भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

चतुर्थोऽध्याये राष्ट्रप्रकरणम् २२१

तथा चापणिकेभ्यस्तु पण्यभूशुल्कमाहरेत् ।
मार्गसंस्काररक्षार्थं मार्गगेभ्यो हरेत् फलम् ॥ १२७ ॥
दुकानदार आदि से भूमि का कर लेने का निर्देश— राजा दूकानदारों से दूकान की भूमि का कर ग्रहण करे। और यात्रियों से मार्ग की सफाई तथा रक्षा के लिये भी कर ग्रहण करे।

सर्वतः फलभुग् भूत्वा दासवत् स्यात्तु रक्षणे ।
इति कोशप्रकरणं समासात् कथितं किल ॥ १२८ ॥
इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य कोशनिरूपणं नाम द्वितीयं प्रकरणम् ॥ २ ॥

राजा सबों से कर ग्रहण कर नौकर की भांति उनकी रक्षा करे। इस प्रकार से संक्षेप में कोश-प्रकरण का वर्णन किया गया।
इस प्रकार शुक्रनीति भाषा टीका में चतुर्थाध्याय का कोशनिरूपण नाम का द्वितीय प्रकरण समाप्त ॥


अथ चतुर्थाध्यायस्य तृतीयं राष्ट्रप्रकरणम् ।

अथ मिश्रे तृतीयं तु राष्ट्रं वक्ष्ये समासतः ।
स्थावरं जङ्गमं वापि राष्ट्रशब्देन गीयते ॥ १ ॥
राष्ट्र के दो प्रकारों का निर्देश— अब इस मिश्र अध्याय में तीसरा राष्ट्र प्रकरण का संक्षेप में वर्णन करूंगा। यहां पर 'राष्ट्र' शब्द से स्थावर (वृक्ष-पर्वतादि) तथा जङ्गम (गो-मनुष्यादि) का बोध करना चाहिये।

यस्याधीनं भवेद्यावत्तद्राष्ट्रं तस्य वै भवेत् ।
कुबेरता शतगुणाधिका सर्वगुणात्ततः ॥ २ ॥
ईशता चाधिकतरा सा नाल्पतपसः फलम् ।
स दीव्यति पृथिव्यां तु नान्यो देवो यतः स्मृतः ॥ ३ ॥
राज्य तथा राजा की सर्वश्रेष्ठता एवं देवतुल्यता का निर्देश— जिस राजा के अधीन जितना राष्ट्र होता है उतना उसका वह 'राज्य' कहलाता है। सर्व-गुण-सम्पन्न होने की अपेक्षा सौ गुना अधिक श्रेष्ठ धन-कुबेर होना है, उसके बाद राजा होना सबसे अधिक श्रेष्ठ है जो कि साधारण तपस्या का फल नहीं है, क्योंकि वह संसार में देवता के समान विहार करता है अतः उसके अतिरिक्त अन्य कोई देवता के समान नहीं माना जाता है।

यस्याश्रितो भवेल्लोकस्तद्वदाचरति प्रजा।