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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 308
२२२शुक्रनीतिः

भुङ्क्ते राष्ट्रफलं सम्यगतो राष्ट्रकृतं त्वघम् ॥ ४ ॥

**राजा को देश के पुण्य और पाप का भोक्ता होने का निर्देश—**जैसे राजा के आश्रय में लोग रहते हैं और वह जैसा आचरण करता है उसकी प्रजावें भी वैसा ही आचरण करती हैं। इसी से वह राजा भी राष्ट्र (राज्यवर्ती प्रजा) के किये हुये पाप-पुण्य का फल दुःख-सुख का भली भांति भोग करता है।

स्वस्वधर्मपरो लोको यस्य राष्ट्रे प्रवर्तते ।
धर्मनीतिपरो राजा चिरं कीर्तिं स चाश्नुते ॥ ५ ॥
भूमौ यावद्यस्य कीर्तिस्तावत्स्वर्गे स तिष्ठति ।

जिस राजा के राज्य में प्रजाजन अपने २ धर्म में तत्पर रहते हैं, धर्म तथा नीति में तत्पर रहनेवाला वह राजा चिरस्थायी कीर्ति को प्राप्त करता है। पृथ्वी पर जिसकी कीर्ति जब तक विद्यमान रहती है, तब तक वह स्वर्ग में रहता है।

अकीर्तिरेव नरको नान्योऽस्ति नरको दिवि ॥ ६ ॥
नरदेहाद्विना त्वन्यो देहो नरक एव सः ।
महत्पापफलं विद्यादाधिव्याधिस्त्र रूपकम् ॥ ७ ॥

**नरक के लक्षण का निर्देश—**अपकीर्ति ही नरक है, परलोक में अन्य कोई नरक नहीं है। मनुष्य देह को छोड़कर अन्य देह नरक ही हैं। और आधि व्याधि का होना बड़े पाप का फल ही समझना चाहिये।

स्वयं धर्मपरो भूत्वा धर्मे संस्थापयेत् प्रजाः ।
प्रमाणभूतं धर्मिष्ठमुपसर्पन्त्यतः प्रजाः ॥ ८ ॥

**राजा के धर्मिष्ठ बनने का निर्देश—**राजा स्वयं धर्म में तत्पर होकर प्रजाओं को धर्म में स्थापित रक्खे। इससे प्रजायें भी प्रामाणिक तथा धर्मिष्ठ राजा की अनुगामिनी बनी रहती हैं।

देशधर्मा जातिधर्माः कुलधर्माः सनातनाः ।
मुनिप्रोक्ताश्च ये धर्माः प्राचीना नूतनाश्च ये ॥ ९ ॥
ते राष्ट्रगुप्त्यै सन्धार्या ज्ञात्वा यत्नेन सन्नृपैः ।
धर्मसंस्थापनाद्राजा श्रियं कीर्तिं प्रविन्दति ॥ १० ॥

**सर्वधर्म-रक्षण से देश-रक्षा होने का निर्देश—**बहुत दिनों से प्रचलित देश-धर्म, जाति-धर्म, तथा कुल-धर्म एवं मुनियों द्वारा कहे हुये धर्म, तथा प्राचीन और नवीन धर्म, इन सबों का ज्ञान प्राप्त कर राष्ट्र की रक्षा के लिये यत्नपूर्वक अच्छे राजाओं को इनकी रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि धर्म की संस्थापना करने से राजा लक्ष्मी तथा कीर्ति को प्राप्त करता है।

चतुर्धा भेदिता जातिर्ब्राह्मणा कर्मभिः पुरा ।