ट जानकर राजा अपने राज्य से निकाल दे।

द्वीपे निर्वासितव्यास्ते बद्धा दुर्गोदरेऽथवा ॥ १०८ ॥
मार्गसंस्करणे योज्याः कदन्नन्यूनभोजनाः।
तत्तज्जात्युक्तकर्माणि कारयीत च तैनृपः ॥ १०९ ॥

मार्ग संरक्षण योग्य का निर्देश— अथवा उक्त मद्यप आदि लोगों को किसी टापू में ले जाकर रखना चाहिये किंवा किसी—किले के भीतर कैद करके रखना चाहिये और वहां पर उन सबों से रास्ता साफ कराना चाहिये एवं खराब अन्न तथा थोड़ी मात्रा में उन्हें भोजन देना चाहिये। और उन सबों से उनके जाति के अनुकूल कर्म राजा को कराना चाहिये।

एवंविधानसाधूंश्च संसर्गेण च दूषितान्।
दण्डयित्वा च सन्मार्गे शिक्षयेत्तान्नृपः सदा ॥ ११० ॥

संसर्ग से दूषित को दण्ड देकर सन्मार्ग की शिक्षा देने का निर्देश— और राजा सदा इस प्रकार से पूर्वोक्त दुष्ट पुरुषों को एवं उनके साथ संसर्ग करने से दुष्ट हुये पुरुषों को दण्ड देकर सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा दे।

राज्ञो राष्ट्रस्य विकृतिं तथा मन्त्रिगणस्य च।
इच्छन्ति शत्रुसम्बन्धाद्ये तान् हन्याद्धि द्राङ्नृपः ॥ १११ ॥

राजादिकों से बिगाड़ करवानेवाले को शीघ्र नष्ट कर देने का निर्देश— और जो राजा राज्य या मन्त्री लोगों को शत्रु से मिलकर हानि पहुंचाना चाहते हों उन्हें राजा शीघ्र वध करने का दण्ड दे।

नेच्छेच्च युगपद्ध्वंसं गणदौष्ट्ये गणस्य च।
एकैकं घातयेद्राजा वत्सोऽश्नाति यथा स्तनम् ॥ ११२ ॥

गणों की दुष्टता करने पर उपाय का निर्देश— यदि बहुत से गण (समूह) दुष्ट हो गये हों तो प्रत्येक गण का एक साथ ही नाश करने की इच्छा राजा को नहीं करनी चाहिये बल्कि उनमें से एक-एक को क्रम से नष्ट करना चाहिये। जैसे बछड़ा एक-एक करके क्रम से स्तनों को पीता है न कि एक साथ ही।

अधर्मशीलो नृपतिर्यदा तं भीषयेज्जनः।
धर्मशीलातिबलवद्रिपोराश्रयतः सदा ॥ ११३ ॥

अधर्मशील राजा को सदैव भय दिलाने को प्रजा के लिये निर्देश— जब राजा अधर्म पर चलनेवाला हो जाय तो प्रजा 'धर्मशील, बलवान् उस राजा