शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१५
पूर्व-पूर्व की धातुयें श्रेष्ठ होती हैं। अतः सोना सर्वश्रेष्ठ धातु माना जाता है। वङ्ग तथा तामा के मेल से 'कांसा' बनता है, तामा तथा रांगा के मेल से 'पीतल' बनता है।
मानसममपि स्वर्णं तनु स्यात् पृथुलाः परे ।
स्वर्णादि धातुओं के गुण—तौल में बराबर सोना पतला बनाया जाता है किन्तु अन्य धातुयें स्वर्ण के बराबर तौल में होती हुई भी मोटी ही बनती हैं सोने के समान पतली नहीं।
एकच्छिद्रसमाकृष्टे समखण्डे द्वयोर्यदा ॥ ८८ ॥
धातोः सूत्रं मानसमं निर्दुष्टस्य भवेत्तदा ।
अब दो धातुओं के समान दो टुकड़ों को एक छिद्र में डालकर सूत्राकार खींचकर तार बनाया जाय तो यदि धातु शुद्ध होगी तब उसका सूत्र मान में बराबर ही होगा।
यन्त्र-शस्त्रास्त्ररूपं यन्महामूल्यं भवेदयः ॥ ८९ ॥
रजतं षोडशगुणं भवेत् स्वर्णस्य मूल्यकम् ।
धातुओं के मूल्य का प्रमाण—यन्त्र तथा शस्त्र रूप होने पर, लोहे का मूल्य अत्यधिक बढ़ जाता है। चांदी से सोलह गुना अधिक मूल्य सोने का होता है।
ताम्रं रजतमूल्यं स्यात् प्रायोऽशीतिगुणं तथा ॥ ९० ॥
ताम्राधिकं सार्धगुणं वङ्गं वङ्गात्तथा परे ।
रङ्गसीसे द्विर्त्रिगुणे ताम्राल्लोहं तु षड्गुणम् ॥ ९१ ॥
मूल्यमेतद्विशिष्टं तु ह्युक्तं प्राङ्मूल्यकल्पनम् ।
प्रायः तांबे से अस्सी गुना अधिक मूल्य चांदी का होता है। वंग से डेढ़ गुना अधिक तांबे का मूल्य होता है। और वङ्ग से अन्य रांगा तथा सीसा क्रम से ताम्र से द्विगुण तथा त्रिगुण मिलते हैं। और लोह षड्गुने मिलते हैं। यह विशिष्ट रूप से मूल्य कहा गया है, क्योंकि पूर्व से ही मूल्य का वर्णन किया गया है।
सुशृङ्गवर्णा सुदुघा बहुदुग्धा सुवत्सका ॥ ९२ ॥
तरुण्यल्पा वा महती मूल्याधिक्याय गौर्भवेत् ।
पीतवत्सा प्रस्थदुग्धा तन्मूल्यं रजतं पलम् ॥ ९३ ॥
अधिक मूल्य गौ के लक्षण—सुन्दर सींग तथा वर्णवाली, दुहने में क्लेश नहीं पहुँचानेवाली, अधिक दूध देनेवाली, सुन्दर बछड़ेवाली, जवान ऐसी गौ चाहे वह छोटी हो या बड़ी हो तो उसका मूल्य अधिक होता है। पीले वर्ण