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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २५३

हाथ और पैर ऐसे बनाने चाहिये जिसमें सिरायें (नसें) तथा गुल्फ न दिखाई पड़े।

तद्विज्ञैः प्रस्तुता ये ये मूर्तेरवयवाः सदा ॥ १०५ ॥
न हीना नाधिका मानात्ते ते ज्ञेयाः सुशोभनाः ।
न स्थूला न कृशा वापि सर्वे सर्वमनोरमाः ॥ १०६ ॥

रम्य प्रतिमा के लक्षण— मूर्त्ति के बनानेवाले कारीगरों द्वारा निर्मित मूर्त्ति के जो-जो अवयव हों वे सब यदि शास्त्रोक्त मान से न अधिक और न कम हों तभी अत्यन्त सुन्दर मानना चाहिये। और यदि सभी अङ्ग न स्थूल तथा न कृश बने हों तो सभी भांति से उन्हें सुन्दर मानना चाहिये।

सर्वाङ्गैः सर्वरम्यो हि कश्चिल्लक्षे प्रजायते ।
शास्त्रमानेन यो रम्यः स रम्यो नान्य एव हि ॥ १०७ ॥

रम्य तथा अरम्य प्रतिमा का अन्तर— लाखों में कोई एक प्रतिमा सबों के लिये सर्वाङ्ग सुन्दर बनती है किन्तु शास्त्र के प्रमाणानुसार जो रम्य (सुन्दर) हो वही रम्य कहलाता है अन्य नहीं।

शास्त्रमानविहीनं यदरम्यं तद्विपश्चिताम् ।
एकेषामेव तद् रम्यं लग्नं यत्र च यस्य हृत् ॥ १०८ ॥

मतान्तर से रम्य और अरम्य के अन्तर— किसी एक का मत है कि— जिसमें जिसका मन लग जाता है उसके लिये वही रम्य होता है किन्तु विद्वानों को तो जो शास्त्र के प्रमाण से विरुद्ध बनी प्रतिमा है वही अरम्य (असुन्दर) होती है।

अष्टाङ्गुलं ललाटं स्यात्तावन्मात्रे भ्रुवौ मते ।

अवयवों की आकृति का वर्णन— ललाट ८ अंगुल चौड़ा, और दोनों भौंहें मिलाकर उतनी ही (८ अंगुल चौड़ी) होनी चाहिये।

अर्द्धाङ्गुला भ्रुवोर्लेखा मध्ये धनुरिवोन्नता ॥ १०६ ॥
नेत्रे च त्र्यङ्गुलायामे द्व्यङ्गुले विस्तृते शुभे ।

दोनों भौंहों की चौड़ाई आधा अंगुल और मध्य में धनुष के आकार के समान कुछ उठी हुई होनी चाहिये। और नेत्रों की लम्बाई तीन अंगुल की तथा चौड़ाई दो अंगुल की एवं देखने में सुन्दर बनानी चाहिये।

तारका तत्तृतीयांशा नेत्रयोः कृष्णरूपिणौ ॥ ११० ॥
द्व्यङ्गुलं तु भ्रुवोर्मध्यं नासामूलमथाङ्गुलम् ।

दोनों नेत्रों की कृष्ण वर्ण की पुतलियाँ नेत्र के तृतीयांश के बराबर (१ अंगुल) की, दोनों भौंहों के मध्य का भाग दो अंगुल चौड़ा एवं नासा का मूल भाग एक अंगुल चौड़ा बनाना चाहिये।