शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 314, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें| २२८ | शुक्रनीतिः |
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प्रयोग कहा है उसे 'श्रौतकल्प' कहते हैं। इससे भिन्न को 'स्मार्तकल्प' कहते हैं।
व्याकृताः प्रत्ययाद्यैश्च धातुसन्धिसमासतः ॥ ४२ ॥
शब्दा यत्र व्याकरणमेतद्धि बहुलिङ्गतः।
**व्याकरण के लक्षण—**जिसमें प्रत्यय आदि के द्वारा तथा धातु, सन्धि, समास और पुंल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग इनके द्वारा शब्द सिद्ध किये गये हों उसे 'व्याकरण' कहते हैं।
शब्दनिर्वचनं यत्र वाक्यार्थैकार्थसंग्रहः ॥ ४३ ॥
निरुक्तं तत्समाख्यानाद्वेदाङ्गं श्रोत्रसंज्ञकम्।
**निरुक्त के लक्षण—**जिसमें शब्दों का निष्कर्ष के साथ कथन तथा वाक्यार्थों का एक अर्थ में संग्रह किया गया हो उसे 'निरुक्त' कहते हैं। वह शब्दों का अर्थ भलीभांति कहने से वेद का श्रोत्र (कान) अङ्ग माना जाता है।
नक्षत्रग्रहगमनैः कालो येन विधीयते ॥ ४४ ॥
संहिताभिश्च होराभिर्गणितं ज्यौतिषं हि तत्।
**ज्यौतिष लक्षण—**जिससे नक्षत्रों तथा ग्रहों की गति द्वारा काल का पृथक् २ निर्देश किया जाता है। और जिसके संहिता, होरा तथा गणित ये तीन स्कन्ध हैं उसे 'ज्यौतिष' कहते हैं।
म्यरस्तजभ्नगैर्लन्तैः पद्यं यत्र प्रमाणतः ॥ ४५ ॥
कल्प्यते छन्दःशास्त्रं तद्वेदानां पादरूपधृक्।
**छन्द लक्षण—**जिसमें मगण (त्रिगुरु ऽऽऽ), यगण (आदिलघु ।ऽऽ), रगण (लघुमध्य ऽ।ऽ), सगण (अन्तगुरु ।।ऽ), तगण (अन्तलघु ऽऽ।), जगण (गुरुमध्य ।ऽ।), भगण (आदिगुरु ऽ।।), नगण (त्रिलघु ।।।), गुरु (ऽ), तथा लघु (।) इनके प्रमाण से पद्यों (छन्दों) की कल्पना की गई हो उसे वेदों के चरण की व्यवस्था करनेवाला 'छन्द' शास्त्र कहते हैं।
यत्र व्यवस्थिता चार्थकल्पना विधिभेदतः ॥ ४६ ॥
मीमांसा वेदवाक्यानां सैव न्यायश्च कीर्तितः।
**मीमांसा लक्षण—**जिसमें वेद के वाक्यों की अनुष्ठान-भेद से अर्थ-कल्पना व्यवस्थित की गई है अर्थात् वाक्यार्थ-विचार किया गया है उसे 'मीमांसा' कहते हैं और 'न्याय' भी कहा जाता है।
भावाभावपदार्थानां प्रत्यक्षादिप्रमाणतः ॥ ४७ ॥
सविवेको यत्र तर्कः कणादादि मतं च यत्।
**तर्क लक्षण—**जिसमें भाव (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय) तथा अभाव पदार्थों का प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द प्रमाणों के द्वारा