शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५४ | शुक्रनीतिः
नासाग्रविस्तरं तद्वद् द्व्यङ्गुलं तद्विलद्वयम् ॥ १११ ॥
शुकनासाकृतिर्नासा सरलं वा द्विधा शुभा ।
नासा के अग्रभाग का विस्तार दो अंगुल का एवं उसके दो छिद्र भी दो ही अंगुल के होने चाहिये। सुग्गे की नासा के आकार जैसी अथवा सीधी दोनों प्रकार की अर्थात् दोनों प्रकारों में से किसी एक प्रकार की नासा बनाई जानी चाहिये।
निष्पावसदृशं नासापुटयुग्मं सुशोभनम् ॥ ११२ ॥
दोनों नासापुट निष्पाव (मोंठ) के समान अत्यन्त सुन्दर बनाना चाहिये।
कर्णौ च भ्रूसमौ ज्ञेयौ दीर्घौ च चतुरङ्गुलौ ।
कर्णपाली त्र्यङ्गुला स्यात् स्थूला चार्धाङ्गुला मता ॥ ११३ ॥
दोनों कान भी भौंहों के समान चार २ अंगुल लम्बे होने चाहिये। कर्णपाली तीन अंगुल लम्बी और आधी अंगुल मोटी होनी चाहिये।
नासावंशोऽर्द्धाङ्गुलस्तु श्लक्ष्णः सार्द्धाङ्गुलोन्नतः ।
नासिका का दण्ड तीन अंगुल लम्बा, डेढ़ अंगुल उन्नत, और चिकना तथा ऊंचा होना चाहिये।
ग्रीवामूलाच्च स्कन्धान्तमष्टाङ्गुलमुदाहृतम् ॥ ११४ ॥
बाह्वन्तरं द्वितालं स्यात्तालमात्रं स्तनान्तरम् ।
अवयवों के अन्तर का प्रमाण—ग्रीवा के मूलभाग से लेकर स्कन्ध पर्यन्त आठ अंगुल का विस्तार होना चाहिये। दोनों बाहुओं का अन्तर अर्थात् वक्ष स्थल दो ताल प्रमाण चौड़ा होना चाहिये। और दोनों स्तनों का अन्तर (मध्यभाग) एक ताल प्रमाण चौड़ा होना चाहिये।
षोडशाङ्गुलमात्रं तु कर्णयोरन्तरं स्मृतम् ॥ ११५ ॥
कर्णहन्वग्रान्तरं तु सदैवाष्टाङ्गुलं मतम् ।
एक कान से लेकर दूसरे कान तक का अन्तर १६ अंगुल प्रमाण होना चाहिये। और कान तथा हनु का अग्रभाग (ठुड्डी) का अन्तर सदा आठ अंगुल का होना चाहिये।
नासाकर्णान्तरं तद्वत्तदर्धं कर्णनेत्रयोः ॥ ११६ ॥
मुखं तालतृतीयांशमोष्ठावर्धाङ्गुलौ मतौ ।
नाक और कान का अन्तर भी उसी तरह से (आठ अंगुल का) होना चाहिये। और कान तथा नेत्र का अन्तर उससे आधा (चार अंगुल का) रखना चाहिये। मुख की चौड़ाई एक ताल का तृतीयांश प्रमाण होना चाहिये। दोनों ओठ आधा अंगुल प्रमाण का होना चाहिये।