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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 315

चतुर्थोऽध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २२९

विचार पूर्ण तर्क होता है तथा जो काणादादि वैशेषिक दार्शनिकों का मत है उसे 'तर्क' वा 'न्याय' कहते हैं।

पुरुषोऽष्टौ प्रकृतयो विकाराः षोडशेति च ॥ ४८ ॥
तत्त्वादिसंख्यावैशिष्ट्यात्सांख्यमित्यभिधीयते ।

सांख्य लक्षण — जिसमें एक पुरुष, आठ-प्रकृति, सोलह विकार अर्थात् १ कूटस्थ पुरुष, १ प्रकृति, २ महत्तत्त्व, ३ अहङ्कार, ५ तन्मात्राएं— शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, ये आठ प्रकृतियाँ, तथा १ आकाश, २ वायु, ३ अग्नि, ४ जल, ५ पृथ्वी ये ५ महाभूत, १ हस्त, २ पाद, ३ जिह्वा, ४ लिङ्ग, ५ गुदा ये ५ कर्मेन्द्रियाँ, १ श्रवण, २ त्वक्, ३ चक्षु, ४ रसना, ५ घ्राण ये ५ ज्ञानेन्द्रियाँ और १ उभयेन्द्रिय मन ये १६ विकार। इस प्रकार से २५ तत्त्वादि की संख्या (गणना) की विशेषता है अतः उसे 'सांख्य' शास्त्र कहते हैं।

ब्रह्मैकमद्वितीयं स्यान्नाना नेहास्ति किञ्चन ॥ ४९ ॥
मायिकं सर्वमज्ञानाद्भाति वेदान्तिनां मतम् ।

वेदान्त लक्षण — एक, अद्वितीय, अनिर्वचनीय ब्रह्म ही इस संसार में है, नाना प्रकार की जो वस्तुयें दिखाई पड़ रही हैं वे सत्य नहीं हैं वस्तुतः माया से उत्पन्न हुई अज्ञान से सत्यवत् प्रतीत होती हैं। यह वेदान्तियों का मत है।

चित्तवृत्तिनिरोधस्तु प्राणसंयमनादिभिः ॥ ५० ॥
तद्योगशास्त्रं विज्ञेयं यस्मिन्ध्यानसमाधितः ।

योग लक्षण — जिसमें एकाग्रता के साथ ध्यान एवं कुम्भकादि प्राणायाम द्वारा चित्त की वृत्तियों का निरोध करना बताया गया हो उसे 'योग' शास्त्र कहते हैं।

प्राग्वृत्तकथनं चैक-राजकृत्यमिषादितः ॥ ५१ ॥
यस्मिन्स इतिहासः स्यात्पुरावृत्तः स एव हि ।

इतिहास लक्षण — जिसमें किसी मुख्य राजा के चरित्र-वर्णन के छल आदि के द्वारा प्राचीन व्यवहारों का वर्णन हो उसे 'इतिहास' और 'पुरावृत्त' भी कहते हैं।

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ॥ ५२ ॥
वंशानुचरितं यस्मिन् पुराणं तद्धि कीर्तितम् ।

पुराण लक्षण — जिसमें सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग, प्रलय, वंश, मन्वन्तर तथा वंशों का चरित ये सब वर्णित हों उसे 'पुराण' कहते हैं।

वर्णादिधर्मस्मरणं यत्र वेदाबिरोधकम् ॥ ५३ ॥
कीर्तनं चार्थशास्त्राणां स्मृतिः सा च प्रकीर्तिता ।

स्मृति लक्षण — जिसमें वेद से अविरुद्ध (वेदसंमित) चारो वर्णों एवं