शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २५५
द्वात्रिंशदंगुलः प्रोक्तः परिधिर्मस्तकस्य च ॥ ११७ ॥
दशाङ्गुला विस्तृतितस्तद् द्वादशाङ्गुलदीर्घता ।
**अवयवों की परिधि का प्रमाण—**मस्तक की परिधि (घेरा) बत्तिस अंगुल का होना चाहिये। मस्तक का विस्तार (चौड़ाई) दस अंगुल का और लम्बाई बारह अंगुल का होना चाहिये।
ग्रीवामूलस्य परिधिर्द्वाविंशत्यङ्गुलात्मकः ॥ ११८ ॥
हृन्मध्य-परिधिर्ज्ञेयश्चतुःपञ्चाशदङ्गुलः ।
ग्रीवा मूल की परिधि बाइस अंगुल की होनी चाहिये। हृदय के मध्य भाग (वक्ष के मध्य भाग) की परिधि चउभन (५४) अंगुल की होनी चाहिये।
हीनाङ्गुलचतुस्तालपरिधिर्हृदयस्य च ॥ ११९ ॥
आ स्तनात् पृष्ठदेशान्ता पृथुता द्वादशाङ्गुला ।
हृदय की परिधि एक अंगुल कम चार ताल प्रमाण होनी चाहिये। स्तन से लेकर पृष्ठ पर्यन्त की मुटाई बारह अंगुल की होनी चाहिये।
सार्धत्रितालपरिधिः कट्याश्च द्वयङ्गुलाधिकः ॥ १२० ॥
चतुरङ्गुल उत्सेधो विस्तारः स्यात्षडङ्गुलः ।
कमर की परिधि दो अंगुल अधिक साढे तीन ताल प्रमाण की होनी चाहिये। और उसकी ऊंचाई चार अंगुल की तथा विस्तार ६ अंगुल का होना चाहिये।
पश्चाद्भागे नितम्बस्य स्त्रीणामङ्गुलतोऽधिकः ॥ १२१ ॥
बाहुप्रमूलपरिधिः षोडशाष्टादशाङ्गुलः ।
स्त्रियों की मूर्ति के नितम्ब के पीछे भाग में पुरुष की अपेक्षा परिधि एक अंगुल अधिक साढे तीन ताल प्रमाण होना चाहिये। बाहु के अग्रभाग की परिधि सोलह अंगुल की एवं बाहु के मूल भाग की परिधि अट्ठारह अंगुल की होनी चाहिये।
हस्तमूलाग्र-परिधिश्चतुर्दश-दशाङ्गुलः ॥ १२२ ॥
पञ्चाङ्गुला पादकरतलयोर्विस्तृतिः स्मृता ।
हाथ के मूलभाग की परिधि चौदह अंगुल की एवं अग्र भाग की परिधि दश अंगुल की होनी चाहिये। पैर तथा हाथ के तलभाग का विस्तार पांच अंगुल का होना चाहिये।
ऊरुमूलस्य परिधि र्द्वात्रिंशदङ्गुलात्मकः ॥ १२३ ॥
ऊनविंशत्यङ्गुलः स्यादूर्वग्रपरिधिः स्मृतः ।