शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०० शुक्रनीतिः
के शत्रु का आश्रय लेने' का भय उसे दिखा कर सदा डराना चाहिये। अर्थात् यदि आप अधर्म पर चलना नहीं छोड़ेंगे तो हम सब प्रजा आपका साथ छोड़कर आपके शत्रु धर्मशील बलवान् से मिल जायँगे ऐसा कहकर उस राजा को डराना चाहिये।
यावत्तु धर्मशीलः स्यात् स नृपस्तावदेव हि । अन्यथा नश्यते लोको द्राङ्नृपोऽपि विनश्यति ॥ ११४ ॥
अधर्मशील राजा और प्रजा के तत्काल नष्ट हो जाने का निर्देश—जब तक राजा धर्मशील बना रहता है अर्थात् प्रजा के साथ धर्मपूर्वक व्यवहार करता है तभी तक वह राजा बना रहता है। अन्यथा (यदि ऐसा न हो तो) राजा के अधर्मशील होने पर उसकी प्रजा एवं स्वयं राजा भी शीघ्र नष्ट हो जाता है अर्थात् उसका राज्य नष्ट हो जाता है।
मातरं पितरं भार्यां यः संत्यज्य विवर्त्तते । निगडैर्बन्धयित्वा तं योजयेन्मार्गसंस्कृतौ ॥ ११५ ॥ तद्भृत्यथं तु सन्दद्यात्तेभ्यो राजा प्रयत्नतः ।
माता आदि के भरण-पोषण त्याग करनेवाले के लिये दण्ड का निर्देश— जो कर्मचारी माता, पिता और स्त्री (पत्नी) इनका भरण-पोषण करना छोड़कर मनमाना अपना व्यवहार रखता है, उसे हथकड़ी-बेड़ी डालकर कैद रखना चाहिये एवं उससे रास्ता साफ़ करने या बनाने का कार्य कराना चाहिये। और उसके तनख्वाह का आधा द्रव्य उन सबों को प्रयत्नपूर्वक राजा को देना चाहिये।
विद्यात् पणसहस्रं तु दण्ड उत्तमसाहसः ॥ ११६ ॥ दशमाषमितं ताम्रं तत्पणो राजमुद्रितम् । वराटिसार्धशतकमूल्यः कार्षापणश्च सः ॥ ११७ ॥
उत्तमादि साहस दण्ड के लक्षण एवं पण आदि के लक्षण—१००० पणों (पैसों) का जुर्माना उत्तम साहस दण्ड कहलाता है। राजा के द्वारा स्वीकृत चिह्न से अंकित १० मासे भर तांबे के सिक्के को 'पण' (पैसा) कहते हैं। और १५० कौड़ियों के मूल्य के उसी (पण) को 'कार्षापण' भी कहते हैं।
तदर्धश्च तदर्धश्च मध्यमः प्रथमः क्रमात् । प्रथमे साहसे दण्डः प्रथमश्च क्रमात् परौ ॥ ११८ ॥ मध्यमे मध्यमो धार्य्यश्चोत्तमे तूत्तमो नृपैः ।
और क्रम से उसके (१०००) आधे (५००) पणों के जुर्माने को मध्यम तथा उसके आधे (२५०) पणों के जुर्माने को प्रथम साहस दण्ड कहते हैं। प्रथम श्रेणी के साहसों (अपराधों) में प्रथम साहसदण्ड (२५०