शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाध्याये लोकधर्मानिरूपणप्रकरणम् २४१
पञ्चतालाः स्मृता बालाः षट्तालाश्च कुमारकाः ।
**बाल तथा कुमार भावकी प्रतिमा की ऊंचाई का प्रमाण—**बालभाव की मूर्त्ति ५ ताल की तथा कुमार भाव की ६ ताल की ऊँची बनानी चाहिये ।
दशताला कृतयुगे त्रेतायां नवतालिका ॥ ९२ ॥
अष्टताला द्वापरे तु सप्तताला कलौ स्मृता ।
**सत्ययुगादि-भेद से प्रतिमा की ऊँचाई के प्रमाण में भेद—**सत्ययुग में १० ताल ऊंची, त्रेता में ९ ताल, द्वापर में ८ ताल और कलियुग में ७ ताल प्रमाण ऊंची प्रतिमा बनाने के लिये सामान्य रूप से कहा है ।
नवतालप्रमाणे तु मुखं तालमितं स्मृतम् ॥ ९३ ॥
चतुरङ्गुलं ललाटं स्यादधो नासा तथैव च ।
नासिकाऽधश्च हन्वन्तं चतुरङ्गुलमीरितम् ॥ ९४ ॥
**९ ताल प्रमाण ऊंची प्रतिमा के अवयवों के प्रमाणों का निर्देश—**यदि ९ ताल प्रमाण की प्रतिमा हो तो उसमें मुख १ ताल प्रमाण का बनाना चाहिये, जिसमें ४ अंगुल प्रमाण का ललाट और उसके नीचे नासिका तक का भाग ४ अंगुल का एवं नासिका के नीचे हनु (ठुड्डी) तक का भाग ४ अंगुल प्रमाण का बनाना चाहिये ।
चतुरङ्गुला भवेद् ग्रीवा तालेन हृदयं पुनः ।
नाभिस्तस्मादधः कार्या तालेनैकेन शोभिता ॥ ९५ ॥
नाभ्यधश्च भवेन्मेढ्रं भागेनैकेन वा पुनः ।
४ अंगुल प्रमाण ग्रीवा, १ ताल प्रमाण हृदय अर्थात् वक्षःस्थल, उसके नीचे १ ताल प्रमाण सुन्दर नाभि बनानी चाहिये । और १ ताल प्रमाण नाभि से नीचे लिङ्ग तक का भाग बनाना चाहिये ।
द्वितालौ ह्यायतावूरू जानुनी चतुरङ्गुले ॥ ९६ ॥
जङ्गे ऊरुसमे कार्ये गुल्फाधश्चतुरङ्गुलम् ।
२ ताल प्रमाण लंबे दोनों ऊरु, ४ अंगुल प्रमाण दोनों जानु, ऊरु के समान २ ताल प्रमाण दोनों जंघायें और दोनों गुल्फों के नीचे का भाग ४ अंगुल प्रमाण बनाना चाहिये ।
नवतालात्मकमिदमूर्द्धमानं बुधैः स्मृतम् ॥ ९७ ॥
पण्डितों ने इस प्रकार से प्रतिमा की ९ ताल प्रमाण की ऊंचाई का विभागपूर्वक वर्णन किया है ।
शिखावधि तु केशान्तं त्र्यङ्गुलं सर्वमानतः ।
दिशाऽनया च विभजेत् सप्ताष्टदशतालकम् ॥ ९८ ॥